मंगलवार, 18 अक्टूबर 2011

उदघाटन महोत्सव


होगनपुरा गाँव के लोग आधुनिक विकास की दौड़ में शामिल हो गए. विधायक भग्गूराम जी ने विधायक निधि से गाँव में सार्वजनिक शौचालय बनाने के लिए दो लाख रूपये स्वीकृत कर दिए ग्राम पंचायत की तरफ से फरमान जारी कर दिया गया कि शौचालय बन जाने के बाद कोई भी ग्रामवासी दिशा जंगल के लिए खेतों की तरफ नहीं जाएगा. 

पांच खण्डों वाला सुलभ शौचालय बन कर तैयार हो गया. सब लोग इसके इस्तेमाल के सपने संजोने लगे. बाहर गाँव से कोई मेहमान आता तो उसको बड़े शौक से इस महानिर्माण के दर्शन कराने के लिए अवश्य अन्दर बाहर घुमाया जाने लगा. देर यों हो रही थी कि भग्गूराम जी ने खबर भेज दी थी कि वे स्वयं आकर इसका उदघाटन करेंगे. उनको लालच था कि इस बहाने वह अपने वोटरों से भी मुलाक़ात कर सकेंगे क्योंकि अगला चुनाव नजदीक ही था.

उदघाटन का दिन-मुहूर्त तय हो जाने के बाद सभापति ने उसको सजाने सँवारने के काम में पूरी ताकत लगा दी. बंदनवार बाँधे गये और शगुन वाले कलश फूल सजा कर रख दिए गए. विधायक महोदय अपनी कार में आये तो उनके साथ कम से कम दो दर्जन कारें और भी आईं. पार्टी के कार्यकर्ता, ठेकेदार लोग तथा अन्य चमचागिरी वाले मुफ्तखोर भी मौके का लाभ लेने के लिए सिमट कर ना जाने कहाँ कहाँ से आ टपके. पाण्डाल में बैठने की जगह कम पड़ गयी. फोटोग्राफर धड़ाधड़ फ्लैश मार रहे थे. जबरदस्त गहमा-गहमी थी.

आखिर वह घड़ी आ ही गयी जिसका लंबे समय से इन्तजार था. लालफीता काटने से पहले विधायक जी का उद्बोधन होना था. पंचायत ने बकायदा माइक का इन्तजाम कर रखा था. लाऊड-स्पीकर पर सुबह से ही टेस्टिंग-टेस्टिंग के स्वर बार बार उभर रहे थे तथा फ़िल्मी संगीत की स्वर लहरी प्रवाहित हो रही थी. श्रोताओं को फिल्म गाइड का ये गाना खूब भा रहा था आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फिर मरने का इरादा है. खैर नेता जी ने माइक पर आते ही नारे लगाया भारत माता की जय.उसके बाद उनका धारा प्रवाह उद्घोष इस प्रकार था:

भाइयो बहिनों और बच्चो,
मैं कोई नेताओं में नेता नहीं हूँ. नेताओं में नेता महात्मा गाँधी थे जिनकी समाधि पर लाखों मन फूल चढ़ चुके हैं. फूल भी कई तरह के होते हैं, जैसे चमेली, मोगरा, हजारा और गुलाब. गुलाब की तो बात ही और है. एक गुलाब वो था जिसे नेहरू जी अपनी अचकन पर लगाते थे एक वो होता है जिससे सेंट बनाया जाता है. सेंट की बात आई है तो मैं आपको बताना चाहता हूँ कि सेंट के लिए जर्मनी बहुत प्रसिद्ध है. वैसे जर्मनी और भी बहुत सी बातों के लिए प्रसिद्ध है. जैसे फर्स्ट वर्ल्डवार, सेकण्ड वर्ल्डवार, सोमवार, मंगलवार आदि. अब वार पर बात आई है तो मैं बता दूं कि वारों में वार सबसे तगड़ा वार, शेर का होता है. शेर जंगल का राजा होता है, जैसे दिल हमारे शरीर का राजा होता है. आज कल बड़े लोगों को दिल के दौरे बहुत पड़ते हैं, पर दिल तो एक मंदिर है. हम लोगों को मंदिर के प्रति बफादार रहना चाहिए. वफादारी में कुत्ता सबसे आगे है पर उसकी पूँछ हमेशा टेढी रहती है. आप लोग टेढी  पूँछ को सीधी करने का कोई तरीका सोचिये तब तक मैं आपके शौचालय का उदघाटन करके आता हूँ. सुबह से ही टाईट हो रहा हूँ. पत्रकार व फोटोग्राफर कृपया बाहर ही रहें.
जय हिंद! जय भारत!
                                     ***  

सोमवार, 17 अक्टूबर 2011

शेरा और फकीरा


ये वो शेरा और फकीरा नहीं हैं जो किसी अष्टतंत्र बुक में थे. ये तो अनगढ़ गाँव के दो शैतान छोकरे हैं जो अपनी बदमाशियों के लिए सारे गाँव में बदनाम हैं. इनके माँ बाप भी इनसे तंग आये रहते हैं क्योंकि ये स्कूल जाते नहीं हैं और किसी का कहना भी नहीं मानते हैं. इन दोनों की तारीफ़ ये भी है कि ये एक नम्बर के घोंचू भी हैं. घोंचू यानि बेवकूफ. आमतौर पर शैतान बच्चे होशियार भी होते है क्योंकि वे जब बदमाशी करते हैं तो बचने का बढ़िया तरीका भी ढूंढ लेते हैं. यानि उनका दिमाग चलता है. पर शेरा और फकीरा तो अलग ही तरह के प्राणी है.

एक दिन इन दोनों ने गाँव के कुँवे के अन्दर गोबर डाल दिया. क्यों डाला? ये किसी के समझ में नहीं आया पर इन्होंने की बड़ी भारी गलती. नतीजा ये हुआ कि सारे गाँव वालों का पारा आसमान में चढ़ गया. ये बदमाश कहीं पेड़ के ऊपर चढ़ कर छुप गए, सो देख लिए गए, पकडे गए. खूब तो पिटाई हुई और सबने मिलकर तय किया कि इनको गाँव बदर कर दिया जाये. गाँव बदर यानि गाँव की सीमा से बाहर खदेड़ना. अब क्या था उत्साही लोगों ने इनकी बुरी गत बनाते हुए बारह पत्थर बाहर कर दिया.

अब इनकी समझ में आ रहा था कि शैतानी करने में क्या मजा आता है. मजबूरी थी सो अगले गाँव सुगढ़ की तरफ चले गए, जहाँ इनको कोई नहीं पहचानता था. गाँव में घुसने से पहले दोनों ने मशविरा किया कि पहले किसी घर में घुस कर पेट पूजा कर ली जाये क्योंकि दोनों के ही पेट में चूहे कूदने लगे थे.

गाँव के एक छोर पर एक मकान का आधा दरवाजा खुला देखा तो ये दबे पाँव अन्दर घुस गए. ये शुक्र था कि गाँव के किसी कुत्ते को भनक नहीं लगी अन्यथा गाँव के कुत्ते तो बड़े खतरनाक काटू होते हैं. किसी अनजान को हैरान करने की क्षमता रखते हैं. कुत्तों में एक खास बात ये भी होती है कि एक भौंका तो सारे भौंकने लगेंगे और शिकार को घेर लेंगे.

हाँ तो फिर जब शेरा और फकीरा कोने वाले मकान में घुसे तो देखते क्या हैं कि घर की मालकिन एक बुढ़िया-दादी खाट पर एक हाथ सिराहने लगाकर गहरी नींद में सो रही थी. उसको डिस्टर्व किये बगैर वे सीधे रसोई की तरफ लपक लिए. वहाँ पर कोयलों की आंच में बुढ़िया ने खीर की हाँडी रखी थी ताकि वह अच्छी तरह पक जाये.

शेरा बोला, यार, फकीरा मजा आ गया.
फकीरा बोला, सो तो ठीक है पर बुढ़िया की हथेली खुली हुई है, वो भी मांग रही है. थोड़ी सी खीर उसमें डाल देना ठीक रहेगा, नहीं तो पाप लगेगा.
शेरा ने पूछा, अगर वह जाग गयी तो क्या होगा?
फकीरा बोला, तू ऐसा कर ऊपर दुछत्ती में जाकर छुप जा. अगर बुढ़िया जाग गयी तो मैं खाट के नीचे घुस जाऊंगा.
इस प्रकार शेरा ऊपर दुछत्ती में घुस कर छुप गया और फकीरा करछी में गरम गरम खीर लेकर आया और बुढ़िया की खुली हथेली में डाल कर खुद खाट के नीचे सरक कर छुप गया.

बुढ़िया को जागना ही था. वह जलन के मारे चिल्लाने लगी. उसकी चिल्लाहट सुन कर आस-पास घरों से लोग-लुगाईयाँ निकल कर आ गये. और चिल्लाने का कारण जानने के लिए बेताब होने लगे.

एक ने पूछा, दादी क्या हुआ?
दादी बोली, क्या बताऊँ बेटा, मैं तो आराम से सो रही थी पता नहीं कैसे ये करछी गरम-गरम खीर लेकर मेरे हाथ में आ गयी.
थोड़ी देर में एक अन्य लड़के ने पूछा, अम्मा क्या हुआ कुछ बताओ तो सही?
वह बोली, खीर की करछी खुद उड़ कर मेरे हाथ में आई और मेरा हाथ जल गया.
इतने में एक लड़की ने फिर पूछ लिया, दादी ये हुआ कैसे?
दादी थोड़ा झल्ला कर बोली, अरे बेटा, ये तो ऊपर वाला ही जानता है कि खीर कैसे हाथ में आई.
यों भीड़ इकट्ठी होती जा रही थी. प्रधान जी आ गए. पूछने लगे, चाची क्या हुआ?
बुढ़िया सवालों के जवाब देते देते तंग आ चुकी थी. बोली, ये सब ऊपर वाले की करामात है.”  

शेरा ऊपर दुछत्ती के अन्दर से बार बार ये इल्जाम सुन रहा था कि ऊपर वाले की करामात है’ सो उसे उसे गुस्सा भी आ रहा था. जब उससे नहीं रहा गया तो बाहर मुँह निकाल कर जोर से बोला, ऐ बुढ़िया! बार बार मेरा नाम लगा रही है. खीर तो नीचे वाले ने डाली है.

अब लोगों की समझ में सारा माजरा आया और दोनों को पकड़ कर फिर धुनाई हुई. दोनों को काफी देर तक मुर्गा बना कर रखा गया तथा भविष्य में शैतानी न करने की कसमें दिला कर छोड़ दिया गया.
                                     *** 

रविवार, 16 अक्टूबर 2011

बहुरूपिया


सुख नगर के राजा मोहनचंद्र बहुत कला प्रेमी थे. उनके आश्रय में अनेक कलाकार रहते थे. विद्यावान व गुणी व्यक्तियों को वे हर तरह से प्रोत्साहित करते थे. कवि, भाट, चारण, नट, तथा जादूगर मनोरंजन के लिए स्थाई रूप से रखे गए थे. वे मासिक वेतन पाते थे. वहाँ की महिमा सुनकर जयपुर से कल्याणमल नाम का एक बहुरूपिया भी वहाँ पहुँचा और नित्य मेकअप करके नया रूप धारण कर राजा मोहनचंद्र के सामने उपस्थित होता था. वे उसके गेट-अप से खुश तो होते थे पर उसमें उनको कोई विशेषता नजर नहीं आई. एक दिन उसे पास बुलाकर उन्होंने कहा,  
कल्याणमल, बहुरूपिया तो ऐसा होना चाहिए कि पहचान में न आये. तुमको तो हम आते ही पहचान जाते हैं. कुछ ऐसा बन के बताओ कि हम तुमको पहचान ना सकें, तभी हम तुमको दस स्वर्ण मुद्राए दे सकेंगे.

कल्याणमल ने राजा को हाथ जोड़ कर कहा, अच्छा महाराज, अब मैं आपको ऐसा रूप दिखाउंगा कि आप सचमुच पहचान नहीं सकेंगे. ये कह कर कल्याणमल वहाँ से चला गया और सोचने लगा कि ऐसा चमत्कारिक रूप क्या हो सकता है? आखिर उसको ये सूझा कि साधु का रूप ऐसा है जिसमें बड़े बड़े चरित्र छिपाए जा सकते है. पूरी तरह पारंगत होने के लिए उसने सीधे हरिद्वार की राह पकड़ी, जहाँ स्वामी विश्वेश्वरानंद का योगाश्रम था. वह वहाँ पहुच गया और बाबा के चरणों में दंडवत करके दीक्षित करने का निवेदन किया. बाबा ने सहर्ष अपना चेला बनाने की सहमति दे दी तथा आश्रम में ही रहने की आज्ञा भी दे दी.

कल्याणमल अन्य शिष्यों के साथ योगाभ्यास करने लगा और नियमित रूप से बाबा के आध्यात्मिक प्रबचन सुनने लगा. पूरे दो वर्ष तक वह बाबा के सानिध्य में अमृत वाणी में सराबोर होता रहा. उसके जीवन में यह एक रोमांचक मोड़ भी था. बाबा बहुत पहुंचे हुए ज्ञानी साधु थे उन्होंने अपने प्रवचनों से सुपात्रों को उस मुकाम पर पहुँचा दिया जहाँ उन्हें परम शक्ति का स्वत: साक्षात्कार होने लगता है. इस दीन-दुनिया के परे आत्मा व परमात्मा के सत्य को पहचानने लगता है.

कल्याणमल तो बहुरूपिया था. यद्यपि वह महज अपने फन की महारत हासिल करने के लिए इस नाटक में शामिल हुआ, उसे जो ईश्वरीय अनुभूति यहाँ हो रही थी उससे वह सब पीछे छूट गया. वह वास्तव में संत-महात्मा हो गया. उसका नित्याचरण ही बदल गया. उसकी वाणी में सम्मोहन आ गया.

एक दिन उसके मन में राजा मोहनचंद्र की बातें घूम कर आई तो वह मन ही मन मुस्कराया. उसने सोचा कि सँसार में कितनी अज्ञानता, स्वार्थ और कलुषता है? इसके लिए एक बार सुख्नगर जाकर उद्बोधन करना चाहिए. रास्ते में उसने सोचा अगर उसको पहचान लिया जाएगा तो कोई भी उसके प्रबचन नहीं सुनेगा और उसकी बातें मखौल में ही ली जायेंगी. मनुष्य का भूतकाल उसके मरने के बाद भी उसका पीछा नहीं छोडता है. अत: उसने इसके लिए नई तरकीब सोची. सुख नगर से करीब चार मील दूर नदी तट पर एक सुन्दर स्थान पर एक कुटिया बनाई और वहीं योग-तप करने लगा.

आस-पास के गृहस्थ जन योगी बाबा का आगमन सुन कर उनके पास मडराने लगे तो बाबा कल्याणमल ने उनको कथा-कहानियों तथा प्रवचनों के माध्यम से मोहित करना शुरू कर दिया. उनकी कुटिया ने देवस्थान का रूप ले लिया. गुड़ हो तो मक्खियाँ अपने आप आ जाती हैं. वहाँ अब नित्य अनुष्ठान होने लगे. भेंट चढावा भी खूब आने लगा. जो भेट चढावा आता बाबा उसे श्रोताओं व भक्त जनों में वितरित कर देते थे. बाबा की वाणी में भी विशेष रस था इसलिए भी लोग खिचे चले आ रहे थे. इस प्रकार छ: महीनों में ही बाबा की कुटिया ने तीर्थ का रूप ले लिया.
ये समाचार राजा मोहनचंद्र को कई बार मिल चुका था कि कोई ज्ञानी संत-महात्मा उनके राज्य में लोगों को पुन्य बाँट रहे है. और अच्छी शिक्षाएं दे रहे हैं. उन्होंने अपने मंत्रियों से मंत्रणा करके बाबा के दर्शनार्थ उनकी कुटिया में जाने का कार्यक्रम बनाया. वे वहाँ जाकर उपस्थित जन समूह व इसके अनुशासित उत्साह को देख कर दंग रह गए.

बाबा एक मंच पर से वेद और उपनिषदों की व्याख्याएं करके स्वच्छ जीवन की विवेचनाएँ व कथाएं कह कर श्रोताओं को मन्त्र मुग्ध किये जा रहे थे. राजा मोहनचंद्र भी उनके अनमोल वचन सुन कर अभिभूत हो गए. प्रवचन समाप्ति पर राजा ने बाबा को प्रणाम कर एक थाल में स्वर्ण मुद्राएँ, फल-फूल व कीमती उपहार बाबा को भेंट किये. बाबा ने थाल की स्वर्ण मुद्राएँ व उपहार जन समूह की तरफ उछाल कर फैंक दी.

बाबा ने राजा को यशस्वी भव: का आशीर्वाद दिया और अपने साथ कुटिया के अन्दर आने का न्योता दिया. क्योंकि वह सबके सामने अपने पुराने सत्य को उदघाटित नहीं करना चाहते थे. अन्दर जाकर राजा जब साधु के समक्ष हाथ जोड़ कर खडा हुआ तो साधु ने उसको बताया कि वह बहरूपिया कल्याणमल है और अब वचन निभाने के लिए मिलने आया है. राजा को आश्चर्य हुआ और सदमा भी लगा. बोले, तुमने सिर्फ दस मुद्राएँ पाने के लिए मेरे दिए लाखों के उपहार फेंक दिए?

इस पर बाबा कल्याणमल बोले, राजन, अब मुझे स्वर्ण मुद्राएं व उपहार नहीं चाहिए क्योंकि मेरे गुरु के सानिध्य में मुझे ईश्वरीय अनुभूति की बड़ी मुद्राएँ मिल चुकी हैं.

राजा प्रसन्न होकर साधु को प्रणाम करके लौट गए.
                                  ***   

शनिवार, 15 अक्टूबर 2011

चुहुल - ७


                                  (१)
एक लड़का एक लड़की को नए नए तरीकों से छेड़ा करता था. एक दिन लड़की को आता देख वह पास में खड़े गदहे को हाथ जोड़ कर नमस्कार की मुद्रा में आ गया. लड़की समझ गयी और पास आकार व्यंग में बोली, क्या अपने बड़े भाई को प्रणाम किया जा रहा है ?
लडका संजीदगी से मुस्कुराते हुए बोला, हाँ भाभी जी.”   
                                   (२)
एक वैद्य जी अपने साथ अपने एक नौसीखिए चेले को भी साथ रखते थे और उसको वैद्यक के तौर तरीके सिखाते रहते थे. एक बार एक गाँव में वे एक बीमार को देखने के लिए गए. बीमार खाट पर था, वैद्य जी ने नाड़ी पकड़ी और पूछा, आम खाए थे ?
बीमार बोला, हाँ, वैद्य जी.
वैद्य जी ने दवा दी और सलाह दी कि बुखार में आम खाना वर्जित है.
जब वे वापस चले तो रास्ते में चेले ने वैद्य जी से पूछ लिया, "नाडी देख कर आम खाने की बात आपने कैसे पकड़ी?
वैद्य जी ने बताया कि नाड़ी से आम नहीं पकडे जा सकते है. आस-पास भी देखना चाहिए. खाट के नीचे आम के छिलके व गुठलियाँ पडी थी सो अंदाजा सही निकला.
चेले के समझ में आ गया कि कामनसेंस भी लगाया जाना चाहिए.
कुछ दिनों के बाद वैद्य जी तो किसी काम से बाहर गए हुए थे. ठाकुर साहब के घर से बुलावा आ गया. उनकी अनुपस्थिति में चेले को मौक़ा मिल गया. जा कर पहले उसने ठाकुर साहब के पलंग के नीचे झाँका तो वहाँ देखा घोड़े की जीन पडी थी. चेले ने पूछ लिया, घोड़ा खाया था?
ठाकुर साहब सुन कर स्तब्ध रह गए. जब दुबारा उसने पूछा, घोड़ा खाया था?तो उनका पारा चढ गया और चेले की अच्छी धुनाई करवा डाली.
                                    (३)
एक नेता जी हरित क्रान्ति पर भाषण दे रहे थे, "अनाज व दालों का उत्पादन बढ़ाना जरूरी है..."
एक लड़के ने बीच में व्यंग करते हुए कहा, चारे के बारे में आप कुछ नहीं कह रहे हैं.
नेता जी ने पलटवार करते हुए जवाब दिया, अभी मैं इंसानों की खुराक की बात कर रहा हूँ. आपकी खुराक की बात बाद में करूँगा.
                                     (४)
किसी शरारती ने सड़क के किनारे चपटे पत्थर पर लिखा था, इस पत्थर को पलटोगे तो तुम भी कुछ बन जाओगे.
एक आदमी ने जब उत्सुकतावस पत्थर पलटा तो लिखा था, बन गए ना उल्लू.
                                      (५)
एक जेंटलमैंन एक रेस्टोरेंट में गया. बैरा से कहा, एक चाय ले आओ.
बैरा बोला, चाय कौन सी लाऊं? दस रूपये वाली, पांच रूपये वाली, दो रूपये वाली, या पचास पैसे वाली?
ग्राहक ने थोड़ा सोचा फिर बोला, पचास पैसे वाली ले आ.
थोड़ी देर में बैरा चाय ले आया. चाय क्या थी धोवन जैसी थी. बैरा जब चाय का प्याला रख कर जाने लगा तो ग्राहक ने उसे वापस बुलाया, कप में मक्खी की तरफ अंगुली इंगित करते हुए बोला, ये क्या है?
बैरा ने आँखें गडाते हुए देखा और बोला, ये मक्खी है.
ग्राहक गुस्से में था. बोला, मक्खी डाल कर क्यों लाया?
बैरा बोला, सर, पचास पैसे में घोड़ा डाल कर तो ला नहीं सकता."

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2011

दो मायके


सोमेश्वर के रिटायर्ड लेफ्टीनेंट कर्नल किसनसिंह रावत के पिता सूबेदार दरबानसिंह द्वितीय विश्व युद्ध के योद्धा रहे थे. उसी परम्परा को कायम रखने के लिए उनके पुत्र दीपेंद्र सिंह ने इन्डियन मिलिट्री एकेडेमी में प्रवेश पा लिया और पासिंग आउट परेड के बाद उसे कश्मीर के उड़ी क्षेत्र में तैनाती मिल गयी. साल भर बाद ही पिथोरागढ़ के मेजर महेंद्रसिंह मेहरा की बेटी प्रतिभा से उसका व्याह धूमधाम से कर दिया गया. घर में समयोचित खुशियाँ थी. बैभव भी था. पर भाग्य में खुशिया लंबे समय तक के लिए नहीं लिखी थी. एक मनहूस दिन खबर आई कि आतंकवादियों से मुठभेड़ में कैप्टन दीपेंद्र शहीद हो गया है. परिवार का इकलौता चिराग बुझ गया. प्रतिभा विवाह के छ: माह के अंतराल में ही विधवा हो गयी. तिरंगे में लिपटा शव घर पहुँचा. इलाके में सर्वत्र शोक की लहर दौड गयी. पूरे सैनिक सम्मान के साथ अंतेष्टि भी हो गयी.

मातमपुर्सी बहुत हुई. जो चला गया वह कभी वापस नहीं आता उसकी यादें भर रह जाती हैं. दीपेंद्र के स्मृति चिन्ह, वर्दी व अनेक पोजों में खींची गयी तस्वीरें रह रह कर माँ, बाप, और प्रतिभा को सुबुक-सुबुक कर रोने को मजबूर कर रही थी. मन कितना भी मजबूत हो, कठोर हो आत्मीय जन का बिछोह तो असहनीय वेदना देता रहता है. धन-वैभव की कमी नहीं थी, कमी थी तो केवल दीपेंद्र की उपस्थिति की, जो अब संभव नहीं थी. कर्नल साहब अब पुत्रशोक से ज्यादा इस बात से दु:खी थे कि पुत्रवधू प्रतिभा की पहाड़ सी जिंदगी कैसे कटेगी?

शहीदों के स्मारकों पर हर बरस फूल मालाये अर्पित की जाती हैं पर उनके अपनों पर क्या बीतती है, ये उनके दिल ही जानते हैं. आखिर किसन सिंह ने वार्षिक श्राद्ध के पश्चात घोषणा की कि प्रतिभा अब उनकी पुत्रबधू नहीं पुत्री है और वे उसके लिए कोई योग्य वर ढूंढ रहे हैं. सभी प्रबुद्ध जनों ने उनकी इस सोच को प्रगतिशील और समयोचित कहा. प्रतिभा को मानसिक रूप से तैयार करने में उनको बहुत समय लगा. चूंकि प्रतिभा एम्.ए. तक पढ़ी थी, वह कोई जॉब करना चाहती थी. दोनों सम्बन्धियों ने इस बाबत गंभीर मंत्रणा करके सहमति पाली कि नौकरी अपनी जगह ठीक है. उसके लिए प्रयासरत रहा जाये, लेकिन पतिभा के पुनर्विवाह की संभावनाएं जोर-शोर से तलाशी जाएँ.

कर्नल साहब ने राष्ट्रीय अखबारों में इस आशय का मैट्रिमोनियल विज्ञापन छपवाया तो अनेक जगहों से रेस्पोंस आये. जो सबसे उचित लगा वह था प्रोफ़ेसर डॉ. विवेक सिंह का जो दिल्ली में जे.एन.यू. में फिजिक्स पढ़ा रहे थे. उनकी पत्नी का भी बिवाहोपरांत जल्दी ही किसी आकस्मिक दुर्घटना में स्वर्गवास हो गया था. दोनों परिवारों में पहले पत्राचार द्वारा फिर व्यक्तिगत संपर्क से बात बन गयी. प्रोफ़ेसर का परिवार भी आर्मीबेस था इसलिए बहुत सौहार्द्य पूर्ण वातावरण में उनकी शादी तय हो गयी. कर्नल साहब ने खुद कन्यादान किया. सभी इष्ट-मित्र शामिल हुए. सभी ने कर्नल साहब के इस कदम की सराहना की.   

अब इस बात को पांच साल हो गए हैं. प्रतिभा की सुखी गृहस्थी है, उसके दो बच्चे हैं. एक बेटा और एक छोटी गोद की बेटी. डॉ. विवेकसिंह बहुत ही सज्जन व सुलझे हुए व्यक्ति है. उन्होंने अपने व प्रतिभा के जीवन में तमाम खुशियों को फिर से आमन्त्रित किया है तथा औरों के लिए मिसाल कायम की है.

अब प्रतिभा के दो मायके हैं और वह दोनों को सामान दर्जा देकर सम्मान देती है. पिछली गर्मियों की छुट्टियों में वह पुत्र ध्रुव को लेकर पहले उसके बड़े नाना कर्नल किसनसिंह के घर सोमेश्वर गयी फिर छोटे नाना मेजर महेंद्रसिंह के घर पिथोरागढ़...
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