सोमवार, 5 मार्च 2012

काल चिन्तन

अपने देश में अनेक तरह के विश्वास व परम्पराएं विद्यमान हैं. दूसरी संस्कृतियों में पले हुए लोग जब यहाँ आते हैं तो विस्मय करते होंगे. विदेशी पत्र-पत्रिकाओं में पर्यटक लोग अपने-अपने तरीकों से उसका वर्णन करते हैं. इसलिए पाश्चात्य देशों में भारत को अजूबों का देश कहा जाता है. ये है भी सच कि हमारे देश में बहुत अजूबे देखने को मिलते हैं. चूँकि हम इनको नित्यप्रति देखते रहते हैं इसलिए हमें कोई हैरानी नहीं होती है.  

संयुक्त राज्य अमेरिका की बस्तियों में हजारों हजार बढ़िया चर्च बने हुए हैं और क्रिश्चियंस अपने अपने चर्चों के प्रति समर्पित व आस्थावान होते हैं. वे क्राइस्ट को सार्वभौम-सर्वशक्तिमान मानते हैं. वे लोग क्राइस्ट को न मानने वालों लोगों के बारे में बहुत अच्छा भी नहीं सोचते हैं. वैसे अमेरिका में यूरोपीय मूल के लोग आकर बसे हुए हैं, मूल भूमिपुत्र यानि आदिवासी लोग या तो अतिक्रमणकारियों के साथ लड़ते हुए मारे गए थे अथवा यूरोप से आये हुए वायरसों के कारण बीमार होकर मर गए क्योंकि उन आदिवासियों में वायरसों से लड़ने की प्रतिरोधात्मक शक्ति नहीं थी अत: वे संख्या में सीमित हो गए थे. और अब, अफ्रीकी मूल के लोग जिनके पूर्वजों को गुलाम बना कर लाया गया था वहाँ बहुतायत में हो गए हैं, उनको अब नीग्रो पुकारना एक अपराध माना जाता है. वे अफ्रो-अमेरिकन कहलाते हैं. वर्तमान में तो मुस्लिम अश्वेत बाप व क्रिश्चियन श्वेत माँ का अश्वेत बेटा बराक हुसैन ओबामा वहाँ राष्ट्राध्यक्ष है. एक मिलीजुली खिचड़ी संस्कृति वहाँ कायम है. विकसित देश है, आर्थिक सम्पन्नता है इसलिए सारे विश्व पर अपना दबदबा बनाए रखना चाहता है. पर परिवर्तन के लिए वैचारिक क्रान्ति वहाँ भी अवश्य चल रही होगी.

यहाँ हमारे देश के बड़े शहरों में भी पश्चिमी रहन-सहन, खान-पान व संस्कृति का प्रभाव हर मामलों में दृष्टिगोचर होने लगा है. बड़ा देश है इसलिए क्षेत्रीय आधार पर धार्मिक आस्थाओं ने भी अपनी अपनी अलग पहचान बनाई हुई हैं. बड़ी बात ये भी है कि हम लोग आर्थिक क्रान्ति के दौर से गुजर रहे हैं, अत: हर तरह के आर्थिक भ्रष्टाचार में लिप्त हैं. कई मायनों में तो यहाँ भ्रष्टाचार ने शिष्टाचार का रूप ले लिया है. हम लोग अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए रिश्वत देना या लेना कोई पाप नहीं समझते हैं. पाप-पुण्य की परिभाषायें बेमानी लगने लगी हैं.

आज जो हमारा असली भारत है जिसका दर्शन दूर-दराज के गाँव-कस्बों में किया जा सकता है वह अभी भी दशाब्दियों पीछे चल रहा है. ये जरूर है कि संचार-क्रान्ति ने मीडिया के मार्फ़त दुनिया को सिमटा कर बहुत छोटा कर दिया है, जिसकी दस्तक वहाँ भी दी जाने लगी है. इसका प्रभाव लोगों की धार्मिक आस्थाओं व मान्यताओं पर दृष्टिकोण. अत: ये शंका सही है कि आने वाली तीन-चार पीढ़ियों में बहुत कुछ बदल जाएगा.

मंदिरों-शिवालयों में दर्शनार्थियों की लम्बी कतारें, तीर्थों/कुम्भ मेलों में स्नानार्थियों के रेले, लाखों-लाख जटाजूट भस्मी रमाये साधू-सन्यासी, मस्जिदों में नमाजियों की कतारें और गुरुद्वारों में बड़े बड़े लंगर, सब हमारे धार्मिक आस्थाओं के द्योतक हैं. इनका ये स्वरुप अनंत काल तक ऐसा ही बना रहेगा अब संदेह होने लगा है.

शास्त्रीय विधि-विधान पूजा-पाठों के अलावा भी कुछ अंध आस्थाएं भी हैं, जैसे जानवरों की बलि/कुर्बानी. अब लोग इसके औचित्य पर सोचने-लिखने की जुर्रत कर रहे हैं. हालाँकि कट्टरता वाला पक्ष इतनी आसानी से परिवर्तन स्वीकार नहीं कर सकते हैं. पर विचार संघर्ष तो चल ही रहा है.

इधर ये भी सोच ज़िंदा है कि देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए लोग अपने शरीर को यातनायें खुद देते है, मंदिरों तक पहुँचने के लिए लुढ़क कर या लेट कर दंडवत करते हुए बढ़ते हैं. नंगे पैर चलते हैं. पश्चिमी भारत के मंदिरों में गंगा-जल लाकर रुद्राभिषेक करने का चलन जूनून की हद तक बढ़ता जा रहा है.

इन तमाम मुद्दों पर यदि हम बहस करने लगते हैं तो आस्थावानों की आस्थाओं पर चोट कही जायेगी, पर समय तो हमेशा परिवर्तनशील रहा है. जो कल था वह आज नहीं है. एक व्यंगात्मक पाकिस्तानी प्रहसन मैंने बहुत साल पहले रेडियो पर सुना था जिसमे एक मुसलमान, मस्जिद के मौलवी जी से बातें करता है. मुद्दा ये था कि मुसलमान का बकरा मस्जिद में जाकर फूल-पौधे चट कर जाता था. तंग आकर एक दिन मौलवी जी ने बकरे को बाँध लिया. बकरे का मालिक उसको खोजते हुए मस्जिद में पहुँच कर मौलवी जी से कहता है कि बकरा उसका है, उसे छोड़ दिया जाये. इस पर मौलवी जी अपनी नाराजी जाहिर करते हुए कहते हैं कि ये मस्जिद में आकर नुकसान कर जाता है, मैं इसको जिबह करूँगा (काटूंगा.) बड़े अनुनय-विनय के स्वर में मुसलमान बोलता है, मौलवी साहब, इसको मुआफ करके छोड़ दीजिए, ये तो बेचारा जानवर है वरना आजकल कौन आता है आपकी मस्जिद में?

भौतिकवाद की इस भागदौड़ में सचमुच हम सब धार्मिक आस्थाओं को गौण मानते हुए केवल अर्थ व काम के लिए जी रहे हैं. जिसका कोई अंत नहीं है.
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3 टिप्‍पणियां:

  1. धार्मिक परम्पराएं पहले भी अवैज्ञानिक थीं,आगे भी रहेंगी। बात अवैज्ञानिकता अथवा अज्ञानता तक सीमित रहती तो भी क्षम्य थी। बात है अपने भीतर बैठे भय को धार्मिक कर्मकांड का रूप देने से पैदा रुग्णता की। हम देख ही रहे हैं कि आज धार्मिक आदमी ढूंढे नही मिलता। जो खुद को कहता है,वह भी आवरण में लिपटा है।

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  2. वाह!
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    होली की शुभकामनाएँ!

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  3. अच्छा विमर्श है। समय के साथ सब बदलता ही है।

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