शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

दु:ख होता है


बम गिर जाये भीड़ पर
सब खो जाएँ दु:ख होता है.
       वज्र गिर जाये चीड़ पर
       वन जल जाएँ दु:ख होता है.

देखा नहीं हो अपनी जाया तक को जिसने,
आहट पर ही मुँह खोल हिलाते हों गर्दन को
पक्षी-शिशुओं के अनजाने में-
कितना निष्ठुर प्रहार नियति का-
यदि घुन लग जाये नीड़ पर
बहुत दु:ख होता है.
         *** 

बुधवार, 4 जनवरी 2012

चमत्कार


सन १९६३ में मैंने धर्मयुग नाम की तत्कालीन हिन्दी साहित्यिक पत्रिका को एक मजेदार घटना लिख भेजी थी पर वह उसमें छपी नहीं. कुछ वर्षों के बाद मैंने उससे मिलती-जुलती हास्य लघुकथा एक दवा कंपनी की प्रचार पुस्तिका में जोक्स के साथ पढ़ी. ये संयोग हो सकता है. मैं उस मूल विवरण को अपने पाठकों तक पहुंचाना चाहता हूँ.

मिस्टर वी. फरार एक एंग्लोइंडियन जेंटलमैन थे. वे हमारे लाखेरी कारखाने में अकाउंट्स क्लर्क के पद पर कार्यरत थे. शक्ल-सूरत में बिलकुल अंग्रेज, गोरी चमड़ी, नीली आँखें और बातचीत में शालीन. देश की आजादी के बाद पूरे कारखाने/कालोनी में वे अकेले ही अंग्रेज ब्रीड के कर्मचारी थे. उन दिनों वेतन बहुत कम होता था, पता नहीं वे उस कम वेतन में कैसे गुजारा करते होंगे? क्योंकि अब मैंने जब अंग्रेजों का रहन-सहन, खान-पान व खर्चों को देखा है तो मैं विश्लेषण करता हूँ कि वे सचमुच गरीबी में जी रहे होंगे. तीन-चार छोटे बच्चे भी थे. उनकी श्रीमती भी उन्हीं की तरह एंग्लोइंडियन थी पर वे हाफ-इन्डियन लगती थी. वे गोवानी थी. घर में उनकी पारिवारिक भाषा अंग्रेजी ही थी.

मेरी मिस्टर फरार से पहली मुलाक़ात आफिस में कुछ आफीशियल कार्य के दौरान हुई और हम दोनों जल्दी ही घनिष्ठा भी हो गये. उनके एक भाई आस्ट्रेलिया में रहते थे, जो कभी-कभी इंडिया आते थे और बहुत सारी गिफ्टस् उनके लिए लाया करते थे. उनके एक पुत्र को मैंने बाद में अपनी कोआपरेटिव सोसाइटी में बतौर क्लर्क भर्ती किया, मैं तब वहां चेयरमैन भी था. ये लोग बड़े सरल तथा सिन्सियर किस्म के थे.

मिस्टर फरार से घनिष्टता होने का एक इन्फोर्मल बोंड ये भी था कि वे एक पुष्प-प्रेमी व्यक्ति थे. उनके जी-टाइप क्वार्टर में आगे पीछे खूब जगह थी, जिसको उन्होंने स्वयं खोद कर पुष्प वाटिका का रूप दे रखा था. उन दिनों मौसमी फूल या तो जनरल मैनेजर के बंगले में खिलते थे या फिर मि. फरार के क्वार्टर में. सड़क से आते जाते उन तरह-तरह के देशी-विदेशी किस्म के फूलों को लोग निहारते जाते थे. मौसम के अनुसार कई रंगों के गुलाब, कई रंगों के कौसमौस, कोलंबाइन, अजेलिया, पैन्जी, बिगोनिया, डेनथासस, ऐस्टर, डेजी, व लिली जैसे नायाब-दिलकश फूल वे उगाते थे. मुझे भी फूलों का थोड़ा बहुत शौक था. मैं भी कोलकता की बटन सीड्स से डाक द्वारा फूलों के बीज मंगाता रहता था. कई बार हमने बीजों/पौधों की अदला-बदली भी की.

मि. फरार के पास पालतू खरगोश भी थे, घर के पिछवाड़े उनके लिए पिंजड़े बना रखे थे. मुझे भी उन्होंने दो प्यारे से खरगोश के बच्चे दिये थे, तब मेरे घर अपने बच्चे नहीं हुए थे. हम उन्हीं से खेलते रहते थे. खरगोशों ने मेरे क्वार्टर की आगंन-बाड़ी में अपना बिल खोद लिया था, जहाँ उनका परिवार बढ़ता रहा.

मि. फरार से मेरी मित्रता उनके रिटायरमेंट के बाद भी अन्तिम समय तक रही. एक बार उन्होंने बताया कि खरगोश पालने का शौक उनको पहले से था. वे शुरू में दो खरगोश के बच्चे कहीं दूर से लाये थे. उस वक्त उनके पास पिंजड़ा नहीं था तो एक खरगोश को बिल्ली खा गयी. जब दूसरा अकेला रह गया तो उसकी बहुत हिफाजत होने लगी. वह रुई के फाहे की तरह सुन्दर व नरम था, सफ़ेद बालों के अन्दर लाल-लाल आँखें, बहुत आकर्षक लगता था. दुर्भाग्यवश सर्दियों में उसे ठण्ड लग गयी और एक दिन मर गया. क्वार्टर के पीछे बंजर जमीन थी, वहीं गड्ढा खोद कर उसे गाढ दिया गया. अगली सुबह उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब उन्होंने उसे साफ़ सुथरा, पिछवाड़े पिंजड़े के अन्दर पड़ा हुआ पाया. उन्होंने उत्कण्ठावश जब उसे टटोला तो पाया कि वह तो मरा हुआ ही था. अब प्रश्न ये हुआ कि कब्र से उठ कर नहा धो कर वह पिंजड़े में कैसे पहुंचा? बहुत दिनों तक तो वे उसे क्राइस्ट का चमत्कार समझते रहे, पर एक दिन राज खुल गया.

तीन चार क्वार्टर छोड़ कर भंवरलाल जोशी रहते थे. एक शाम उन्होंने देखा कि उनका पालतू रोडेशियन कुत्ता फरार साहब के खरगोश को मुँह में दबा कर पिछवाड़े से अन्दर ला रहा था. जोशी जी को बड़ा दु:ख व अफ़सोस हुआ कि उनके कुत्ते ने बड़ा अपराध कर डाला, अत: कुत्ते की पिटाई की गयी. खरगोश के विषय में दोनों पति-पत्नी ने विचार-विमर्श के बाद तय किया कि धो-धा कर साफ़ करके चुपके से खरगोश की लाश को मि. फरार के घर में पीछे की तरफ डाल दिया जाये, ताकि मृत्यु का कारण प्रश्नचिह्न की तरह बना ही रहे. भंवरलाल जोशी खरगोश को चुपके से जाकर पिछवाड़े रखे खाली पिंजड़े में डाल आये.

जब आफिस में मरे हुए खरगोश का नहा-धो कर वापस पिंजड़े में आने की चर्चा जोरों से चल पडी तब जोशी जी ने सच्चाई बताने का साहस किया.
                                        ***

मंगलवार, 3 जनवरी 2012

कुल-घात


कमरुद्दीन अंग्रेजों के जमाने का पुलिस-मैन था. पुलिसियत उसके बच्चों में भी बचपन से ही आ गयी थी. उसने अपने जीते जी एक बड़ा मकान बूंदी रियासत की राजधानी में खोजा गेट के पास बना लिया था, मगर मकान का नक्शा पर्दा प्रथा के  हिसाब से ऐसा बना कि बाद में दोनों बेटों के लिए झगड़े का कारण बना.

कमरुद्दीन पढ़ा लिखा नहीं था इसलिए सिपाही का सिपाही ही रहा. उसकी हसरत थी कि उसके बेटे एस.पी., डी.आई.जी तक बनें पर बड़ा लड़का अल्लाउद्दीन पढ़ने लिखने में फिसड्डी निकला. बमुश्किल हाईस्कूल पास कर सका, इसलिए उसे भी सिपाही में ही भर्ती करवाना पड़ा. बीच में पाँच लडकियां भी थी, जिनका कम उम्र में ही निकाह करवाकर नजदीकी रिश्तेदारी में ही ससुराल कर दिया गया. छोटा बेटा सलाउद्दीन बड़े अल्लाउद्दीन से १८ साल छोटा था, उसके ठीक से होश सँभालने से पहले ही कमरुद्दीन अल्लाह को प्यारे हो गए. अत: उसकी सारी जिम्मेदारी अल्लाउद्दीन पर ही आ गयी. वह बारहवीं तक पढ़ा उसके बाद उसे मैकेनिकल इंजीनियरिंग का डिप्लोमा कोर्स करने के लिए सुदूर कर्नाटक राज्य के एक प्राइवेट कॉलेज में भेजा गया. इस बीच अल्लाउद्दीन प्रमोशन पा कर पहले हेड कोंस्टिबल व बाद में थानेदार हो गया था. आर्थिक दृष्टि से भी वह संपन्न हो गया था क्योंकि ऊपर की कमाई बेहिसाब हो रही थी. कहने को उस कमाई का हिस्सा ऊपर को भी जाता था पर उसकी कोई जाँच नहीं होती थी.

कोटा के एक उद्योग नगर थाने में अपनी पोस्टिंग का लाभ लेकर अल्लाउद्दीन ने छोटे भाई को एक कारखाने में जूनियर इंजीनियर के पद पर लगवा दिया. अपने लिए गुमानपुरा इलाके में एक आलीशान मकान खरीद लिया. खुदा ने उसे सब कुछ दिया था पर औलाद से नहीं नवाजा इसलिए छोटे भाई सल्लाउद्दीन के बेटा पैदा होते ही उसने उसे गोद ले लिया.

सल्लाउद्दीन के और भी बच्चे बाद में हुए. उसने अपने परिवार को बूंदी के पैतृक मकान में ही रखा. नए जमाने की हवा अरब देशों की तरफ चली तो सल्लाउद्दीन भी कोटा की नौकरी छोड़ कर अबू धाबी चला गया, जहाँ उसे लाखों का वेतन व सुविधाएँ मिलने लगी. थानेदार साहब तो एक दिन रिटायर हो गए. रिटायरमेंट से पहले ही बेटे शकील को उन्होंने इंटेलिजेंस डिपार्टमेंट में इन्स्पेक्टर बनवा कर अपने रसूख का भरपूर लाभ उठा लिया. इतना सब कुछ होते हुए भी ना जाने क्यों अल्लाउद्दीन साहब को ऐसा लगता था कि छोटा भाई ज्यादा दौलत वाला हो गया है. अत: उन्होंने एक दिन उसको कह ही डाला कि उसको पढ़ा लिखा कर इस स्थिति में लाने के लिए उन्होंने बहुत खर्चा किया है इसलिए या तो १० लाख रूपये एकमुश्त दे दे अथवा २५ हजार रुपये हर महीने दिया करे.

सल्लाउद्दीन को ये कत्तई कबूल नहीं हुआ. उसकी सोच थी कि अपनी पहली औलाद दे कर उसने सारे कर्जे चुका दिये हैं. यों मन मुटाव शुरू हुआ. इसके बाद थानेदार साहब ने कहा कि आधे मकान की कीमत दस लाख रूपये चुकाए जाएँ क्योंकि पूरे मकान को सल्लाउद्दीन ही इस्तेमाल कर रहा था. सल्लाउद्दीन ने जवाब दिया कि उसको थानेदार साहब का हिस्सा नहीं चाहिए तो बात बहुत बिगड़ गयी. अल्लाउद्दीन ने अपनी तरफ के दरवाजे व गेट बंद कर दिये जिस कारण सल्लाउद्दीन के परिवार को घर के पिछवाड़े दूसरों की नाली पार करके आने जाने की मुसीबत हो गयी. सल्लाउद्दीन ने अदालत का दरवाजा खटखटाया पर वहाँ पाँच सालों तक तारीख ही बदलती रही. एक दिन दोनों भाइयों के बीच मार-पीट होते होते बची.

शकील अपने बड़े अब्बा के रवैये से बड़ा दु:खी था पर उनके रौब व धौंस के सामने बोल नहीं सकता था. अल्लाउद्दीन का संपर्क अनेक नामी बदमाशों के साथ भी था. एक दिन जब सलाउद्दीन हिन्दुस्तान आया हुआ था तो बिना कोई सबूत छोड़े, उसे गोली से मरवा दिया गया. वह मरते मरते बयान दे गया कि उसके बड़े भाई ने ही गोली चलवाई थी. मामला अखबारों में भी उछला पर अल्लाउद्दीन के खिलाफ सीधी सीधे सबूत नहीं होने से कोई कार्यवाही नहीं हो सकी. लेकिन परिवार व रिश्तेदारी में तनाव तो आना ही था. जायदाद व पैसों की हवस ने एक कुनबे को बुरी तरह बर्बादी के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया.

इस पूरे प्रकरण में शकील अपने बड़े अब्बा से दूर दूर होता गया. उसे उनके रवैये से साफ़ लग रहा था कि उसके अब्बू को मरवाने में उन्ही का हाथ था. वह मानसिक रूप से बीमार रहने लगा, जिसकी परिणति उसकी सर्विस रिवाल्बर से बड़ी अब्बू की छाती को छलनी करने में हुई.

शकील ने अपना जुर्म कबूल लिया और वह जेल में है. परिवार का अब कोई भी खैर ख्वाह नहीं रहा.
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रविवार, 1 जनवरी 2012

शुभाकांक्षा


चलो एक वर्ष और चल बसा. इसने कई कर्ज और फर्ज नवजात के लिए छोड़े हैं. हम सब का कर्तव्य है कि इस बच्चे को सही मार्गदर्शन कराएं.

ये शोक मनाने और एक दूसरे को दोषारोपण करने का समय नहीं है. तमाम पूर्वाग्रहों को छोड़ कर अपनी स्लेट को साफ़ करके प्यार भरी इबारत लिखी जाएँ. ईमानदारी से नए संकल्प किये जाएँ. इसमें अबेर न की जाये क्योंकि इसकी उम्र केवल ३६६ दिन है. इसको सफलता व सिद्धि का आशीर्वाद तभी फलित होगा जब हम सब सर्वजनहिताय की सोच रखें, केवल परम्परागत रूप से शुभकामनायें कह कर या लिख कर इतिश्री ना हो.
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बूबू


हम बंगाली लोग नाना को भी दादू कहते हैं और दादा को भी दादू ही पुकारते हैं. यहाँ कुमायूं में नाना-दादा को बूबू कहा जाता है. यों किसी भी बुजुर्ग को बूबू कहना सम्मानसूचक होता है.

मैंने अपने सगे दादू को कभी नहीं देखा. मेरे बाबा बताते हैं कि सन १९७१ में बांग्लादेश छोडने के बाद वे हमेशा ही बीमार रहे और अपने सोनार देश को याद करते करते चल बसे थे. मुझे तो उनकी तमाम बातें अब रामायण-महाभारत की सी कहानी लगती है, क्योंकि मेरा जन्म तो २१वीं सदी में उत्तराखंड के रुद्रपुर शहर के पास बंगाली बस्ती में हुआ और मैंने अपने पहले सूरज को भारत की धरती पर ही देखा, हाँ अलबत्ता मेरे बाबा अपने बचपन की बातें बताते हुए बहुत भावुक हो जाते हैं क्योंकि उनको अन्य हिन्दू परिवारों के साथ खुलना जिले के बागेरहाट से भाग कर जान बचाते हुए भारत आना पड़ा. बाबा ये भी बताते हैं कि बागेरहाट रुपसा नदी के सुरम्य तट पर बसा हुआ कस्बा है, बहुत सुन्दर दृश्यावलियों वाली जगह है. हमारे खेत होते थे, आम, केले, नारियल, चीकू आदि फलों के पेड़ होते थे, अंगूर की खेती होती थी और नदी में बहुत सी रोहू मछली भी मिलती थी. चूंकि मैंने वह कभी देखा नहीं इसलिए मुझे मलाल नहीं होता है पर मेरे बाबा तो याद करते रहते हैं. क्यों ना करे, उसका तो इस पालायन में सब कुछ पीछे छूट गया, वह एक काश्तकार से मजदूर जो बन गए थे.

रुद्रपुर में ऐसे ५०-६० घर थे जो पाकिस्तानियों के अत्याचार सहन कर यहाँ ए बी सी ही से अपनी जिंदगी शुरू करके जी रहे थे. ये तो अच्छा हुआ यहाँ की सरकार ने सबको शरण दी और भोजन कपडे देकर ज़िंदा रहने के आधार दिये. कई सालों तक तो उन झोपड़ पट्टियों में रह कर निरुदेश्य जी रहे थे पर अब यहाँ के समाज में सभी बंगाली आत्मसात हो गए हैं. नागरिक अधिकार भी मिल गए हैं. पर पेट भरने के लिए मेहनत-मजदूरी तो करनी ही पड़ती है. यहाँ तराई भाबर में खेती-बाडी का बहुत काम मिलता है. अब तो सिडकुल में सैकड़ों कारखाने लगने के बाद सबकी गाड़ियों को पटरी मिल गयी है. हम बंगाली बच्चे स्कूल जाने लग गए थे. मैं अभी दसवीं में पढता हूँ.

मेरे बाबा मेसन का काम करते हैं. यहाँ हल्द्वानी में चारों तरफ मकान बनते रहते हैं. मेरे बाबा मुझे और मेरी माँ को लेकर बूबू के मकान के आहाते में बने किराए के कमरों में पिछले आठ सालों से रहते आये हैं. बूबू बताते थे कि पहले उन्होंने यहाँ एक मुर्गीखाना बनाया था. बूबू कभी कभी अपने बच्चों के पास चले जाते थे. अक्सर यहाँ अकेले रहते थे. अब बूबू काफी बूढ़े हो चले थे इसलिए बूबू को हमारी और हमको बूबू के आश्रय की हमेशा जरूरत रहती थी. बूबू ने एक खाना बनाने वाली भी रखी थी जो सुबह-शाम आती थी. वह हमको डांटती रहती थी. मुझे उससे डर लगता था लेकिन बूबू तो मुझे बहुत प्यार करते थे. मेरा नाम विमलेन्दु राय है पर बूबू तो मुझे विमल कह कर ही बुलाते थे.

बूबू के साथ मुझे बहुत अच्छा लगता था वे पहले पहले तो लाठी टेक कर या रिक्शा बुलाकर बाजार तक जाते थे तो मेरे लिए चाकलेट, टॉफी, बिस्कुट या केला लाना नहीं भूलते थे. पर जब से बूबू की नजर ज्यादा कमजोर हो गयी वे मुझे या मेरे बाबा को बाजार का काम बताने लगे थे. बूबू को भुक्कंनलाल हलवाई की दुकान की जलेबी औए समोसे बहुत पसंद थे, वे अक्सर दही के साथ ये चीजें मंगवाया करते थे. मुझे भी उसमे हिस्सा मिलता था. खाना खाते समय भी कई बार बूबू मुझे बुला लेते थे. उनके द्वारा दिया गया भोजन मुझे अत्यंत प्रिय लगता था.

बूबू बताते रहते थे कि उनके कुछ बच्चे सात समुन्दर पार रहते हैं. बूबू के पास फोटो की एल्बम भी थी. वे मुझे अपनी व अपने परिवार की फोटो दिखाते रहते थे, कहते थे कि दुनिया बहुत बड़ी है. बूबू ने जवानी में आर्मी में भी काम किया था और अनेक देश देखे थे. वे हवाई जहाज़ों में भी खूब सैर कर चुके थे. मैं बूबू के साथ बैठ कर उनके टीवी पर सिनेमा देखा करता था, बूबू तो अक्सर सो जाया करते थे, मुझे ही टीवी बंद करना पडता था. बूबू की नजर कम हो गयी तो मैं ही बूबू के टेलीफोन नम्बर मिलाकर उनको देता था. बूबू मेरे स्कूल से आने का इन्तजार करते मिलते थे.

बूबू पेपर वाले से बच्चों के मैग्जीन  चम्पक व नंदन जरूर लेते थे और खुद उन कहानियों को बार-बार पढ़ते थे, मुझे भी सुनाते थे.

बूबू के बाग में दस पेड़ आम के और पाँच पेड़ लीची के थे. ये पेड़ बूबू ने खुद अपने हाथों से लगाये थे. गर्मियों में जब उनके फल पकते थे तो बहुत से लोग लेने आ पहुंचते थे. मेरे बाबा कहते है कि इतने आम तो उन्होंने बागेरहाट में भी नहीं खाए थे. बूबू बहुत सारी दवाइयां भी खाते रहते थे, मुझे उनकी दवाएं छांट कर देने का काम भी करना पड़ता था. बूबू घर के सामने आने जाने वाले सभी पर नजर रखते थे पर कोई भिखारी बूबू के घर से खाली हाथ नहीं जाता था, वे मेरे हाथों से ही सिक्के या आटा दिलवाया करते थे.

उस दिन स्वतन्त्रता दिवस था, स्कूल में झंडारोहण व खेल कूद थे. मैं जब घर लौटा तो लोगों की भीड़ जमा थी, सब तरफ खामोशी थी, मुझे मालूम हुआ कि बूबू अब इस सँसार में नहीं रहे, सुबह तो वे मेरठ जाने की बात कह रहे थे. अचानक स्वर्ग चले गए. उस रात मैं सो नहीं सका, बाहर भीषण वर्षा होती रही थी. सुबह बूबू का एक लड़के के आने के बाद उनको रानी बाग, चित्रशिला घाट अन्तिम संस्कार के लिए ले गए. मेरे बाबा भी गए थे. मैंने उस दिन खाना भी नहीं खाया.

कुछ दिनों तक घर में भीड़-भाड़ रही उसके बाद सभी चले गए थे. ये अब तीन साल पुरानी बात हो गयी है. मैं अकेले उनको याद कर के रोता हूँ. बूबू का कुत्ता शेरू जानता है कि उनकी याद में मैं बहुत उदास हूँ. वह टुकुर टुकुर मेरे चहरे पर देख कर मन के भाव पढ़ने की कोशिश करता है लेकिन मैं जानता हूँ कि शेरू भी उनकी राह ताकता रहता है. आज भी ना जाने मुझे ऐसा क्यों लगता है कि बूबू यही कहीं हमारे आस पास ही हैं.
                                         ***