शनिवार, 10 दिसंबर 2011

मैं दिल्ली का लाट हूँ


जनता  का  सिपाही हूँ, बातों  का  सम्राट  हूँ
मैले बिस्तर पलट दिये पर वही पुरानी खाट हूँ.

बामन भी हूँ, बनिया भी हूँ, कोई कह ले जाट हूँ
बहुरूपी, समदर्शी  कह  लो, भाई मैं तो भाट  हूँ.

सबके  गंदे  कपड़े  आते, मैं  वह  धोबीघाट हूँ
दारूबंदी  की  बोतल  का, मैं  अनमोल डाट हूँ.

नए पुराने चावल मिल गए, मैं वह गीला भात हूँ
चीनी अमेरिकी माल मिलेगा मैं वह देसी हाट हूँ.

माल  चरपरा  दस्तावर भी, बहुरंगी  मैं चाट  हूँ
हर गरीब जो  पहन  सकेगा, प्यारा कपड़ा टाट हूँ.

समाजवादी  पूंजीपति  हूँ, गांधीवादी  ठाट  हूँ 
श्वेत/बिरंगी टोपी  के  नीचे  खद्दर-टाई नाट हूँ.

बरसाती  नाले  से  उभरी,  नई-नवेली  पाट  हूँ
थूक से जिसको चिपका रखा, मैं कागज़ की फाट हूँ.

मन चाहे जो भोजन परसो, मैं इमली का पात हूँ
आयोगों की फसल उगाता मैं दिल्ली का लाट हूँ.
                 ***

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

चुहुल-११


                                 (१)
एक आदमी अपने कुत्ते को लक्स साबुन से नहला रहा था, जिसकी खुशबू सड़क तक फ़ैली हुई थी. एक राहगीर का ध्यान उसकी तरफ गया और वह बोला, क्यों भाई साहब, कुत्ते को खुशबूदार साबुन से नहलाया जा रहा है, कोई खास बात है क्या?
कुत्तेवाला बोला, हाँ भाई, इसकी शादी होने वाली है.
राहगीर ने पूछा, तब तो दावत भी होगी?
कुत्तेवाला बोला, हाँ, हाँ, इसके सब रिश्तेदार आयेंगे आप भी आना.

                                  (२)
दो लड़के आपस में घनिष्ठ मित्र थे. एक दिन बातचीत में एक ने दूसरे से पूछा:
प्रश्न: यार तेरे पीछे शेर पड़ जाएगा तो तू क्या करेगा?
उत्तर: नदी में कूद जाऊंगा.
प्रश्न: शेर भी नदी में कूद जायेगा तो?
उत्तर: मैं पेड़ पर चढ़ जाऊंगा.
प्रश्न: अगर शेर भी पेड़ पर चढ़ जाएगा तो?
उत्तर: यार, पहले तू ये बता कि तू मेरा दोस्त है या शेर का?

                                  (३)
एक रेस्टोरेंट में एक ग्राहक ने चाय का आर्डर दिया, लेकिन बहुत देर हो गयी वह बैरा लौट कर नहीं आया. ग्राहक कुढ़ कर बैठा था कि दूसरा बैरा आर्डर लेने के लिए आ गया, तो ग्राहक ने उसको बताया कि चाय का आर्डर तो बहुत देर पहले दूसरा बैरा ले गया था.
नए बैरे ने पूछा, क्या उसकी दाढ़ी थी?
ग्राहक ने कहा, तब तो नहीं थी पर इतनी देर हो चुकी है कि अब तक जरूर लम्बी दाढ़ी उग आई होगी.

                                   (४)
पैसेंजर ट्रेन के जनरल डिब्बे में सीट के बारे में दो यात्री झगड पड़े. एक गुस्से में बोला, मैं तेरे चौंतीस के चौंतीस दांत तोड़ दूंगा.
बगल में बैठे हुए तीसरे यात्री ने मजाक बनाते हुए कहा, इसके तो ३२ ही दांत हैं, तुम ३४ दांत कैसे तोड़ोगे?"
वह बोला, मुझे मालूम था तुम जरूर बीच में बोलोगे, इसलिए तुम्हारे भी दो दांत इसमें जोड़ रखे हैं.

                                    (५)
मेंटल हॉस्पिटल के कॉरिडोर में एक नामी पागल दौड़ कर डाक्टर के पीछे आया. डाक्टर डर गया और भागने लगा. आगे जाकर खिड़की से कूद गया और घायल हो गया. पागल भी कूद कर आया और डाक्टर को छू कर, "कबड्डी-कबड्डी, कह कर हँसते हुए चला गया.
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गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

कृपया सोचिये


सर्व प्रथम मैं ये घोषणा करता हूँ कि मैं वर्तमान में किसी राजनैतिक पार्टी का सदस्य नहीं हूँ और न किसी का हितैषी हूँ क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अधिकांश निर्णय अलोकतांत्रिक ढंग से लिए जा रहे हैं. चाहे केन्द्र हो या राज्य, कहीं की भी सत्ता में जो लोग काबिज हैं, सब की सोच केवल येन-केन प्रकारेन सत्ता हथियाना रह गया है. भविष्य के सारे निर्णय इसी बात को ध्यान में रख कर लिए जाते हैं कि उससे आगामी चुनावों में कितना लाभ मिल सकेगा? सत्ता की जो गरिमा थी वह धीरे-धीरे कम हो गयी है. आज स्थिति ये हो गयी है कि किसी को बड़ी गाली देनी हो तो उसे नेता जी कहना पर्याप्त होगा. सबसे अफसोसजनक बात ये हो गयी है कि देश को शाशित करने वाली सर्बोच्च संस्थाएं संसद तथा विधान सभाओं में आम आदमी की पहुँच नहीं है. क्योंकि उसके पास चुनाव लड़ने के लिए धन+साधन नहीं होता है. लोग अब ये तक कहने लगे हैं कि कोई शरीफ आदमी इन संस्थाओं में नहीं जा सकता है क्योंकि चुनावबाजी में सौ प्रपंच व अबैध खेल करने पड़ते हैं. ये कुछ शातिर लोगों का धन्धा बन गया है.

ये अजीब सी स्थिति है कि चुनावों से पहले हर बार राजनैतिक पार्टियां अपना घोषणा-पत्र छापती हैं और हर बार मतदाता ठगा जाता है. मतदाता भी ऐसा भोला/भेड़चाल है कि फ़ौरन लालच या आश्वासनों पर लुट जाता है. मतदाताओं का एक बड़ा तबका जो अपने को संभ्रांत व बुद्धिजीवी बताता है, मतदान करने ही नहीं जाता है. कुल मिलकर ५०% वोटिंग हो जाये तो बड़ी बात मानी जाती है. ये अशिक्षा व सिस्टम का विद्रूप चेहरा है.

ये कहना भी अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा कि कुछ अपवादों को छोड़ कर हम सब स्वार्थी और बेईमान हो गए हैं. सभी लोग निजी स्वार्थों की ओट में तीर चला रहे हैं और एक दूसरे को चोर साबित करने में लगे हुए हैं. लोकपाल बिल अथवा सशक्त लोकपाल बिल एक क़ानून का रूप ले लेगा तो क्या हमारे ये दुराचरण छूट जायेंगे? मैं सोचता हूँ यह एक दिवा-स्वप्न है. मैंने गत वर्ष २७ अगस्त को प्रश्न चिन्ह शीर्षक से इसी विषय पर ज्वलंत विचारणीय प्रश्न उठाये थे. मेरे कई मित्रों की धारणा थी कि अन्ना हजारे जी का आन्दोलन व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन ला देगा. देश के अनेक युवा अति उत्साहित थे, शायद आज भी होंगे, जो पूरी व्यवस्था का ध्वंश चाहते हैं ताकि नव निर्माण किया जा सके. मैं उनकी भावनाओं का दिल से समर्थन करता हूँ, पर यह वर्तमान संवैधानिक प्रावधानों के तहत पूरी तरह असंभव है. अपने मन को समझाने के लिए इसे क्रान्ति का नाम जरूर दिया जा सकता है.

अभी ये एपीसोड खतम नहीं हुआ है, इसमें जो लोग जोर-शोर से जुड़े हुए हैं, वे दिल से चाहते हैं कि देश से भ्रष्टाचार का बीज मिटा दिया जाये. लेकिन ऐसे भी लोग बहुत हैं, जो अपने व्यक्तिगत फ्रस्ट्रेशन के कारण पूर्वाग्रहों से पीड़ित है या विशुद्ध रूप से तमाशाई हैं. अपनी भड़ास निकालने के लिए सरकार में शीर्ष पर बैठे व्यक्तियों को पूरी ताकत से गालियाँ देकर अपनी लोकप्रियता चाहते हैं. इसमें भी राजनीतिक खेल है.

ताजी-ताजी बात, सोशल नेटवर्किंग पर लगाम लगाने की बात उठ रही है. मीडिया ने हाय-तौबा मचाना शुरू कर दिया है. मैं इस विषय में बिना लाग लपेट के कहना चाहता हूँ कि बहुत हद तक ये बात सही है कि कुछ लोगों ने इस प्लेटफार्म का उपयोग मात्र छिछोरापन व कुछ नामी हस्तियों पर कीचड़ उछालने के लिए किया है या अभी भी कर रहे हैं. इसके पीछे राजनैतिक प्रतिबद्धता हो सकती है अथवा गैर जिम्मेदाराना हरकत. यह हो सकता है कि कई लोग पूर्वाग्रहों से पीड़ित हों लेकिन यह सच है कि कई लेख, कार्टून व वीडियो क्लिप बहुत भद्दे व आपत्तिजनक ढंग से फेसबुक पर आये हैं. अगर यह किसी पक्ष विशेष की छद्म कार्यवाही है तो उनको होशियार हो जाना चाहिए क्योंकि जिस तरह से आतंकबाद के भस्मासुर को पाकिस्तान के हुक्मरानों ने भारत के बिरुद्ध प्रोत्साहित किया और अब उनके अपनी गर्दन तक पकड़ में आ गयी है, ठीक उसी तरह ये कीचड़ उछालो अभियान भविष्य में किसी को भी सुरक्षित नहीं रहने देगा. इसलिए इस ट्रेंड को रोका जाना चाहिए. भाषा के प्रयोग में संयम बरता जाना चाहिए.

जहाँ तक व्यक्तिगत अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की बात है, आपको ये भी सोचना होगा कि आपकी स्वतन्त्रता का अर्थ ये नहीं है कि आपको दूसरों की स्वतंत्रता पर हमला करने का अधिकार मिल गया है.

कृपया इस विषय में सोचिये.
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बुधवार, 7 दिसंबर 2011

कददू ही कददू


"खाओ तो कद्दू से, ना खाओ तो कद्दू से." ये मुहावरा बहुत पुराना है. मेरी समझ में ये नहीं आता कि कद्दू की ऐसी बेइज्जती क्यों की जाती है?

हमारे यहाँ कद्दू एक सस्ता, सुलभ व स्वादिष्ट सब्जी-फल है. नरम हरे बेबी कद्दू की सब्जी घी+अजवाइन का तड़का लगाकर रोटी के साथ स्वादिष्ट डिश है. चावल के साथ मिला कर खाइए तो टप्किया बन जाता है. कुछ और मसाले डालेंगे, जैसे प्याज, अदरक, लहसुन, तो राजेश खन्ना की वावर्ची फिल्म की दास्तान की तरह अंगुली चाटते रह जाओगे. पक्के पीले कद्दू की तो बात ही कुछ और है. वह मीठा हो जाता है. अत: खटाई डाल कर खट-मीठा स्वादिष्ट बन जाता है. हमारे कूर्मांचल में कद्दू को ज्यादा स्वादिष्ट बनाने के लिए जाड़ों की तुषार (फ्रोस्ट) में छत की धुरी में लाइन से सजा कर रख दिया जाता है बाद में गर्मियों में इसका मजा लिया जाता है. आदमी तो आदमी आप अपनी भैंस को भी कद्दू खिलाएंगे तो वह बहुत खुश हो जायेगी. आपको ड्योडा दूध प्रदान करने लगेगी.  

कद्दू की बात पर मुझे अपने एक मित्र नागेश गर्ग याद आ रहे हैं. वे अब इस दुनिया में नहीं रहे. वे लखनऊ के रहने वाले थे. लखनऊ को नखलऊ ही उच्चारित करते थे. वे एक नम्बर के गप्पी थे. आपको हजम हो या ना हो, पर वे सहज में पेल जाते थे. उनकी मजेदार गप्पों में एक तो ये थी कि उनके बेटे की बारात नखलऊ से ४० मील दूर कानपुर गयी. अगले बाराती कानपुर पहुँच गए थे, पिछले नखलऊ में ही थे. दूसरी गप्प कद्दू के विषय में थी कि उनके घर के आगंन में पत्थरों की झिर्री में कद्दू का एक बीज ना जाने कहाँ से आन पड़ा, उग आया, उगा भी ऐसे कि पूरे मोहल्ले में बेल फ़ैल गयी. जब फलीभूत हुआ तो सब तरफ कद्दू ही कद्दू लग आये. नखलऊ वालों ने मुफ्त में खूब कद्दू खाये फिर भी जब अम्बार लग गया, रोड जाम हो गयी तो अपने दोस्त रेल मन्त्री से कह कर टेम्पररी रेल लाइन बिछाई गयी. कई वैगन भर-भर के लन्दन तक कद्दू भेजे गए.

खैर ये तो हुई गप्प, अब मैं आपको अमेरिकी कद्दू की सच्ची बात बताऊंगा कि वहाँ हर साल अक्टूबर महीने के आख़िरी रविवार को एक पर्व मनाया जाता है, जिसे हेलोवीन नाम से जाना जाता है. इस पर्व की कई दिन पहले से तैय्यारी शुरू हो जाती है. घरों के आगे पीछे भूतहा मूर्ति-चित्र, काले कपडे, मकड़ी के नकली जाले सजा दिये जाते हैं. भूत-पिशाचों को भगाने या सम्मानित करने का ये पर्व बड़े जोश-खरोश के साथ मनाया जाता है. बच्चे बूढ़े सभी डरावने मुखौटे लगा कर क्षेत्रीय जलूसों में सामिल होते हैं. विसर्जित होने से पहले बच्चों को टाफी-चाकलेट बांटे जाते हैं. मौज मस्ती का माहौल रहता है. मुझे इसका सांस्कृतिक महत्त्व मालूम नहीं है पर जो देखा वह बहुत मजेदार था. इस पर्व पर पीले रंग के कद्दू विशेष महत्व रखते हैं. हर घर के आगे सजे हुए रहेंगे. बड़े मॉल से लेकर निर्जन स्थानों तक में कद्दू के बाजार लग जाते है. कई जगह तो मैंने असंख्य कद्दू लाइटिंग के साथ क्रिसमस ट्री की तरह सजा कर लटके भी देखे. कुछ घरों के अन्दर-बाहर प्लास्टिक के पीले कद्दू भी देखने को मिले.

यहाँ के कद्दू का रंग हमारे देश के कद्दू से कुछ ज्यादा पीला या लालिमा लिए हुए रहता है. मैं सन २००६ में जब पहली बार अमेरिका आया था तो तब भी ये नजारा देखा था. मुझे एक जगह एक फूटा हुआ कद्दू नजर आया तो मैं उसके कुछ बीज अपने साथ भारत लाया था लेकिन यहाँ उस कद्दू की बेल फली नहीं.

हमारे गाँव में कद्दू के बीजों को भून कर छील कर उसके गूदे को, अखरोट की गिरी को, भंगीरे के बीज या भुने हुए तिल के बीज च्यूडे (भुने हुए चावल) तथा गुड़ सब मिला कर चबैना के रूप में चबाया-खाया जाता था. अभी भी जरूर खाया जाता होगा. मेरे लिए तो वह सब बहुत पीछे छूट गयी याद भर रह गयी हैं. अंत में मैं आपको ये कहना चाहता हूँ कि यदि आपकी कद्दू की बेल खूब फ़ैल रही हो तो उसके नरम टूक्कों की हरी सब्जी जरूर बनाएँ, बहुत मजेदार लगेगी.
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मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

हिलक्रेस्ट ओर्चार्ड, जॉर्जिया, USA


मेरा बचपन उत्तरांचल के आँचल में ही बीता. मैंने बसंत ऋतु के आगमन पर आड़ू और सेव को बौराते हुए देखा था. शिशिर/हेमंत की ठण्ड की मार के बाद पेड़ों में एक भी पत्ता नहीं रह जाता है, और थोड़ी सी गर्माहट मिलते ही, पहले बैगनी आभा वाले श्वेत पुष्प निकलने के बाद ही नव कोपल पत्तों के रूप में प्रस्फुटित होते हैं. एक मदमाती गन्ध फूलों से आती है, मधुमक्खियाँ परागण तो करती ही हैं, स्वयं भी मधु लेकर जाती हैं. हमारे घर गाँव में इक्के-दुक्के पेड़ दूर-दूर लगे रहते थे और वहां के लोगों के लिए ये नजारा विशेष कौतुक या आकर्षण का नहीं होता था. क्योंकि ये उनके जीवन का नित्यक्रम जैसा रहता था.

मैं सन २००८ की सर्दियों में अपने परिवार के साथ हिमांचल के मनाली में हिमपात का आनंद लेने गया तो रास्ते में कुल्लू की मुख्य सड़क के दोनों ओर असंख्य सेव के नंगे पेड़ देखे. इतने सेव के पेड़ एक साथ मैंने पहली बार देखे. मैं उन पेड़ों के एक साथ पुष्पित होने की छटा की कल्पना करके अपने कवि मन को आह्लादित पा रहा था.

इस साल यानि २०११ में, अपने अमेरिका प्रवास के दौरान, मेरी बेटी-दामाद ने मुझे और मेरी श्रीमती को अनेक दर्शनीय स्थलों तक ले जाकर नए-नए अनुभव करने के अवसर दिये. उनमें से एक है, हिलक्रेस्ट ओर्चार्ड, GA, यानि जॉर्जिया राज्य का सेव का बगीचा. अगर आप इन्टरनेट पर तलाश करेंगे तो आपको अमेरिका के अनेकों हिलक्रेस्ट ओर्चार्ड की लिस्ट मिल जायेगी. पर जब आप GA यानि जॉर्जिया लिखेंगे तो उपरोक्त बगीचा मिल जाएगा.

जॉर्जिया एक बहुत बड़ा राज्य है जो संयुक्त राज्य अमेरिका के दक्षिणी हिस्से में है. वैसे तो पूरा देश एक समृद्ध व विकसित राष्ट्र है, पर मुझे जॉर्जिया का हर इलाका, हर संस्थान व हर दर्शनीय स्थल कई मायनों में उत्तम लगे. जॉर्जिया के उत्तर में टेनेसी प्रांत के जोड़ पर हरे भरे पर्वत मालाओं का घेरा है, इसी के आँचल में है ये सेव का बगीचा. अटलांटा से करीब डेढ़ घन्टे की सड़क यात्रा के बाद जो दृश्य मैंने देखा उसकी कल्पना भी नहीं की थी. 

अक्टूबर माह, शनिवार का दिन, सार्वजनिक रूप से अवकास का दिन, जब हमारी कार हिलक्रेस्ट के गेट पर पहुँची तो १००० गाड़ियों की पार्किंग फुल मिली. थोड़ी देर बाद जब कुछ गाड़ियों की निकासी हुई तब जाकर ऐंट्री हो सकी. ओर्चार्ड के अन्दर जाने का टिकट तीन डालर था. खुद सेव तोड़ कर घर ले जाने के लिए एक जालीदार थैला ६ डालर में उपलब्ध था. जाली में ढाई तीन किलो तक सेव रखने की गुंजाइश थी.

बिक्री के लिए सेवों का ढेर वहाँ पड़ा था पर जब हम बागीचे के अन्दर घुसे तो वहा का विहंगम दृश्य देख कर स्वप्न-लोक का सा नजारा लग रहा था. हजारों पेड़ लाल-हरे रंगों के फलों से लदे हुए थे. नीचे जमीन पर गिरे हुए सेव भी असंख्य थे. ऐसा लग रहा था जैसे सेवों के समुद्र में उतर आये हों.



हम ५ भारतीय परिवार साथ गए थे. कुछ के छोटे बच्चे भी साथ में थे. सबने खूब आनंद लिया. अपने घरों से खाना बना कर ले गए थे साथ बैठ कर पिकनिक का सा मजा ले रहे थे. भोजन स्थल पर एक स्टेज था जिस पर आर्केस्ट्रा के धुनों पर कलाकार गाना गा रहे थे. घोड़ा-बग्घी व ट्रेक्टर गाड़ी में इस कई एकड़ में फैले हुए बाग को देखने का इन्तजाम था. दो शताब्दी पुरानी अमरीकी पारिवारिक व्यवस्था का एक मजेदार म्यूज़ियम भी अन्दर देखने को मिला. बच्चों के मनोरंजन के लिए कई खेल तथा झूले थे. अद्भुत मेले जैसा नजारा था.

इसी बाग के दक्षिणी छोर पर बच्चों के लिए विशेष ऐनीमल पार्क बना रखा था, जहां बकरी, खरगोश, मुर्गी, बत्तख, गाय आदि घरेलू जानवर बंधे हुए थे. वहाँ के जानवरों के साथ स्पर्श-सुख (animal petting) लेने का टिकट अलग से ३ डालर था. वहां पर दूध देने वाली गाय भी थी. बच्चे एक-दो धार खींच कर आगे बढ़ जाते थे.

पर्यटकों के लिए रेस्टोरेंट + रेस्टरूम (अमेरिका में बाथरूम को रेस्टरूम कहा जाता है) की सुविधा बहुत थी. वेबसाईट पर लिखा है कि ये मेला सिर्फ सेवों के तैयार होने पर अक्टूबर माह में निश्चित अवधि तक ही चलता है. यहाँ के लोगों को इस अवसर का हर साल इन्तजार रहता है.

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