रविवार, 18 सितंबर 2011

कर्म प्रधान विश्व रचि राखा

परमेश्वर ने हम मनुष्यों को तमाम नियामतों से नवाजा है, साथ ही ऐसे माया-जाल में भी उलझा रखा है कि जब तक संभलें जीवन पूरा हो जाता है. बहुत सी इच्छाएं आकांक्षाएं अधूरी रह जाती हैं. सनातन धर्म के अनुसार अतृप्त इच्च्छओं की वजह से ही प्राणियों को बार-बार जन्म लेना पड़ता है. इसी जन्म-मरण के क्रम में पाप और पुण्य की परिभाषाएँ बनाई गयी हैं. माया-मोह का एक सुन्दर उदाहरण स्कन्द पुराण में वर्णित है. कि एक त्रिकालदर्शी गुरू ने अपने आश्रम में अपने चेलों को बुला कर कहा अब उनका शरीर जीर्ण हो चुका है और इसको छोड़ने का समय नजदीक है. जैसा भगवत गीता में भी लिखा है वासांसि जीर्णानि यथा विहाय:...

गुरू ने अपने अगले जन्म का गुणनफल कर के बताया कि कर्मानुसार उनका जन्म शूकर (सूअर) योनि में होना है. अमुक तिथि को, अमुक स्थान पर, अमुक शूकरी के गर्भ से वे बाहर निकलेंगे. पूरी कैफियत उन्होंने बता दी और कहा कि सूकर योनि में वे नहीं रहना चाहेंगे क्योंकि ये योनि प्राणियों में सबसे निकृष्ट है. बिस्टाभोज्यी व नारकीय है. अत: उन्होंने अपने चेलों से कहा कि शूकर के बालरूप में पैदा होते ही उसको मार दिया जाए.

चेलों ने गुरू जी से पूछा कि शूकरी के तो अनेक बच्चे होंगे आपको पहचाना कैसे जाएगा?

गुरू ने बताया, "मैं अकेला ऐसा रहूँगा जिसके सफ़ेद तिलक निकला होगा.

चेलों ने गुरू जी की आज्ञा शिरोधार्य की. गुरू जी ने जब शरीर त्याग दिया तो निश्चित तिथि पर, निर्धारित स्थान पर चेलों ने देखा कि शूकरी के १२ बच्चे पैदा हो गए हैं, उसमें से एक तिलकधारी अलग ही दीख रहा था. चेलों ने उसे समूह से अलग करके मारने के लिए हथियार उठाया तो वह बच्चा आर्तस्वर में बोला, मुझे मत मारो, मैं अभी-अभी इस संसार में आया हूँ. मेरी माँ व मेरे भाई-बहन सब यहाँ हैं. मुझे उनसे अलग मत करो.

चेलों ने आपस में चर्चा की और निर्णय किया कि गुरू जी स्वयं बोल रहे हैं तो मारना उचित नहीं है. उनको कर्मों के फल नियति के अनुसार भोगने दो .

इस प्रकार महान ज्ञानी भी माया जाल से बाहर नहीं निकल पाए.

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शनिवार, 17 सितंबर 2011

गोल्ज्यू का वरदान

बागेश्वर एक तीर्थ है, जहाँ साक्षात् कैलाशपति विराजते हैं ऐसी मान्यता है. सरयू व गोमती का संगम होता है, और सरस्वती की परिकल्पना की जाती है कि वह लुप्त है.

पंडित बद्रीदत्त पांडे, जिन्होंने ‘कुमायू का इतिहास’ लिखा है, ने विस्तार से बागेश्वर की महिमा का वर्णन किया है. आस-पास पर्वतमालाओं का आलेख भी इसमें है.

पश्चिम दिशा में खड़ी-धार पहाड़ी, विनसर वाली पर्वत-श्रंखला का उत्तरी किनारा है. सामने चीड़ का ऊंचा जंगल ‘कुकुड माई का डाना (पहाड़)’ है वहाँ से दृष्टि डालिए तो समुद्र ताल से ४५०० फीट की ऊंचाई पर बसा एक गाँव नजर आता है नाम है जौलकांडे. जिसकी बसावट सैकड़ों साल पुरानी है. वहां २०-२५ घर थे. अधिकतर खेतिहर ब्राह्मण परिवार थे. गाँव के चारों ओर बांज, फयाँठ, चीड, तूनी, क्वेराला के पेड़ रहे है. हिसालू, किलमोड़ी, काफल, तिमिल, बेडू, जैसे जंगली फल भी धौल के झाड़ियों के साथ बहुतायत में यहाँ उगते रहे है. आज भी गाँव में आडू, खुबानी, आलूबुखारा, नींबू, गलगल, नाशपाती के अनेक पेड़ लगाए जाते हैं.

उत्तर दिशा में गाँव का मुख है. उत्तुंग धवल हिमालय अंधियारी रातों में भी दमकता दीखता है. जापान की मिसाल दें तो सबसे पहले सूर्योदय इसी गाँव में होता है क्योंकि यह ऊंचाई पर स्थित है. अन्य पहाड़ी गाँव की तरह यह भी स्वावलंबी गाँव रहा होगा, पर अब बाजारीकरण हो गया है. पढ़े-लिखे परिवार सब बाहर निकल गए हैं, या निकल रहे है. गर्मियों में पानी की कमी हो जाती है क्योंकि ऊंचाई के कारण जल-श्रोत सूखने लगते हैं.

गाँव में पुरोहित चामी गाँव से आते रहे हैं. चामी में कर्म-कांडी वृत्ति वाले पांडे लोग रहते हैं. ये उनका पुस्तैनी कार्य रहा है, आज भी है.

यह कथा अब से सौ वर्ष पुरानी है. पंडित कुलोमणि पांडे एक बालक का उपनयन संस्कार करने हेतु आये थे. आजकल तो लोग जनेऊ कराने का दस्तूर भर करने लगे हैं, पर तब ऐसा नहीं था. यह सोलह संस्कारों में एक अहम संस्कार होता है. बालक का नाम था भागीरथ. भागीरथ नाम भी पंडित कुलोंमणि ने ही नामकरण संस्कार के समय बालक के कानों में सर्वप्रथम शंख कान पर लगाकर सुनाया था. उन्होंने तब रघुवंशी भागीरथ की कथा उपस्थित लोगों को सुनाई थी, आज फिर सुनाई. बच्चे बड़े सभी ने आनंद से कथा को सुना.

बालक भागीरथ के मन में कुछ बड़ी हिलोरें चल रही थी. वह सोच रहा था कि उसके गाँव में भी यदि गंगा अवतरण हो जाता तो पानी की समस्या हल हो जाती. उसने मन ही मन सोचा कि वह भी तपस्या करेगा. अगले दिन से वह ग्राम देवता गोल्ज्यू के थान (छोटा सा मंदिर) पर जाता १०-१५ मिनट तक एक पैर पर खड़ा रह कर प्रार्थना करता, “भगवान मेरे गाँव में भी गंगा दे दो.” कई दिनों तक ये क्रम चलता रहा. निष्कपट, भोला, व आस्थावान बालक की नित्य प्रार्थनाएं सुनकर सचमुच एक दिन श्वेत वस्त्रधारी गोलू देवता श्वेत अश्व पर विराजमान साक्षात प्रकट हो गए.

उन्होंने बालक से प्रसन्नता पूर्वक पूछा, “क्या चाहिए भागीरथ?”

भागीरथ उनकी उपस्थिति से एकाएक भोंचक्का रह गया, बोला, “गंगा चाहिए.”

गोल्ज्यू ने फिर पूछा, “कुछ और भी चाहिए?”

“सरस्वती चाहिए,” बालक ने कहा.

गोल्ज्यू ने फिर से पूछा, “और कुछ?”

भागीरथ ने कहा, “और कुछ नहीं चाहिए.”

गोल्ज्यू ने कहा, “जो तू मांग रहा है वह तुझे अवश्य मिलेगी पर सब तरफ ढाल है रुकेगी नहीं.” इसके बाद “तथास्तु” कह कर गोलू देवता घोड़े सहित अंतर्ध्यान हो गए.

बालक खुश हो गया. वह आश्वस्त था कि भगवान ने जो कहा वह गलत नहीं हो सकता है. उसको एक बात का मलाल रहा कि वह गंगा के आने के समय पर बात नहीं कर पाया. अब सब काम अपने समय से ही होगा ये सोच कर बात आगे बढ़ गयी. भागीरथ जवान हो गया. गंगा वाली बात आई गयी हो गयी. पर भगवान ने जो कहा है वह तो होना ही था. भागीरथ का विवाह हुआ, पत्नी का नाम था गंगा. दो वर्ष बाद उसको एक पुत्री प्राप्त हुई, नाम पड़ा सरस्वती. इस प्रकार गाँव में गंगा और सरस्वती दोनों आ गयी. देवता का कहा असत्य नहीं हो सकता है.

ये तो था दृष्टांत.

अब इसका दार्ष्टताँत प्रत्यक्ष में आज इस गांव के अनेक डिग्रीधारी, डाक्टरेट किये हुए लोग बाहर दुनिया में फैले हुए हैं, कोई जलशास्त्र में, कोई अर्थशास्त्र में, कोई आरोग्यशास्त्र में, कोई शिक्षा-शास्त्र में तो कोई व्यवहार-शास्त्र में पारंगत है. ये सब गोल्ज्यू का आशीर्वाद है. गंगा-सरस्वती की धारा वहाँ रुके या ना रुके पर वहाँ से बह  जरूर रही है.

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शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

मैली चादर

जाको प्रभु दारुण दु:ख दीन्हा
ताकी मति पहले ही हर लीन्हा.

कुछ ऐसा ही हुआ इस सेठी परिवार के साथ. परिवार के मुखिया सतपाल सेठी पेपर मिल में स्टेनोग्राफर थे. फोरमैन कालोनी में तीन कमरों वाला घर मिला हुआ था. पत्नी चँचल वास्तव में चंचल व अति महत्वाकांक्षी थी. दो दो साल के गैप में तीन बच्चे उनके हो गए थे. लडकियां थी सोना और मोना, और छोटा लड़का बिट्टू तो सबका लाडला था.

कालोनी में इस परिवार का स्टेंडर्ड आफ लिविंग सबसे ऊँचा था. फर्नीचर से लेकर आम सजावट तक पूरा घर अलग ही दीखता था. घर में पंखे, फ्रिज, रेडियो, टेप रेकार्डर, सब ठाठदार चीजें थी. जब एयर-कूलर का चलन हुआ तो सबसे पहले सेठी जी के खिड़की पर ही लगा. तब फैक्ट्री एरिया में दो-चार आफीसरों के पास कार हुआ करती थी. सेठी जी शौक़ीन मिजाज के थे सो एक पुरानी फिएट कार उनकी दरवाजे पर भी खड़ी रहती थी.

उन दिनों टेलीविजन नहीं आया था. कालोनी के बाहर थोड़ी दूर पर एक सिंगल मशीन वाला सिनेमा टाकीज था. मनोरंजन का ये एकमात्र बड़ा साधन होता था. थियेटर का मालिक दोलाशा भाई एक पारसी था जो बड़ा ऐय्याश व खुराफाती आदमी था. उसकी नजर चंचल पर पडी तो उसने एक दिन अच्छी तनखाह का लालच देकर महिला कोष्टक की गेटकीपर बनने का आफर चंचल को दिया. उसने मंजूर भी कर लिया. यहीं से परिवार के विघटन की नींव पड गयी. कहते हैं कि इश्क और मुश्क छुपाये नहीं छुपते हैं. यही हुआ. जब चंचल पूरी तरह दोलाशा के चंगुल में आ गयी तो बाजी सतपाल सेठी के हाथों से निकल गयी. झगड़े हुए, लफड़े होते रहे. सेठी ने उससे अघोषित तलाक ले लिया. एक ही छत के नीचे रहते हुए भी अनजानों की तरह बिना बोलचाल के रहे.

कुछ वर्षों के बाद दोलाशा की म्रत्यु हो गयी. थियेटर नए मालिक को बिक गया तो चँचल की नौकरी भी चली गई.
चँचल ने एक प्राइवेट स्कूल के हेडमास्टर पर डोरे डाले और नई जगह गोटी फिट हो गयी. घर में तनाव रहता ही था पर खोखले मॉडर्न होने का दिखावा बरकरार था. पूरी कालोनी में इसे बदनाम घर कहा जाने लगा था. लडकियां सयानी होती जा रही थी.

ये भी है कि जैसे को तैसा मिल ही जाता है. एक नया इंजीनियर वागीश धवन काशीपुर आया तो संयोग से वह इस परिवार से टकराया. परिवार ने इतना प्यार-महोब्बत दिखाया कि वह इन्हीं का हो कर रह गया. बाद में बड़ी बेटी सोना का विवाह आर्य समाज मंदिर में जाकर तुरत-फुरत उसके साथ कर दिया. वागीश के घरवाले इस रिश्ते के बिलकुल खिलाफ थे.

जंवाई को अलग क्वार्टर मिल सकता था, पर चँचल ने लेने नहीं दिया. डेढ़ साल के अंतराल में सोना ने दो बेटियों को जन्म भी दे दिया. इसी दौरान वागीश धवन को मेरठ के किसी दूसरे कारखाने में ज्यादा वेतन पर नौकरी मिल गयी. ससुरालियों के ना चाहने के वावजूद वह वहां से चला गया. चँचल ने अपनी बेटी तथा नातिनों को जाने से रोक लिया. धवन अपनी बीबी व लड़कियों को प्राप्त करने के प्रयास करता रहा. अदालत तक गया लेकिन सोना व उसकी लड़कियों ने धवन के साथ जाने से इनकार कर दिया. उलटे अनेक झूठे गंभीर आरोप उस पर जड़ दिए. धवन ने इसके बाद उन सबको याद करना छोड़ दिया. वह अब कहाँ चला गया. किसी को पता नहीं.

नातिनें डी.ए.वी स्कूल में पढ़ रही थी. घर का माहौल ऐसा था कि फेल होने लगी. ये भी सच था कि घर में बहुत से अनजान विजिटर आने लगे थे. कुछ समय बाद कालोनी में चर्चा हुई कि सोना एक सिख ड्राइवर के साथ पंजाब जाकर बस गयी है. मोना अदालत में एक वकील के साथ काम करने लगी थी. थोड़े दिनों के बाद ये खबर भे फ़ैली कि उस विधुर अधेढ़ वकील के साथ उसने शादी रचा ली है. लड़का बिट्टू घर के तमाम तमाशे व कार्यकलापों से त्रस्त होकर एक दिन गायब हो गया. बाद में कुछ लोगों ने उसे गाजियाबाद में देखा. वह वहाँ क्या करता है? कैसे रहता है? किसी को नहीं पता.

सतपाल सेठी मानसिक रूप से अस्वस्थ हो गया और अपनी दैनिक क्रियाओं में भी असंयत हो गया तो फक्ट्री ने उसे नौकरी से निकाल दिया. कुछ साथियों ने उसे बरेली के पागलखाने में जा भर्ती करवा दिया. वह अभी भी वहीं है. जाने कब तक रहना होगा कोई नहीं कह सकता.

अब क्वार्टर खाली करना ही था. कालोनी के बाहर रोड साइड पर चँचल ने तीन कमरों वाला एक मकान बनवा लिया. उसमे रहने वाले अब वह स्वयं तथा दो नातिनें रह गयी. कुछ समय बाद बड़ी नातिन भी एक टेलर के साथ चली गयी. उसकी भी खबर ये है कि उसने उस टेलर के साथ निकाह कर लिया है. छोटी नातिन नानी के साथ रह गयी. दुर्भाग्य अकेले नहीं आता है. चँचल बीमार रहने लगी, ज्वर उतरता ही नहीं था. रामपुर जाकर जाँच कराई गयी तो उसे HIV पाजिटिव बताया गया. दिन घसीटते हुए एक रात उसने प्राण त्याग दिए. छोटी नातिन ने सुबह कुछ परिचित जनों को रोते हुए खबर की. लोग डरते-डरते आये. श्मशान ले जाने के लिए काठी तैय्यार की. गिने चुने लोग ही थे.

अर्थी को लेकर बाजार के बीच से चले तो सबने देखा उसके ऊपर की चादर बहुत मैली थी.

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चुहुल - ३

आंध्रप्रदेश के एक मुख्यमन्त्री केवल तेलुगु भाषा का ज्ञान रखते थे. वे किसी जमाने में सड़क छाप हुआ करते थे. कभी कभी आदमी के सितारे बुलंद होते हैं. पार्टी में उनकी वफादारी तथा सक्रियता उनको इस पद तक ले आई थी. मुख्यमन्त्री के रूप में जब वे अपने लाव-लश्कर के साथ हैदराबाद शहर में कार से जा रहे थे तो रास्ते में उनको अपने पुराने दिनों का सिनेमाहाल नजर आया. उन्होंने अपने पी. ए. से पूछा, इसमें आजकल कौनसी पिक्चर चल रही है?

पी. ए. ने कहा, सर आजकल रिनोवेशन चल रहा है.

मुख्यमन्त्री ने कुछ नाराजी के स्वर में कहा, तेलुगु देश में अंग्रेजी पिक्चर कितने लोग समझेंगे?

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नेहरू जी को आगरा के पागलखाने के नए विंग के उद्घाटन के लिए बुलाया गया था. तब सेक्युरिटी का तामझाम आजकल की तरह नहीं होता था. नेहरू जी के साथ बड़ी टीम थी. एक पागल घूमता हुआ उनके सामने आ गया और बोला, अच्छा, तुम अपने आप को जवाहर लाल नेहरू समझते हो?

नेहरू जी ने हँसते हुए कहा, हाँ, मैं जवाहरलाल ही हूँ.


पागल मुस्कुराया और बोला ठीक है, मैं भी जब यहाँ आया था तो अपने आप को महात्मा गांधी समझता था.

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एक पति और उनकी पत्नी के बीच बहुत प्यार था. एक दिन पति सोते ही रह गए, उठे नहीं. पत्नी विलाप करती रह गयी, "कुछ बता कर भी नहीं गये, कुछ कह कर भी नहीं गए."

समय का चक्का तो घूमता ही रहता है. उनको गुजरे साल होने को आया. एक दिन जब वह याद कर-कर के रो रही थी तो एक रिश्तेदार ने बताया कि एक तांत्रिक है जो प्लेनचिट् (टेलीग्राफ मशीन जैसी डिवाइस) से दिवंगत आत्मा से बात कराता है. उसे बुलाया गया. प्लेनचिट् पर संपर्क होने पर तांत्रिक माध्यम की तरह बोल रहा था. बोला, अब आपको जो पूछना है पूछिए."

पत्नी ने पूछा, आप कैसे हैं?

उत्तर आया, अच्छा हूँ.

पत्नी, कुछ खाते-पीते हो या नहीं?

उत्तर आया, खूब खाता हूँ, सुबह से शाम तक खाता रहता हूँ.

पत्नी, और कौन है साथ में?

उत्तर आया, बकरियां ही बकरियां हैं.

पत्नी स्वर्ग में बकरियां भी होती हैं क्या?

उत्तर आया, मैं स्वर्ग से नहीं, हिमालय के बुग्याल (चारागाह) से बोल रहा हूँ. मैंने अगला जन्म बकरे के रूप में ले लिया था. मैं मजे में हूँ.

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गुरुवार, 15 सितंबर 2011

अन्तिम नोटिस

विमल मित्र बँगला साहित्य के श्रेष्ट कथाकारों में से एक थे. उन्होंने सौ से ज्यादा उपन्यास व लघु कथाएं लिखी है. समाज की विषमताओं तथा समकालीन समस्याओं पर उनकी लेखनी अनूठी थी. जिन सुधी पाठकों को उनका साहित्य पढ़ने का अवसर नहीं मिल पाया है, मैं उनसे अनुरोध करूँगा कि जब कभी समय मिले विमल दा की रचनाओं को अवश्य पढ़ें. आमि अर्थात मैं में उन्होंने जीवन दर्शन का एक बड़ा खूबसूरत आख्यान दे रखा है जिसे मैं अपने पाठकों को अपने शब्दों में सुनाना चाहता हूँ: 

एक भला आदमी रेलवे में नौकरी करता था. जब रिटायरमेंट का समय नजदीक आ रहा था तो उसने अपने अफसर से निवेदन किया कि उसके इकलौते लड़के को उसकी एवज में नौकरी पर रख लिया जाये. उसकी वफादारी और नेकी को ध्यान में रख कर अधिकारियों ने उसको रिटायरमेंट दे दिया और उसके बेटे केस्टो को ड्यूटी पर ले लिया. बुड्ढे को पेंशन मिलाने लगी. घर में एक पोता भी था जिसके साथ खेलकर वह रिटायरमेंट का भरपूर आनंद ले रहा था. सब कुछ ठीक चल रहा था. केस्टो को रनिंग स्टाफ में रखा गया था; दुर्भाग्य से छ:महीने बाद ही एक रेल दुर्घटना में केस्टो की मृत्यु हो गयी.

परिवार पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा. असह्य वेदना व पुत्र-शोक में सब तहस-नहस हो गया. पर धीरे-धीरे समय के साथ दर्द कम होता गया. दुबारा नए सिरे से जिंदगी की ए बी सी शुरू करनी बृद्ध पिता को भारी पड़ रही थी, लेकिन कोई विकल्प नहीं था. इस तरह करीब एक साल गुजर गया. एक दिन दोपहर के वक्त बुड्ढा जब घर के बाहर पेड़ की छाया में विश्राम कर रहा था तो उसका पोता दौड़ा-दौड़ा आया और बोला, मेरा बापू तालाब के पाल पर खडा है, चलो देखो.” दादा ने कहा, मैं उसको अपने हाथों जला कर आया था, वह पाल पर ज़िंदा कैसे हो सकता है?

बच्चा नहीं माना. जिद पर आ गया और बोला, वह पक्का मेरा बापू केस्टो ही है. मुझको देख कर वह मुस्कुरा भी रहा था. आप चलो तो सही.

इस प्रकार पोते की बात पर असमंजस में पड़ा बुड्ढा गाँव के तालाब की ओर चल पड़ा. जाकर देखा तो सचमुच केस्टो वहाँ खड़ा था. उसके नजदीक जाकर आश्चर्य पूर्वक उसने पूछा, बेटा तुम ज़िंदा हो?

केस्टो ने एक सांस में कहा, पहली बात तो ये है कि मैं किसी का बेटा नहीं हूँ. पिछले जन्म में आप लोगों से मेरा सम्बन्ध था इसलिए आप लोग मेरे सूक्ष्म शरीर को देख पा रहे है. मैं यमराज का दूत हूँ. ग्राम प्रधान के लड़के को लेने आया हूँ. आप लोग यहाँ से जल्दी चले जाइए. मुझे मेरा काम करने दें.

बुड्ढा बोला, बहुत अच्छा है. तू जहां है, जैसा है, खुश रह, हमको तेरी कमाई भी नहीं चाहिये, लेकिन जब मेरी बारी आये तो तू छ: महीने पहले बता जाना ताकि मैं तेरे बाल-बच्चों की पूरी व्यवस्था करके आऊँ.

केस्टो बड़ी जल्दी में था बोला, ठीक है, ठीक है, अभी आप जाइए मैं यमराज जी को आपकी बात बता दूंगा.

दादा-पोता दोनों घर आ गये, थोड़ी देर में खबर आई कि गाँव के प्रधान जी का लड़का तालाब में डूब कर मर गया है. अब तो बुड्ढे को पूरा यकीन हो गया कि केस्टो यमराज जी के पास काम कर रहा है.

इस प्रकार पुन: परिवार में नव चेतना व हंसी-खुशी का माहौल उत्पन्न हो गया. बुड्ढा इस बात से आश्वस्त हो गया कि उसको अपनी मौत की खबर छ: महीने पहले मिल जायेगी.

दिन स्वत: ही जा रहे थे करीब ८-१० महीने के बाद बुड्ढा कुछ अस्वस्थ सा कमरे में चारपाई पर पड़ा था किसी ने बाहर से कमरे का कुन्दा खड़खड़ाया, बुड्ढे ने पोते को आवाज दी पर उसका आता-पता नहीं था. फिर बहू को आवाज दी. उसका भी कोई जवाब नहीं मिला तो वह स्वयं कराहते हुए उठा और दरवाजा खोला. सामने केस्टो खड़ा था. बुड्ढे ने कहा बेटा आ गए छ: महीने का नोटिस लेकर?

केस्टो बोला देखिये, मैंने यमराज जी को आपकी बात बता दी थी उन्होंने बताया कि ये कोई रेलवे की नौकरी थोड़े ही है कि छ: महीने पहले रिटायरमेंट का नोटिस पकड़ा दें. हमने तो आपको कई नोटिस दे रखे हैं. दांत गिर गए--एक नोटिस, आँखों की रोशनी कम हो गयी--दूसरा नोटिस, बाल सफ़ेद हो गए--तीसरा नोटिस, घुटने काम नहीं कर रहे है--चौथा नोटिस. नोटिस पर नोटिस, कई नोटिस, और आप अभी चलिए मैं लेने ही आया हूँ. और वह उसे ले गया.


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