बुधवार, 9 नवंबर 2011

आपद्काल के पीछे और आगे

आज तो हमारे देश में अनेक छोटी बड़ी सीमेंट कम्पनियां आ गयी हैं, पर ए.सी.सी. देश की सबसे पुरानी सीमेंट कम्पनी है. सन १९३७ में देश भर में फ़ैले सीमेंट कंपनियों का एकीकरण करके एसोसिएटेड सीमेंट कम्पनीज का नाम दिया गया. अब सन २००५ में स्विस कम्पनी होलसिम ने इसका अधिग्रहण कर लिया है. लेकिन होलसिम ने ACC का ट्रेडमार्क-लोगो यथावत बनाये रखा है क्योंकि इसी नाम से मार्केट में इसकी पहचान जमी हुई है.

एक समय था जब ए.सी.सी. के लगभग १७ प्लांट्स थे और दो कोल माइन्स बिहार में थे. ए.सी.सी. के मैनेजमेंट को कर्मचारियों के हितों में भी बड़ा प्रोग्रेसिव माना जाता रहा है. इस कम्पनी का पूरा इतिहास वेब-साईट पर उपलब्ध है. मैं सन १९६० में बतौर एक लैबोरटरी ट़ेक्नीशियन राजस्थान के बूंदी जिले में स्थित लाखेरी कारखाने में नियुक्त हो गया था. लाखेरी में कर्मचारियों की एक मजबूत युनियन सन १९४६ में ही रजिस्टर्ड हो गयी थी, जिसका राजस्थान में रजिस्ट्रेशन नम्बर एक था. यह यूनियन कर्मचारियों के हितों के लिए हमेशा ही जागरूक रही तथा मैनेजमेंट से नीतिगत सहयोग करती रही. मुझे ये कहते हुए हर्ष है कि हमारे इस संगठन की सोच हमेशा ही सकारात्मक व सहयोगी दृष्टिकोण वाली रही है. कम्पनी ने अस्सी के दशक में अपनी पुरानी घाटे में चलने वाली ७ ईकाइयों को बेच दिया, जो बाद में धीरे-धीरे कबाड़ियों के पास चले गए हैं. लेकिन लाखेरी को नया जीवन दिया गया है. इसके पीछे कामगार संघ का योगदान भी कम नहीं रहा है.

सन १९७१ में केन्द्र सरकार द्वारा प्राईवेट कोयला खदानों का राष्टीयकरण करने पर कम्पनी ने अपने कोयला खदान कोतमा व नौरोजाबाद के आफीसर्स को सीमेंट के बिभिन्न प्लांट्स में स्थानांतरित करके एडजस्ट किया. सीनियोरिटी के हिसाब से ये उच्च पदों पर भी आये पर ये औद्योगिक संबंधों से बिलकुल भिन्न कल्चर वाले थे. अत: कोयला खदानों वाली चाल चलने पर कई यूनिट्स में तनाव आता रहा. लाखेरी में फिर भी सामन्जस्य बनाए रखने की कोशिश होती रही. यहाँ एक माइनिग इंजीनियर को प्लांट हेड बना दिया गया. एक डाक्टर जो M.B.B.S. नहीं था को C.M.O. बना दिया गया.

मेरा सौभाग्य कहूँ या दुर्भाग्य, मुझे १९७५ में युनियन का जनरल सेक्रेटरी चुन लिया गया. सभी कार्य बदस्तूर चल रहे थे, अचानक देश की राजनीति में क्रांतिकारी भूचाल आ गया. इंदिरा गाँधी ने राजनीतिक उथल-पुथल के बीच आपद्काल घोषित कर दिया. इसका सबसे ज्यादा खामियाजा भुगतना पड़ा मजदूर वर्ग को क्योंकि अनुशासन के नाम पर सारे मौलिक अधिकार छीन लिए गए थे और मैनेजमेंट को मनमानी का पूरा मौक़ा मिल रहा था. अंगरेजी में एक कहावत है: 'Power corrupts, absolute power corrupts absolutly.’

हमारे पैकिग प्लांट में आपसी समझौते के अनुसार पुराने बारदाने का प्रयोग मात्र १०% होता आ रहा था क्योंकि पुराने बारदाने से पैकिंग व लोडिंग में मजदूरों को बहुत परेशानी उठानी पड़ती थी. मैनेजमेंट ने इकतरफा निर्णय लेकर ५०% पुराना बारदाना लगाने का आदेश कर दिया गया. यूनियन व मैनेजमेंट के रिश्ते तल्ख़ होने ही थे, हम मजदूर नेताओं विशेष कर जनरल सेक्रेटरी के रूप में मैं, मैनेजमेंट व जिला प्रशासन के निशाने पर आ गया. क्योंकि मैंने मैनेजमेंट के इस आदेश के विरुद्ध काम बंद करवा दिया था. हम असहाय थे क्योंकि जिला प्रशासन पूरी तरह मैनेजमेंट की भाषा बोल रहा था. इसी क्रम में जबरन नसबंदी का काम भी चल गया. ड्यूटी पर से हर उम्र के उन कर्मचारियों को समूहों में अस्पताल भेजा जाने लगा जिनके दो या अधिक बच्चे थे. राष्ट्रीय कार्यक्रम जैसा बना कर ये चलाया जाने लगा. मजदूरों में घोर असंतोष व भय व्याप्त हो गया. गुस्सा तब फूटा जब नसबंदी कराने वाले कर्मचारियों को तीसरे दिन फिट करके काम पर जाने के आदेश कर दिए गए.

मैं जब इस विषय में सी.एम.ओ. से मिला तो उसने बताया कि ये मैनेजमेंट का आदेश है. चूकि ये मेडिकल एथिक के बिरुद्ध था कि सिक-फिट करने के लिए डाक्टर स्वतंत्र नहीं था और तीसरे दिन काम पर जाने को कहा जा रहा था तो डाक्टर से मेरी गरमागरम बहस हो गयी. नतीजन मुझे कम्पनी के अनुशासन संबंधी स्टेंडिंग आडर्स का हवाला दे कर चार्जशीट किया गया कि डाक्टर के काम में बाधा डाली गई और हरामीपन जैसे शब्द का प्रयोग किया गया डिपार्टमेंटल इन्क्वारी करके मुझे अधिकतम प्रावधान वाली सजा के रूप में चार दिनों का सस्पेन्शन दिया गया.

न्याय की देवी की आखों में पट्टी बंधी रहती है गवाह जो कहे वही रिकार्ड होता है. मेरी इन्क्वारी में अस्पताल में कार्यरत एक मजदूर रामकरण को गवाह बनाया गया था जिसने मेनेजमेंट के आरोप की पुष्टि की, उसे तुरन्त प्रमोशन दे दिया गया. मुझे याद आ रहा है कि दिल्ली में सुजानसिंह पार्क एक प्रसिद्ध जगह है. ये सुजानसिंह नामी लेखक पत्रकार सरदार खुशवंत सिंह के पिता थे. जिन्होंने शहीदेआजम भगतसिंह के खिलाफ अंग्रेजों की अदालत में गवाही ही थी, उसकी पहचान तस्दीक की थी. फलस्वरूप सर की उपाधि से नवाजा गया था. हमारी आजादी के इतिहास के पन्नों में ये काला सच विद्यमान है.

रामकरण को कुछ समय बाद फिर प्रमोशन दिया गया. अपने संगठन व लीडर के खिलाफ गवाही देकर उसने जो बहादुरी की उसका इनाम तो उसे मिलना ही था, पर वह बहुत बाद तक अपनी शर्मिंदगी व अफ़सोस मुझे बताता रहा. इमरजेंसी खतम होने के बाद मेरा सस्पेंसन भी वापस ले लिया गया पर ये घटना एक बड़ा घाव छोड़ कर गयी. मैं बाद में लंबे समय (सन १९९८) तक यूनियन का चार बार अध्यक्ष चुना गया. मैनेजमेंट स्टाफ में भी परिवर्तन हुआ, नई सोच वाले प्रबुद्ध लोग आये. उस पुराने व आउटडेटेड टेक्नॉलाजी वाले प्लांट को नया जीवन देने के लिए हमने (मैंने अध्यक्ष के रूप में + मेरी योग्य टीम ने) बहुत प्रयास किये. लाखेरी में नया आधुनिक टेक्नॉलाजी वाला ड्राई प्रोसेस प्लांट लगया गया.

कोई भी मैनेजमेंट महज चैरिटी के लिए उद्योग नहीं चलाता है, अत: उत्पादन लागत कम करने के लिए तमाम उपायों में मैनेजमेंट से सहयोग किया गया. आज भी, जबकि मुझे रिटायर हुए १६ वर्ष हो गए हैं, वहाँ के कर्मचारी व आस-पास क़स्बे के बाशिंदे प्रेम से याद करते हैं क्योंकि लाखेरी में यदि सीमेंट का कारखाना बंद हो जाता तो कारखाने में कार्यरत तमाम छोटे बड़े कर्मचारियों के अलावा आस-पास क़स्बे-गाँव-बाजार में रहने वाले लोगों के लिए बड़ी त्रासदी होती क्योंकि लाखेरी का वजूद सीमेंट कारखाने से ही है.
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मंगलवार, 8 नवंबर 2011

ईमानदारी का जज्बा


जर्मनी में स्टुअर्ट हेनीमैंन नाम का एक लड़का रेल द्वारा बर्लिन से डोरमोंड जा रहा था, वहाँ के क़ानून के अनुसार १७ वर्ष की उम्र तक के किशोरों को आधा रेल किराया देना होता है. यात्रा के बीच में रात १२ बजे तारीख बदलते ही हेनोवर शहर आया तो वह लड़का खुशी से रेल अधिकारी के पास गया और शेष यात्रा के लिए पूरे किराए की रकम देकर बोला, सर, मैं अब पूरे १७ वर्ष का हो गया हूँ. रेलवे अधिकारी ने मुस्कुराते हुए उसका किराया लिया, रसीद काटी और बोला, बधाई है.

यहाँ हमारे देश में, एक सज्जन उम्र ६० वर्ष, सीनियर सीटीजन का रियायती टिकट (रेलवे के नियमानुसार ६५ वर्ष उम्र होने के बाद यह सुविधा प्राप्त कर सकते हैं) लेकर दिल्ली से लखनऊ का सफर कर रहे थे. टिकट चेकर द्वारा आयु का प्रमाण माँगने पर वे बहुत उत्तेजित हो गए और बहस पर उतर आये. उनका तर्क था कि वे दिल्ली में केन्द्रीय सरकार की ३८ वर्ष की सेवाओं के बाद रिटायर हुए हैं. अपने सफ़ेद बालों का भी वास्ता देने लगे. लेकिन टिकट चेकर उम्र प्रमाण पत्र पर अड् गया. जुर्माने की धमकी भी दे दी तथा उसने रेलवे सुरक्षा गार्ड के दो सिपाहियों को भी बुला लिया.

बाजी हाथ से जाते देखकर उस सज्जन ने सौ सौ रुपयों के दो नोट निकाल कर टिकट चेकर को गुप्त अंदाज में
पकड़ा दिए. टिकट चेकर ने नोटों को देखा और फिर बोला, एक नोट और दो.

सज्जन ने एक नोट और निकाल कर दिया जिसे टिकट चेकर ने सिपाहियों की तरफ बढ़ा दिया और चले जाने का इशारा कर दिया. खुद दो सौ रूपये अपनी जेब में डाल कर अगले यात्री से पूछताछ करने लगा.
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सोमवार, 7 नवंबर 2011

बड़े मकान का सच


एक फिल्म बनी थी, हम सब चोर हैं, और बाद में एक फ़िल्मी गाना भी आया था, कोई गोरा चोर, कोई काला चोर, कोई लाट साहब का साला चोर...’ पर ये दोनों ही कथन अर्धसत्य है. हर बात में अपवाद भी होते हैं. ऐसे ही थे बिजली विभाग के एक इंजीनियर हरिश्चंद्र जोशी.

हरिश्चंद्र के पिता पंडित दुर्गादत्त एक अध्यापक थे और बचपन से ही नैतिकता के पाठ पढ़ा कर उनके आचार विचार को इतना शुद्ध करके रखा था कि बिरला इंस्टीच्यूट पिलानी से बी.ई. इलेट्रीकल्स की डिग्री हासिल करके जब वे उत्तर प्रदेश बिजली बोर्ड (तब निगम नहीं बना था) के मुलाजिम बने तो हर तरफ घूस व कमीशन की बाढ़ देख कर बहुत दु:खी हुए.

तीन तरह के ईमानदार लोग होते हैं--एक वह जो बाहर-भीतर से यानि मन-वचन-कर्म से शुद्ध होते हैं. बेइमानी की सोच भी नहीं सकते हैं और अनाचार की कमाई को पाप समझते हैं. दूसरे वह जिनको बेईमानी करने का मौक़ा मयस्सर नहीं होता है. वे चाहे तो भी बेईमानी नहीं कर पाते हैं. और तीसरे वह जो बेईमानी करते तो हैं, पर दुनियाँ को खबर नहीं होने देते है.

हरिश्चंद्र जोशी ने शुरू में ही अपने सहकर्मियों से कह दिया था कि उनके लिए घूस व कमीशन का पैसा लेना गाय का खून लेने के सामान है, और वे अपने इस व्रत को पूरे ३५ वर्ष के सेवाकाल तक निभाते रहे. उनके साथ के कई लोग भरपूर भष्टाचार में डूबे रहते थे पर वे उन सब से अलग ही थे.

उन्होंने अपने दोनों बेटों को भी अपनी ही लीक पर रखने के लिए शिक्षा विभाग में लेक्चरर पद की राह पकड़ाई. उनका विश्वास था कि ये एक नोबल प्रोफेशन है, जहाँ अन्य सरकारी विभागों की तरह हराम का पैसा नहीं बंटता है. यद्यपि तब वेतन कम ही था पर उन्होंने अपने सारे काम उसमे ही निभा कर किये. उनके रुपयों में अवश्य ही बरकत रही.

अपने कार्यकाल में उन्होंने मातहतों को नौकरी पर भी रखा. वे जब नोएडा इंडस्ट्रियल एरिया में तैनात थे तो उन्होंने हीरासिंह नाम के एक गरीब लड़के को लाइनमैन में भर्ती किया था. वह भी अल्मोडा के निकटवर्ती किसी गाँव का रहने वाला था. हीरासिंह बाद में नोएडा में ही मीटर रीडर बना दिया गया था. वहाँ उसके ऊपरी आमदनी के बहुत श्रोत थे इसलिए उसने वहाँ से अपनी बदली अन्यत्र नहीं होने दी. जबकि हरिश्चंद्र जोशी अनेक जिलों में घूमते हुए, उत्तराखंड बनने के बाद हिल कैडर में अपनी च्वाइस दे कर नैनीताल रेंज में आ गए. वे लंबे समय तक एक्जेक्यूटिव इंजीनियर के पद रहे. वे चीफ इंजीनियर बनने के लिए सीनियोरिटी लिस्ट में हमेशा ही रहे पर उनकी ईमानदारी आड़े आती रही. ऊपरवाले ऐसे लोगों को पसंद नहीं करते हैं जो न खाते हैं और ना खाने देते हैं.

कुमायूं पहाड़ के रहने वाले अधिकाँश लोग नौकरी से रिटायर होने पर हल्द्वानी जैसे सुबिधा वाले शहर के आस-पास अपना आशियाना बनाना पसंद करते हैं. हरीशचन्द्र जोशी ने भी बहुत सोच समझ कर कुसुमखेड़ा में ३००० वर्ग फुट का एक रिहायसी प्लाट, अपने रिटायरमेंट से पहले ले लिया था. रिटायरमेंट से एक साल पहले से ही उनके मन में अपने स्वप्न महल के नक़्शे बनने लगे थे. उन्होंने नक्शानवीस से इस विषय में कई बार चर्चाएं भी की. उनके प्लाट के मोड पर एक बड़ा सुन्दर, आधुनिक नक़्शे वाला बड़ा मकान कुछ समय पहले ही बना हुआ था. उसका नक्शा बार बार उनको अपनी ओर आकर्षित कर रहा था. एक दिन वे गेट खटखटा कर अन्दर दाखिल हुए तो मकान की गृहिणी मिली. उन्होंने गृहिणी से कहा कि उनको मकान बहुत अच्छा लग रहा है, चूँकि वे भी अपना मकान बनवा रहे हैं इसलिए अन्दर की बनावट देखना चाहते हैं. गृहिणी ने बहुत आदर से उनको अपना घर दिखाया. मकान वाकई बड़ा शानदार था. मकान का फर्श-फर्नीचर व डेकोरेशन और भी शानदार था. जोशी जी गौर से सब निहारते रहे, बाद में अपने घर आकर उन्होंने वैसे ही कमरे, रसोई, बाथरूम, लॉबी, बालकनी व गैरेज का खाका बनाया और नक्शानवीस के पास ले गये, नक्शा बन गया, म्युनिसिपैलिटी में पास भी हो गया. ये दीगर बात है कि यहाँ उनको सुविधा शुल्क देना ही पड़ा.

मकान बनाने के लिए ठेकेदार से शर्तें तय हो गयी और करीब दस महीनों में मकान बन कर भी तैयार हो गया. मकान जीवन में अक्सर एक ही बार बन पाता है इसलिए उन्होंने अपनी तरफ से अच्छा बनाने में कोई कोर-कसर नहीं रखी. घर की सजावट में उन्होंने व उनके बेटों ने बढ़िया से बढ़िया मैटीरियल व फर्नीचर की व्यवस्था की, फिर भी उनको लगता रहा कि जिस मकान को देख कर उन्होंने अपना बनाया है वह कई मायनों में इससे बेहतर है.

गृहप्रवेश की सारी तैयारी चल रही थी, बच्चे लोग आ चुके थे. रिश्तेदारों को निमंत्रण पत्र भेजे जा चुके थे. हरिश्चंद्र जोशी के मन में आया कि जिस मकान को देख कर उन्होंने प्रेरणा ली है, उसे भी निमंत्रित करना चाहिए. उनको मकान मालिक का नाम मालूम न था इसलिए बिना नाम लिखे ही वे एक कार्ड लेकर उस घर पर पहुंचे, गेट की घंटी बजाई तो अन्दर से गृहणी बाहर निकली. जोशी जी ने कहा, मैं मकान मालिक से मिलना चाहता हूँ.

गृहणी ने उत्तर दिया, अभी बुलाती हूँ.

थोड़ी देर में गृहस्वामी जब बाहर आया तो हरिश्चंद्र जोशी उसे देख कर हतप्रभ रह गए. वह और कोई नहीं बल्कि हीरासिंह मीटर रीडर था.
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रविवार, 6 नवंबर 2011

युद्ध-गीत


(राजस्थान के हाड़ोती आँचल की बोली-भाषा में कारगिल युद्ध के समय लिखा गया गीत)

खींचे दुश्मण मायड आँचल
ऊं को हाथ कटानो
       चालो जी सीमा चालो ..३

जाग उठो ए माई के पूतों
यो गंग जमण री माटी छै
कसमा मायड री दूध रा
बीरां री यो थाती छे.
       आज सारा नै हेरा पाड्यो
        सब मिल्क्याने कदम बढ़ो...३
चालो जी सिपाई बढ़ो, कलमा री स्याही बढ़ो
खन्द्का खाई बढ़ो, दारु री दवाई बढ़ो
धोबि र नाई बढ़ो, चलो जी सीमा चलो
        खींचे दुश्मण मायड आँचल ऊं को ...

अमर हमीद री याद नै
फेणु.आज जगानो छै
लाल बहादुर नाम रा
बिगुला वाद्य बजानो छै
       खेत-खेत खलिहानों में
       देश रा पूतो उमड़ पडो...३
चालो जी गोपाल बढ़ो, कबिराकमाल बढ़ो
ताल र बेताल बढ़ो शाल र दुशाल बढ़ो
बाढ र अकाल बढ़ो चालो जी सीमा चालो
       खीचे दुश्मण मायड आँचल ऊं को...

भारत रा इतिहास मा
पाठ और मड जानो छै
जीं धरती पर जनम लियो
ऊं खातिर मर जानो छै.
       आज एक आवाज कर
       दुश्मण पर सब टूट पड़ो ...३
चालो जी बालक बढ़ो, देश रा मालक बढ़ो
मोटरां चालाक बढ़ो, सब्जी र पालक बढ़ो
नगाड़ा ढोलक बढ़ो, चालो जी सीमा चलो
       खीचे दुश्मण मायड आँचल ऊं को...

राणा और शिवाजी री
गाथा आज सुणानी छै
बिखरी बानी नेहरू री
माथे आज लगाणी छे
        आज अहिंसा गाँधी री
        बोल रही तलवार धरो ...३
चालो जी जाकिर बढ़ो, वैद र डाक्टर बढ़ो
कवि र शायर बढ़ो, बातां रा माहिर बढ़ो
बैण! रा खातिर बढ़ो, चालो जी सीमा चलो
        खींचे दुश्मण मायड आँचल ऊं को...

तात्या टोपे कुम्भा बण
जौहर आज बताणों छै
हल्दीघाटी के गौरव नै
फेणु आज जगानो छै.
       प्यास बुझाबा को तलवारो
       दुश्मण का सर कलम करो ...३
चलो जी सिंह बढ़ो, हुकुमसिंह बढ़ो 
दारासिंह बढ़ो, तारासिंह बढ़ो
हीरा हिंग बढ़ो, चलो जी सीमा चलो
       खीचे दुश्मण मायड आँचल ऊं को ..

मर्दों का पोशाका में
जैसे राणी झांसी री
बैण! बेटी चंडी बण
शान बढाओ शौहर री. 
       आज परिच्छा थारी री
       तोपां सों सुहाग भरो...३
चालो जी कमला बढ़ो, राणी विमला बढ़ो
बी बिस्मिल्ला बढ़ो, शशिकला बढ़ो
आला र बला बढ़ो, चलो जी सीमा चलो
       खीचे दुश्मन मायड आँचल ऊं को ...

आज दिखानी दुनिया नै
ताकत अपने हाथां री
मर जाणो या तर जाणो
कसमा अपने माथा री
        शान बढ़ेगी भारत री
        शहीदों में सब नाम करो...३
चलो जी मोबीन बढ़ो, मोहम्मद अमीन बढ़ो
जोजफ मार्टीन बढ़ो, घी तेलां रा टीन बढ़ो
बन्दूका छीन बढ़ो.चलो जी सीमा चलो.
       खीचे दुश्मण मायड आँचल
       ऊं को हाथ कटानो
       चलो जी सीमा चलो.

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मंगलवार, 1 नवंबर 2011

चिट्टी और किट्टी


चिट्टी और किट्टी दो सगी बहिनें हैं. दोनों का जन्म मेरे गौजाजाली के घर के पड़ोस में पपने जी की खाली पडी हुई पुरानी गोशाला में हुआ. भाग्य की विडम्बना देखिये दोनों को बिछुडना पड़ा है. जिस तरह उमराव जान वाली फिल्म में एक सहेली नवाब साहब की बेगम बन गयी, दूसरी नर्तकी, उसी तरह इनका भी इतिहास बन गया है.

हमारे मोहल्ले में दस-पन्द्रह आधुनिक मकान बने हैं, जिनमें लोगों ने टाइट दरवाजों की फिटिंग कराई है. नए डिजायन के इन घरों में न गौरैय्यों के निवास के लिए बाहर की तरफ खोखले कोटर रखे गए हैं और न उनमें बिल्लियों के घुसने के लिए आसान दरवाजे-खिड़कियाँ. कुत्ते अलबत्ता खुद धक्का देकर या पंजे मारकर अन्दर बाहर जाने की कला जानते हैं.

मैं जिन दो बहिनों की सत्यकथा लिख रहा हूँ वे पहले पहले तो अपनी माँ के साथ मोहल्ले में घूमने आने लगी. देखने में चिट्टी बड़ी सुन्दर रुई की गोले की तरह सफ़ेद, पीठ व कानों में काले धब्बे थे, वहीं किट्टी आगे से तो चिट्टी जैसी दिखती थी पर उसका पिछला हिस्सा काली धारियों वाली जंगली बिल्लियों सा था.

प्यार की भाषा तो हर प्राणी समझता है. ये दोनों बच्चे बुलाने पर, पहले पहले तो बहुत डरते थे पर बाद में जब इनको दूध-रोटी की चाट लग गयी तो स्वत: ही म्याऊं-म्याऊं करके पास आने लगे.

मुझसे इनको ज्यादे ही लगाव हो गया था क्योंकि मैं सुबह ६ बजे घर का दरवाजा खोल कर गेट का भी ताला खोला करता हूँ. दरवाजे-गेट के खुलने की आवाज सुनकर ना जाने ये कहाँ से आ टपकते और जब तक प्याली में दूध न दिया जाये ये दोनों पैरों में लिपटकर चिरौरी सी करने लगती थी. दूध चाट कर ये फिर गायब हो जाती थी. ये एक तरह से नित्यक्रम सा हो गया था. मोहल्ले में चर्चा होती थी कि ये कई घरों में यही चरित्र निभाती थी. इनका ठिकाना पास में खड़ी गाड़ियों के नीचे या छत की बाहरी सीढ़ियों के नीचे रहता था.

मेरे साढू भाई गोविन्द भट्ट जी एक बार गाड़ी लेकर जब हल्द्वानी आये तो चर्चा में बिल्ली के बच्चों की बात भी आई. उन्होंने तुरन्त एक बच्चे को ले जाने की इच्छा जताई, पर दिन में तो ये ना जाने कहाँ छुपी रहती थी. मैं सामने भुवन तिवारी जी के घर के पिछवाड़े गन्ने के झुरमुट के पास गया और चुट-चुट आवाज निकल कर बुलाया तो किट्टी झाडियों में से निकल कर आ गई. इस प्रकार भट्ट जी उसे जाली में डाल कर दिल्ली अपने घर ले गए, वहाँ से उन्होंने उसे अपने बेटे महेश भट्ट के पास हरिद्वार पहुँचा दिया. महेश लक्सर-पार्कर पेन की फैक्ट्री में बड़ा मैनेजर/प्रेसीडेंट हैं. अकेले रहते हैं. परिवार कनाडा में व्यवस्थित है. उनके पास फुल टाइम नौकर व गार्ड रहता है. वैसे तो महेश, बाबा नीम करोली के अनन्य भक्त है, पर बिल्ली प्रेमी भी है. किट्टी की खूब खिदमत हुई होगी. खबर मिलती थी कि किट्टी के अंदाज शाही हो गए हैं. मैं उस बीच एक बार दिल्ली गया तो वह भी अपने मालिक के साथ गाड़ी में दिल्ली आई हुई थी. सोफे पर विराजमान थी और बड़े प्यारे अंदाज में मेरे गोद में आ बैठी. कहते है कि बिल्लियाँ अपने मालिक को या खाना देने वालों को जल्दी भूल जाती हैं, पर किट्टी के इस व्यवहार पर मैं कुछ नहीं कह सकता हूँ कि उसने मुझे पहचाना या वह सभी के गोद में बैठने की आदी हो गयी थी. बहरहाल वह राजसी ठाट में थी. हरिद्वार की पवित्र भूमि में महेश भट्ट के साथ सात्विक भोजन का आनंद ले रही थी.

इधर चिट्टी अपने पुराने अंदाज में बाहरी आवासों के सहारे बड़ी होती जा रही थी. उसने पिछली गर्मियों में अपनी शक्ल के दो फूल जैसे शावकों को जन्म दिया, लेकिन किसी बिल्ले ने जल्दी ही जान से मार दिया. तब वह बहुत उदास होकर मेरे द्वार पर आई थी. मैंने उसे दूध रोटी दी पर उसने कोई रूचि नहीं दिखाई. मैं समझ गया कि उसे अपने बच्चे खोने का गंभीर सदमा लगा था. ये मायाजाल ऐसा ही बनाया गया है. कुछ दिनों बाद मगर सब सामान्य हुआ जैसा लगता था.

गत जुलाई में जब मेरा अमेरिका आने का कार्यक्रम बना तो मैं चिट्टी के बारे में सोचता रहा कि सुबह-सुबह वह मेरे द्वार पर आयेगी और मुझे न पाकर उसे एक और सदमा लगेगा. वैसे अब उसके खाने पीने के बारे में ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं थी क्योंकि वह अपने लिए शिकार खुद करने लगी थी. उससे मेरा एक बंधन सा हो गया था.

समय अपनी गति से भागता ही है. जिस तरह रेल में बैठ कर हमको अगल-बगल दृश्य, पेड़-पौधे, आदि पीछे को भागते हुए दीखते हैं, और सच्चाई यही रहती है कि हम भागते होते हैं, उसी तरह समय तो अपनी जगह ठहरा है और हम ही आगे भागे जा रहे हैं. बहरहाल जो भी भाग रहा हो समय दूर छूटा जा रहा है.

अम्रेरिका में मुझे फेसबुक पर अपने तमाम पुराने परिचित मिल गए. ये ऐसा सोशल नेटवर्क है जो पहले सिर्फ स्टूडेंट्स के मतलब के लिए एक २० वर्षीय छात्र जकरबर्ग ने शुरू किया था पर अब विश्वव्यापी संगठन सा बन गया है. तमाम भूले बिसरे मित्रों को सन्देश, फोटो, व वर्तमान में दिन-प्रतिदिन हो रही घटनाओं-यात्राओं तथा व्यक्तिगत उपलब्धियों की जानकारी दे रहा है. अनेक कवियों की कल्पनाएँ, अद्वितीय स्थानों के चित्र, ये सब नया अनुभव है. इस विधा से अभी वे लोग महरूम है जिनके पास कंप्यूटर+नेटवर्क कनेक्शन नहीं है. खुशी इस बात की है कि लोगों में इस दिशा में जागृति आई है और अधिक से अधिक लोग इससे जुड़ते जा रहे है.

पिछले महीने के प्रारम्भ में अपने-अपने फेस बुक पर मेरे दो मित्रों ने (जिनमें आपसी संबाद नहीं है) अलग-अलग जगहों से दो बिल्लियों के उनके बच्चों के साथ फोटो चित्र डाले. एक हरिद्वार से महेश भट्ट द्वारा अपनी बिल्ली किट्टी का और दूसरा हल्द्वानी से मेरे भान्जे प्रकाश (जो मेरे मोहल्ले के वासी है) द्वारा किट्टी का. ये विचित्र संयोग था जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी.

मैं खुशी से झूम उठा कि किट्टी व चिट्टी अपने-अपने तीन-तीन पोथीलों के साथ इंटरनेट पर विराजमान हैं.
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