शुक्रवार, 29 जून 2012

चुहुल -२६

(१)
एक सज्जन रात्रिभोज के लिए एक बिलकुल घटिया किस्म के रेस्टोरेंट मे गया. उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि उसका एक बचपन का दोस्त वहाँ पर बैरा बन कर काम कर रहा था. उसने उससे जाकर कहा, “यार, तुझे ऐसे घटिया रेस्टोरेंट मे काम करते हुए शर्म नहीं आती?”
दोस्त बोला, “शर्म तो मुझे यहाँ खाना खाने में आती है.”

(२)
आफिस से एल.टी.ए. लेकर विवेकसिंह सपरिवार आगरा घूमने गया. आगरा दो खास बातों के लिए प्रसिद्ध है--एक तो ताजमहल और दूसरा वहाँ का पागलखाना (मनोचिकित्सालय).

जब छुट्टियाँ बिता कर विनोद अपने आफिस पहुँचा तो उसके सहकर्मी दयाचंद ने उसकी चुहुल करने के लिए मजाकिया अंदाज में पूछा, “क्यों, आगरा गए थे?”
विनोद ने कहा, “हाँ.”
दयाचंद ने फिर उसी लहजे में कहा, “क्या कहते हैं वहाँ के डॉक्टर?”
विनोद उसका मतलब समझ गया, और उसी लहजे मे सटीक जवाब दिया, “बोल रहे थे कि मरीज को साथ क्यों नहीं लाये? अब बता, तू कब चलेगा?”

(३)
एक सज्जन अपने घर के बरामदे में अपने दो स्कूल जाने वाले बेटों को उनके परीक्षा रिजल्ट पर बुरी तरह डांट रहे थे. गुस्से में उनको एक एक चपत भी रसीद कर दी.
पड़ोसी व्यक्ति ने कहा, ”बच्चों को क्यों डाट रहे हो, रिजल्ट तो कल आने वाला है?”
वह बोले “अरे भाई, मैं कल शहर से बाहर जाने वाला हूँ इसलिए कल का काम आज ही कर रहा हूँ.”
                                              
(४)
एक लड़के ने एक लड़की को शादी के लिए प्रस्ताव रखने के लिए एक महंगी हीरे की अंगूठी खरीदी, और उसके पास गया. लड़की ने सीधे सीधे कह दिया कि “मैं किसी और से प्यार करती हूँ, तुम्हारी अंगूठी स्वीकार नहीं कर सकती.”
लड़का बोला, “क्या तुम मुझे उसका पता दे सकती हो?”
लड़की घबराते हुए बोली “क्यों, तुम उसे मारना चाहते हो?”
लड़के ने मायूसी के साथ कहा, “नहीं, मैं उसे ये अंगूठी बेचना चाहूँगा.”

(५)
एक थानेदार ने किसी तस्कर से ५००० रुपयों के जाली नोट पकड़े और अपने जिला मुख्यालय को इसकी सूचना भेज दी. मुख्यालय से जवाब आया कि “सभी जाली नोट यहाँ भेज दो.”
थानेदार ने पत्र द्वारा सूचित किया कि "सभी जाली नोट पोस्टल आर्डर के मार्फ़त आपको भेज दिये गए हैं."
***

बुधवार, 27 जून 2012

दिल से

इस भीड़ भरी दुनिया में मैं अकेला बैठा हूँ, न चाहते हुए भी तुमको याद कर रहा हूँ कि मेरी जिंदगी की वीरानी के लिए तुम, सिर्फ तुम जिम्मेदार हो.

आज हमारी शादी की पहली मनहूस सालगिरह है. कमरे में मैं अन्धेरा करके बैठा हुआ हूँ. तुम्हारे द्वारा किया गये दुर्व्यवहार को स्मृरण करके मैं अपना खून जला रहा हूँ. तुम्हारी गुस्ताखियों को मैं कभी क्षमा नहीं कर सकता हूँ.

तुम्हारे खूबसूरत चेहरे के पीछे जो विद्रूपता छिपी है, उसने मेरे सीधे सपाट जीवन को कलुषित कर दिया. तुम अपने अहँकारयुक्त हिकारत भरी मुस्कान के साथ घर छोड़ कर गयी, जिसकी चोट का दर्द मैं लगातार सहला रहा हूँ.

तुम अगर ये सोच रही होंगी कि पिछली बार की तरह मैं तुम्हें फिर से मनाने आऊँगा तो ये तुम्हारी खामखयाली होगी, अब मैं तुमसे पूरी तरह नफरत करता हूँ.

ये शादी वाला पलंग, गद्दे, चादर-तकिये, जिन पर विवाहोत्सव के चिन्ह अभी पुराने नहीं पड़े, मुझे बेहद टीस देने लगे हैं. मैं जल्दी ही इनको घर के बाहर कर दूंगा. दीवारों पर तुम्हारी पसंद के रंग, परदे, व पेंटिंग्स मुझे फूहड़ लगने लगे हैं.

मेरे कमरे में तुम्हारी ड्रेसिंग टेबल पर रखे हुए देशी-विदेशी महंगे सौंदर्य प्रसाधन मुझे गंदे कचरे के समान दीखते हैं. अभी मैंने इनको फेंका नहीं है ताकि परिवार के लोग अन्यथा न लें. इसलिए एक मोटी चादर डाल कर इसे ढक दिया है.

तुमने अच्छा किया कि अपनी दहेज सामग्री के साथ साथ अपने जेवरों का बक्सा भी लेकर गयी अन्यथा ये सोने के सर्प मुझे डसते रहते.

तुम एक बिगडैल, जिद्दी, बद्तमीज़ औरत हो, जिसे अपने बाप के नाम-धाम व धन दौलत का घमंड है. पर तुम खुद क्या हो? तुम्हारी अपनी निजी पहचान क्या है? ये तुमने कभी भी नहीं सोचा होगा पर एक दिन अवश्य ऐसा आएगा कि तुम पाश्चाताप के घूंट पियोगी.

तुम्हारे मिनिस्टर बाप और रईसजादी माँ ने तुम्हारी जंजीर मुझे क्यों पकड़ाई, ये मैं आज तक नहीं समझ पाया हूँ. ये जंजीर भी कच्चे धागों की निकली जिसे तुम बार बार तोड़ने की कोशिश करती रही. मैंने भी ठान लिया है कि अबके तुमको फिर से तोड़ने का दंभपूर्ण मौक़ा नहीं दूंगा.

मैं एक शिक्षक हूँ, मेरे अपने पवित्र संस्कार व आदर्श है, तुम चाहती थी कि मैं भी तुम्हारे आदर्श हीरो अपने जीजा जी की तरह तुम्हारे बाप के तलवे चाटता रहूँ. मैं उनके माया-प्रपंच के सँसार पर थूकता हूँ.

अब मैं तुम्हारा कुछ भी नहीं लगता हूँ. तुम मेरे लिए एक दु:स्वप्न की परछाई मात्र हो.

मैं तुमको अपने रिश्ते की डोर से आजाद करता हूँ, और चाहता हूँ कि तुम अब भूले भटके भी मेरे मन मन्दिर की घंटी बजाने की कोशिश मत करना.
                                               ***

सोमवार, 25 जून 2012

मृत्युभय

ये कहा जाता है कि जिस समय प्राणी पैदा होता है उसी क्षण उसकी मृत्यु की कुंडली भी साथ में आ जाती है. सँसार नश्वर है, चराचर जो भी पैदा होते हैं अपनी अपनी आयु के अनुसार नष्ट भी हो जाते हैं. शास्त्रों में इस विषय को विस्तार से समझाया गया है, फिर भी प्राणीमात्र का स्वभाव है कि वह मरना नहीं चाहता है.

वैज्ञानिक सोच वाले बहुत से लोग कल्पना करते हैं कि भविष्य में कोई ऐसा टानिक, जीन्स अथवा ऊतक विकसित कर लिया जाएगा, जिससे अमरत्व मिल सकता है. अनेक पौराणिक गल्प हैं, जिनमे अमरत्व प्राप्त किये हुए मनीषियों का जिक्र है, लेकिन इनकी सच्चाई सत्यता के बिलकुल परे है. उम्रदराज लोगों में मृत्युभय एक स्वाभाविक प्रक्रिया होती है क्योंकि मरना कोई नहीं चाहता है. एक सुन्दर दृष्टांत इस सम्बन्ध में याद आ रहा है.

नत्थाराम, एक देहात का रहने वाला लकड़हारा था. रोज जंगल जाकर एक भारा लकड़ी काट लाता  और पास के शहर/कस्बे में बेच आता था. उस पर कोई पारिवारिक जिम्मेदारी नहीं थी क्योंकि संयोगवश वह जीवनभर कुंवारा ही रह गया. अकेला था. जब तक ताकत थी, खूब कमाता था और खूब खाता भी था. अब जब उम्र सत्तर के पार हो चली थी तो बुढ़ापा अपना असर दिखाने लगा था. नत्थाराम का हुलिया कुछ इस प्रकार था: अधफटा अंगरखा, एक छोटी धोती-लँगोटी, सर पर एक पुरानी चपटी पगड़ी, और पैर में कच्चे चमड़े की बनी घिसी हुई देसी जूती.

नित्य की ही तरह उसने आज भी धोकड़े की मोटी मोटी लकड़ियों का गट्ठर बनाया, गर्मी बहुत थी, वह बेहद थका महसूस कर रहा था, फिर एक छायादार पेड़ के नीचे पत्थर पर बैठ गया. जेब से बीड़ी का बण्डल और माचिस निकाली, एक बीड़ी सुलगाई और लम्बी सासें लेते हुए कस खींचता रहा. बीच बीच ने अपनी अधपकी दाढ़ी और बेतरतीब बढ़ी हुई मूछों पर भी हाथ फेरता रहा. ना जाने क्या क्या ‘सोच’ उसके दिमाग में घूमने लगे. पर, थकावट, हताशा और दिशाहीन जीवनयात्रा के मद्देनज़र उसके मुँह से उच्छ्वास के साथ ये शब्द निकल फूटे, “हे भगवान, अब तो तू मुझे उठा ले.”

उसका वाक्य पूरा होते ही उसकी कनपट्टी पर एक ठन्डे हाथ का स्पर्श हुआ तो उसने मुड़कर देखा, साक्षात यमराज जी खड़े थे. वे बोले “हाँ नत्थाराम, कैसे याद किया?”

यमराज को देखकर नत्थाराम के बदन में झुरझुरी पैदा हुई और वह कुछ सेकिंड में ही पसीना-पसीना हो गया, उसकी घिग्गी बंध गयी.

यमराज ने कड़क कर फिर बोला, “बोल, क्यों बुलाया?”

नत्थाराम आनन-फानन में बोलने लगा कि “लकड़ी का भारा उठाने में मदद करने वाला कोई नहीं था इसलिए याद किया था.”

उसकी बात सुन कर यमराज समझ गए कि माजरा क्या है? वे मुस्कुरा दिये.

नत्थाराम फिर बोला, “आइन्दा मैं कभी इसी तरह गलती से भी बुलाऊँ तो आप नाहक परेशान मत होना, आपको आने की जरूरत नहीं है.”
                                                  *** 

शनिवार, 23 जून 2012

विधना रूठ रहे

हिडम्ब सिंह को बचपन में ही उसके झगडालू स्वभाव के कारण संगी साथियों ने 'झगडू' नाम दे दिया था. आज तो वह ८२ साल की उम्र में हैं और नरक भोग रहे हैं, पर कहते हैं कि ‘कभी इमारत बहुत बुलंद थी’. घर, गाँव, इलाके में उनकी तूती बोलती थी.

अपने कार्यकलाप एवं बात व्यवहार में हिडम्ब सिंह ने कभी न्याय-अन्याय को नहीं परखा, जैसा मन में आया बोल दिया, और तेवर बता दिये. लोग तो भेड़ों की तरह होते हैं, डर जाते हैं. कौन उसकी दवंगाई का विरोध करके जोखिम उठाये? वैसे भी विरोध करने के लिए घर-गाँव में बचा ही कौन था? नौजवान सब बाहर पलायन कर गए थे, बूढ़े अपाहिज बचे थे, जो किसी हालत में मुकाबला करने की स्थिति में नहीं थे.

हिडम्ब सिंह डील-डौल से पूरे भीमकाय रहे हैं, माता-पिता की इकलौती संतान हैं, उनकी पिछली तीन पीढियाँ भी एक एक बेटा ही जनती आई हैं. इसलिए जमीन का बँटवारा भी नहीं हुआ, और अब वे गाँव में सबसे ज्यादा जमीन के मालिक भी हैं. २१ साल की उम्र में वे फ़ौज में भर्ती हो गए थे, वहाँ का खाना खुराक भी उनको खूब माफिक आया. १५ साल के बाद जब वे सिपाही के सिपाही ही पेन्शन लेकर गाँव लौटे तो उनके रंग-रूप और मिजाज में अलग ही तुर्सी थी. वे किसी को कुछ समझते ही नहीं थे. गाँव के छोटे-बड़े सभी पर उनका स्वाभाविक दबदबा हो गया था.

शादी तो उन्होंने फ़ौज में जाने से पहले कर ली थी, पर उनकी पत्नी कांता को हजार मिन्नतों व पूजा अर्चनाओं के बाद भी कोई संतान सुख नहीं मिला. फ़ौज से रिटायर होने के उपरान्त कान्ता की ही सलाह पर उन्होंने आन गाँव के एक गरीब की बेटी बैजंती से दूसरा विवाह भी किया लेकिन उससे भी कोई संतान पैदा नहीं हुई. यहाँ पहाड़ में जिस घर में वंश बेल न उगे उसे ‘नठाई’ कहा जाता है. हिडम्ब सिंह और उसकी दोनों पत्नियों ने इसे ईश्वर की इच्छा मान कर अपने भाग्य को कोसा. परिवार ‘नठाई’ ही रह गया.

संतान न होने से मनोवैज्ञानिक दुष्परिणाम ये हुआ कि हिडम्ब सिंह हर मामले में कृपण होते चले गए. बड़ी बीबी कांता की पित्त की थैली में पथरी रोग होने के कारण वह पीलियाग्रस्त हो गयी. लंबे समय तक बीमार रही, लेकिन खर्चा होने के डर से उसका ऑपरेशन तक नहीं कराया. यद्यपि पूर्व फ़ौजी होने की वजह से उनको बहुत सुविधाएँ मिल सकती थी, पर जब मनुष्य दुष्प्रवृत्तियों में उतर जाता है तो अच्छे रास्ते अपने आप बन्द होते चले जाते हैं. बेचारी कांन्ता ईलाज के अभाव में जल्दी चल बसी.

ऐसा नहीं कि उनके पास रुपयों की कमी थी, फ़ौज की पेन्शन थी, लोगों को वक्त-बेवक्त रूपये उधार देकर दादागिरी से वसूली कर लिया करते थे, पर फितरत को क्या किया जाये? आदमी जोड़ने के चक्कर में सब कुछ भूल जाता है. ये दुनिया की रीति है कि जो लोग धन को पकड़ कर कुंडली मार कर बैठे रहते हैं, एक दिन उसे बिना भोगे ही औरों के लिए छोड़ कर चले जाते हैं. कभी कभी किसी को ये बात देर में समझ में आती है. इसलिए वैजन्ती के आग्रह पर उन्होंने गाँव में भंडारा करने की ठानी. पुरोहित जी से सलाह करने के बाद सात दिनों का 'भागवत कथा सप्ताह' करने के बहाने पुन्य कमाने की बात बन गयी.

कथा-कीर्तन, पूजा-पाठ सब मन को सन्तोष करने के लिए होते हैं, इसलिए हिडम्ब सिंह को भी लगने लगा कि उसके द्वारा किये गए सभी दुष्कर्म इस आयोजन से धुल जायेंगे पर कर्मों की गति तो न्यारी है. एक दिन जब गाँव में होलिकोत्सव हो रहा था तो हिडम्ब सिंह एक बड़े कटे हुए पेड़ की तरह सबके सामने धडाम से जमीन पर बेहोश हो कर गिर पड़े. लोगों ने बड़ी मुश्किल से उनके भारी बदन को उठाया और कठिनाई के साथ डोली में लाद कर अल्मोड़ा जिला अस्पताल तक पहुंचाया. अल्मोड़ा के डाक्टरों ने देखा कि उनको ह्रदय सम्बन्धी बड़ी बीमारी है, साथ ही कमर के जोड़ों की हड्डियां भी खिसकी हुई हैं, तो उन्हें तुरन्त हल्द्वानी रेफर कर दिया. जहाँ ऑपरेशन की बात सामने आते ही हिडम्ब सिंह डर गए और चीर-फाड़ कराने से मना कर दिया. डॉक्टरों की सलाह न मानते हुए वे उसी रुग्ण अवस्था में वापस गाँव में लाये गए. कुछ लोगों ने समझाया भी कि आर्मी अस्पतालों में सब सुविधाएँ हैं, खर्चा भी नहीं होगा, पर उनकी मति पर पत्थर पड़े थे, जिद पर अड़े रहे कि ऑपरेशन नहीं कराना है. उनको चिंता हो रही थी कि ‘अगर ऑपरेशन में मैं मर गया तो मेरी जायदाद का क्या होगा? बैजन्ती का क्या होगा?’

'झगडू सिपाही' करीब आठ साल से बेबस बिस्तर पर पड़े हुए हैं, बहुत कमजोर हो गए हैं, मल-मूत्र उठाते हुए बेचारी बैजन्ती परेशान है, पर मजबूरी में अर्धांगिनी होने का अपना फर्ज निभा रही है.

वाणी की कठोरता व कटुता की वजह से पहले से ही भले लोग उनसे किनारा करते थे, अब इस लम्बी असाध्य बीमारी ने मातम-पुर्सी करने आने वालों का भी आना लगभग बन्द हो गया है. हिडम्ब सिंह भगवान से प्रार्थना करने लगे हैं कि “भगवान मुझे मौत दे दे,” पर भगवान भी इतना निष्ठुर बन गया है कि उनकी बात सुनता ही नहीं.
                                            ***   

गुरुवार, 21 जून 2012

हिलोर

उनका पूरा नाम हेमा शर्मा जनार्दन रेड्डी है. वह जब शिमला में बी.एड. का प्रशिक्षण ले रही थी, तभी उनकी मुलाक़ात एयर फ़ोर्स के पायलेट स्वर्गीय जनार्दन रेड्डी से हुई. मुलाक़ात प्यार में बदली और प्यार शादी में. वह हिमांचली लड़की थी और उनका पूरा परिवार रूढ़िवादी व संकीर्ण विचारों वाला था. फलत: उन्हे विद्रोह करना पड़ा तथा परिवार जनों से संपर्क-सम्बन्ध पूरी तरह टूट गए.

पायलेट जनार्दन रेड्डी आंध्र प्रदेश के रिमोट गाँव के रहने वाले थे. उनके परिवार में सभी जने सिर्फ तेलुगु भाषा बोलने समझने वाले थे अत: हेमा की पटरी वहां नहीं बैठी. वह मुम्बई में ही रही. उनका दुर्भाग्य था कि जनार्दन रेड्डी शादी के पाँच साल बाद एक हवाई दुर्घटना के शिकार हो गए, तब उनका बेटा सुदर्शन मात्र तीन साल का था.

हेमा बहुत हिम्मतवाली थी उसे बी.एम.सी. के स्कूल में अध्यापक की नौकरी मिल गयी. उन्होंने अपने आत्मविश्वास को कायम रखते हुए सुदर्शन को बड़ा किया, पढ़ाया और तमाम संस्कार दिये. उसको बाप की कमी कभी महसूस नहीं होने दी. जनार्दन रेड्डी की जीवन बीमा पालिसीस व अन्य विभागीय श्रोतों से जमा पूंजी से हेमा को कभी भी आर्थिक विपन्नता नहीं हुई. उसने नई मुम्बई में एक बढ़िया फ़्लैट खरीदा, बेटे को महंगे पब्लिक स्कूलों में पढ़ाते हुए पूना से एम.टेक. करवाया. उनका ये एकसूत्री कार्यक्रम उनके बुरे दिनों का सहारा बना. यों जवानी कब कट गयी पता ही नहीं चला.

वह देखने में अतीव सुन्दर थी और आज भी हैं. उनके रूप लावण्य पर बहुत से परिचितों-अपरिचितों की ललचाई दृष्टि भी कई बार रही, लेकिन हेमा ने किसी को घास नहीं डाली. मुम्बई का आम जीवन ही इतना तेज भाग-दौड़ तथा व्यस्तता का रहता है कि पड़ोस तक के बाशिन्दों से कई बार परिचय नहीं हो पाता है. उनके साथ भी ऐसा ही हुआ. हाँ, सुदर्शन के यार-दोस्त, व सहपाठियों का उनसे संपर्क होता रहता था. पर ये सब रसमी मुलाक़ात सी ही होती थी.

हेमा चाहती थी कि सुदर्शन हमेशा उनके पास मुम्बई में ही रहे, चाहे उसको नौकरी में पैसा कम ही मिले, पर आजकल के लड़कों के तो बड़े बड़े पंख-डेने उगे रहते हैं. सुदर्शन को एक अमरीकी कंपनी में सर्वेयर के पद की नौकरी मिल गयी और वह अपने काम के सिलसिले में दुनिया के अनेक देशों के हवाई सर्वेक्षण तथा भू-गर्भ खनिजों की खोज में घूमने लगा. उसके खून में भी ‘लव-जीन्स’ थे और उसने अपनी सहकर्मी कैटरीना जोब्स से आस्ट्रेलिया में कोर्ट मैरेज करके माँ को बता दिया कि वह भी अपने बाप से कम नहीं है.

वह कैटरीना को लेकर कई बार मुम्बई भी आता था और माँ को अपनी सफलता की दास्ताँ सुनाता रहता था. वह माँ से आस्ट्रेलिया चलने के लिए बहुत जिद करता रहता था, पर माँ ने तो उसी दिन हवाई जहाज में न बैठने की कसम खा ली थी जिस दिन जनार्दन रेड्डी को हवाई यात्रा लील गयी थी.

वह जब तक नौकरी में रही, अपने आपको उसी दिनचर्या में व्यस्त रखती रही. वह स्कूल की प्रिंसिपल हो गयी थी इसलिए भी सर्विस के अन्तिम १०-१५ वर्षों में प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाते हुए उनको अपने निजी जीवन के बारे में ज्यादा सोचने का वक्त ही नहीं मिला था. पर, अब जब बेटा परदेसी हो गया है तथा खुद को नौकरी से रिटायरमेंट मिल चुका है, तो वह एकदम अकेली हो गयी हैं, मानो जैसलमेर के निर्जन रेतीले ‘सम’ में दिशाहीन खड़ी हो गयी हो.

उनकी एक साथी-सहेली ने सलाह दी कि समय काटने के लिए उनको किसी सोशल नेटवर्किंग साईट से जुड़ जाना चाहिए. उसकी सलाह पर ही हेमा मैडम ने फेसबुक में अपना खाता खोल कर अपनी जान पहचान बढ़ानी शुरू कर दी. अपरिचित लोगों को भी मित्रता के निवेदन क्लिक किये. फेसबुक पर उन्होंने अपनी जवानी की एक खूबसूरत तस्वीर भी लगा दी. वैसे भी वह आज साठ साल की उम्र पार करने के बाद भी बहुत सुन्दर, सुडौल और आकर्षक हैं. अपने मेकअप और स्मार्ट लुक पर उन्होंने हमेशा ध्यान रखा. उनको देखकर ऐसा कतई नहीं लगता है कि वे साठा हो गयी हैं.

फेसबुक पर नए मित्र ढूढने पर या मित्रों से चैटिंग करने पर उनको अजीब सी गुदगुदी होने लगती थी. लिस्ट में जवान छोकरे-छापरों के बजाय उम्रदराज श्वेतकेशी पुरुषों को क्लिक करना उनकी पसंद थी. एक बार एक नौजवान स्टूडेंट राजेन्द्र भट्ट को यों ही गैर इरादतन जब मित्रता रिक्वेस्ट दी तो उसने मित्रता स्वीकार करने के बजाय मैसेज में जवाब लिखा कि “हे माँ, अब तुम भगवान का भजन किया करो. फेसबुक में कहाँ फँस रही हो?” यह जवाब पढ़ कर वे सन्न रह गयी, फिर मुस्कुराई. उनको ये मालूम था कि वास्तव में फेसबुक का आविष्कारक मार्क जकरबर्ग ने विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के आपसी संवाद करने के लिए इस साईट की संकल्पना की थी. अब तो अच्छे बुरी सभी लोग करोंडों की संख्या में फेसबुक में आ गए हैं. अनचाहे फालतू बातो व चित्रों की भीड़ इस साईट पर आ गयी है. कुछ लोग तो अपना राजनैतिक वमन को भी इसमें उडेलने लगे हैं.

हेमा जनार्दन रेड्डी का उद्देश्य तो केवल समय काटना व मनोरंजन तक सीमित था अब उनको इसका चस्का जरूर लग गया था. उन्होंने लगभग ५० मित्र बना डाले हैं. उनसे चैटिंग करती हैं, और एक नई ऊर्जा का अनुभव करती हैं. ऐसा लगने लगा कि उनके परिवार का दायरा काफी बड़ा हो गया है. जीवन के अनछुए पल फिर से उमंग और उत्साह पैदा करने लगे हैं.

हिमांचल के सोलन शहर के जनार्दन ठाकुर नाम के एक व्यक्ति से जब हेमा का फेसबुक पर संपर्क हुआ तो उन्हें लगा कि ३६ साल पहले का जनार्दन रेड्डी उनसे बतिया रहा है. जनार्दन ठाकुर ६५ वर्षीय रिटायर्ड एक्जेक्यूटिव इंजीनियर हैं. वे विधुर हैं. उनका जनार्दन नाम देखकर ही हेमा ने मित्रता के लिए क्लिक किया था और जब उनसे लम्बी लम्बी चैटिंग होने लगी तो अपनेपन का एहसास भी जागने लगा. ठाकुर के सोलन बुलावे पर मन में एक बड़ा तूफ़ान सा उठा, गुदगुदी हुई, राजेन्द्र भट्ट की टिप्पणी भी उनके दिमाग में कौंधती रही, लेकिन अंत में मन जीत गया, हिलोरें लेने लगा. उन्हें लगा कि शिमला की वादियाँ उन्हें जोर जोर से पुकार रही हैं. उन्होंने रेल रिजर्वेशन कराया और चल पडी. दिल्ली के बाद जब शिमला वाली ट्रेन में सवार हुई तो लगा कि वह अपने कल्पना लोक में लौट रही हैं, जहाँ कोई उनका बेसब्री से इन्तजार कर रहा है.
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