सोमवार, 12 मार्च 2012

दोस्ती में दगा

किसी शायर ने अपनी मौज में लिखा है कि :
           अच्छी सूरत का क्या करे कोई,
           जिसने भी डाली बुरी नजर डाली.
लेकिन बबीना की तो सूरत भी अच्छी नहीं कही जा सकती थी वह मोटी थी, साँवली थी और बचपन में ही शीतला माता ने उसका चेहरा ऐसा बिगाड़ा कि हजार चिन्दे चेहरे पर दाग दिये थे. पर बबीना अपनी इस कमजोरी के प्रति कभी चिंतित नहीं रही. वह गजब का मेकअप करके रहती थी और खुद को बॉलीवुड की हीरोइनों से कम नहीं समझती थी.

बबीना की दादा हिन्दू मेहतर जाति के थे. मध्य प्रदेश के रतलाम के ईसा नगर (पुराना नाम. भटवाडा) के बाशिंदे थे. उस गाँव में सभी गरीब मेहतर ही रहते थे और रतलाम नगर में पीढ़ियों से साफ़-सफाई, झाडू का काम करते
आ रहे थे. पादरी साहब ऐलेक्स की नजर इस बस्ती पर पड़ी तो सबकी जिंदगी की दशा और दिशा दोनों ही बदल गयी. पूरा गाँव एक साथ ईसाई हो गया. गाँव का नाम भी उन्होंने उनके साथ ही बदल कर ईसा नगर कर दिया. ईसाई धर्म की यह खूबी है कि लोगों की सेवा, प्रेम, और मदद करके दिल जीता जाता है. उसका यही धार्मिक मिशन अद्वितीय व प्रशंसनीय रहा है और विश्व भर में फैलता गया.

ईसाई धर्म स्वीकारने से तुरंत फ़ायदा यह हुआ कि रातों-रात सभी के नाम के आगे साहब शब्द जुड़ गया. इस प्रकार हरलाल, हरबर्ट साहब हो गया. मिशनरी की तरफ से आर्थिक मदद के अलावा नौजवानों को रेलवे में या बड़ोदरा-अहमदाबाद के कारखानों में स्थाई नौकरियों में लगवा दिया गया. छोटे बच्चों को मिशन स्कूलों में दाखिला दिलवा दिया. हाँ पुरानी पीढ़ी के मेहतर-मेहतरानियाँ ईसाई बनने पर भी अपने पुराने धन्धे पर लगे रहे. पादरी साहब ऐलेक्स बड़े प्रभावशाली व्यक्ति थे. अंग्रेजों का राज था इसलिए उनकी कलम खूब चलती थी. हरबर्ट साहब को रेलवे वर्कशाप गंगापुर में नियुक्ति दिला दी गयी. कालान्तर में हरबर्ट साहब का बेटा गुडविन साहब भी रेलवे में मुलाजिम हो गया, जिनकी बेटी बबीना की शादी बाराँ के हैरिस मैसी के साथ हुई. हैरिस मैसी भी उन्ही की तरह कन्वर्टेड कैथोलिक ईसाई परिवार से था.

आजादी के बाद यद्यपि अंग्रेज अफसर चले गए, लेकिन उन्होंने अपने कार्यकाल में ईसाई कर्मचारियों को ज्यादा वेतन व प्रमोशन देने में खूब दरियादिली दिखाई थी. इस धर्म परिवर्तन के बाद समाज की सोच में भी भारी बदलाव आया. कन्वर्टेड लोगों की सामाजिक संस्कृति हिंदुओं से प्रभावित तो थी ही पर वे अपने आप की अंग्रेजों से भी तुलना कर लेते थे और कई कस्टम अंग्रेजों की ही तरह निभाए जाने लगे थे.

जब चर्च में गाजे-बाजे के साथ हैरिस मैसी और बबीना की शादी हुई तो सभी मेहमानों में दुल्हन को चूमने की होड़ सी रही, उनमें एक था हैरिस का जिगरी दोस्त, गफ्फार खान. ना जाने शादी के दिन से ही उसने बबीना पर क्या जादू कर दिया कि वह उसकी तरफ आकर्षित हो गयी और शादी के बाद भैया का रिश्ता बना कर उसके साथ आना जाना शुरू कर दिया.

अब भाई-बहिन का रिश्ता तो ऐसा होता है कि कोई उस पर शक करे तो मूर्ख ही कहलायेगा. पीठ पीछे तो लोग बातें करते ही हैं, पर बबीना को कोई फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि वह बहुत आजाद स्वभाव की और आवारागर्दी पसंद लड़की थी. गलती हैरिस मैसी की भी थी कि वह गफ्फार खान पर जरूरत से ज्यादा ही विश्वास करता था. बबीना कई कई हफ़्तों तक गफ्फार के साथ टोंक में रह आती थी. इस बीच बबीना ने एक लड़की को जन्म दिया, और नाम रखा गया, स्ट्रेला. वह लगभग एक साल की हो पाई थी कि एक दिन बबीना उसे बदकिस्मत हैरिस मैसी के भरोसे छोड़ कर के गफ्फार खान के साथ लापता हो गयी. बाद में करीब सात साल बाद गफ्फार खान बबीना के साथ फिर टोंक में प्रकट हुआ तब तक बबीना की गोद में दो लडकियां और आ चुकी थी.

गफ्फार खान बड़ी बेशर्मी से लोगों को बताता है कि उसने बबीना से बकायदा निकाह किया है, लेकिन जब उससे पूछा जाता है कि हैरिस मैसी से तुम्हारी दोस्ती का क्या हुआ? तो वह अपनी मक्कारी-दगाबाजी को किसी रिश्ते का नाम नहीं दे पाता.
                                   *** 

2 टिप्‍पणियां:

  1. कहानी के माध्यम से अच्छा किस्सा लिखा है आपने...

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  2. इसको कहते हैं डार्क ह्यूमर

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