शुक्रवार, 23 मार्च 2012

जज साहब

मैं खूबचंद्र, जज साहब से तब से जुड़ा हुआ हूँ, जब वे लोअर कोर्ट में वकालत करते थे. मैं उनका मुंशी था, उनके आफिस का कार्य संयोजन करता था. वे बड़े तेज-तर्रार, हंसमुख और बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी रहे हैं. शुरू शुरू में तो मैं उनसे बहुत डरता था और डांट भी खाता था, पर जैसे जैसे समय बीतता गया उनका मुझ पर और मेरा उन पर अपनेपन का अहसास व भरोसा बनता गया. बाद में वे मजिस्ट्रेट बने, पचास की उम्र पार होने के बाद तो वे हाईकोर्ट के जज बना दिये गए. उनकी जहाँ जहाँ भी पोस्टिंग हुई मैं उनके साथ गया. वे पैंसठ साल की उम्र में रिटायर हो गए. अब उनकी उम्र ७६ साल के करीब हो चुकी है. पर उन्होंने हुझे रिटायर नहीं होने दिया है. मैं उनका मैनेजर हूँ. मैं खुद भी चौंसठ साल का हो चुका हूँ. मैं जब भी उनसे अपनी रिटायर होने की बात करता हूँ तो वे रूआंसे हो जाते हैं. मैं बड़ा मजबूर हो गया हूँ कि मेरा उनके साथ ये बंधन मेरी बेडियाँ बन गयी हैं.

एक हंसमुख, चुलबुला, फितरती आदमी, जज बनते ही किस तरह आम लोगों से कट जाता है, और रिजर्व हो जाता है ये चमत्कारिक बदलाव मैंने स्वयं होते देखा है. विधुर भी वे ५५ साल की उम्र में ही हो गए थे पर उनके रोजनामचे में जो नित्यकर्म व अनुशासन बने हुए थे, मैडम की मृत्यु के उपरान्त भी वे उसी लीक पर बने रहे.

वे चाहते थे कि उनका इकलौता बेटा (जिसे वे प्यार से माय कॉमप्लेन बॉय कहते थे) भी क़ानून की पढ़ाई करके उनका उत्तराधिकारी बने लेकिन वह तो फ़ूड टैक्नोलजी में डिग्री लेकर एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में अधिकारी बन कर सुदूर अमेरिका में  पिट्सबर्ग जा कर बस गया और वहीं उसने एक सीरियाई मूल की सहकर्मी लड़की से शादी कर ली. इस प्रकार वह पिता से अनन्य प्यार करते हुए भी दूसरी दुनिया का व्यक्ति हो गया. उसकी दो पुत्रियां हैं. वे लोग पाँच-सात वर्षों के अंतराल में छुट्टियों में इंडिया आते जरूर हैं, पर उनको यहाँ का वातावरण बिलकुल माफिक नहीं आता है. यहाँ की घूल-धक्कड, धुंआ और गन्दगी से उनको एलर्जी होती है. यद्यपि बेटा चाहता है कि पिता जी उसके साथ जाकर अमेरिका में रहें, पर नहीं; जज साहब को अपनी निजता, अपना घर, और अपनी व्यवस्था से बहुत मोह है. वे कभी वहाँ नहीं गए.

जज साहब खुद क़ानून सम्बन्धी लेख-फीचर तथा किताबों के नियमित लेखक रहे हैं, लेकिन उनकी लायब्रेरी में एक हजार से अधिक किताबें हैं, जो कि दुनिया भर के नामी साहित्यकारों, वैज्ञानिकों या समाजशास्त्रियों द्वारा लिखित हैं. इस उम्र में भी जज साहब नित्य चार घन्टे अपनी स्टडी रूम में बिताते हैं. सेक्रेटरी को डिक्टेशन देते हैं और कई संस्थाओं को अनुदान देने और दिलाने का काम करते हैं.

रिटायरमेंट के बाद भी जज साहब को कई औद्योगिक घरानों से कानूनी सलाह-अनुबंधों के लिए सम्पर्क किया गया, लेकिन वे अपने वकालत के दिनों के सहयोगी-साथियों को आगे करते रहे, स्वयं किसी अनुबंध में नहीं पड़े. सरकार व कार्यपालिका से वे बहुत खिन्न रहते थे. अपने अदालती निर्णयों में उन्होंने अनेक स्ट्रिकचर पारित किये इसलिए वे किसी आयोग या जाँच कमीशन का सदस्य बन कर खुद को छोटा अनुभव नहीं करना चाहते थे.

उनका घरेलू नौकर दीनू उनके बारे में क्या कहता है वह भी उनके व्यक्तित्व के बारे में प्रकाश डालता है: मैं, दीनू उर्फ दीन मोहम्मद, बीस सालों से जज साहब का सेवक हूँ. घर में पीर, बावर्ची, भिश्ती, बियरर सब कुछ मैं ही हूँ. जज साहब एक नेक दिल इंसान हैं. मैनेजर साहब की तरह ही, मैं भी अपने मालिक को खूब अच्छी तरह समझने लगा हूँ. उनकी खाने पीने की रूचियाँ, उनका नित्य नियम सब मुझे मालूम रहता है. वे जो चाहते हैं मै उनके कहने से पहले ही तैयार करके रखता हूँ.

मैं और मेरा छोटा सा परिवार जज साहब की कोठी के अहाते में बने सर्वेंट क्वार्टर में रहते हैं. मैं चौबीसों घन्टे उनके लिए उपलब्ध रहता हूँ. कोई इंसान इतना विशाल ह्रदय, स्वच्छ विचार और दूसरों की तकलीफ को समझने वाला हो सकता है, इसकी मैंने पहले कभी कल्पना तक नहीं की थी. मैं तो नौकर बन कर इधर आया था ओर अब लगता है जज साहब के बिना मेरा कोई अस्तित्व नहीं है. कभी कभी तो मुझे डर लगने लगता है कि यदि जज साहब नही होंगे तो मेरा क्या होगा?

जज साहब की कुछ खास बातें ये हैं कि मैंने उनको कभी हंसते हुए नहीं देखा है. उनको सुबह सवेरे दो कप चाय देनी होती है. एक कप मीठी और एक कप फीकी. फीकी चाय को वे कभी पीते नहीं हैं यों ही पड़ी रहती है. बाद में ठण्डी हो जाने पर वे उसे स्वयं जाकर यार्ड में आंवले के पेड़ की जड़ में डाल आते थे.

मैनेजर साहब बताते हैं कि मैडम को डाईबीटीज थी और वे फीकी चाय पिया करती थी. उनके नाम की चाय आज भी वैसे ही बनती है. इसी प्रकार जज साहब के पलंग पर दो बिस्तर नित्य बिछते हैं और सुबह बदले जाते हैं, जिस पर दो तकिये अगल-बगल होते हैं. मैनेजर साहब ने इस बारे में भी मुझे बताया था कि मैडम का बिस्तर भी वर्षों से यथावत रोज सहेजा-बिछाया जाता है.

एक कमरा जिसमें मैडम की एक बड़ी फोटो लगी हुयी है, जज साहब ने उनकी याद में जैसा का तैसा सहेज कर बन्द रखा है. जिसकी सफाई सप्ताह में एक बार वे अपने सामने ही करवाया करते हैं. इस कमरे की अलमारियों में मैडम की साडियां, शालें, कपडे, जूले-चप्पल, छाते, ड्रेसिंग-टेबल, श्रृंगारदान का सामान व अनेक तरह की लाल हरी चूड़ियाँ, ना जाने क्या क्या सामान भरा है? सब करीने से समेटसहेज कर रखे गए हैं. एक कोने पर मेज के ऊपर एक बड़ा सा तम्बूरा भी खड़ा रखा गया है.

जब भी उनके बेटे का फोन आता है, वे बहुत बेचैन हो कर कमरों में घूमने लगते हैं. मैं उनकी बातें तो सुन/समझ नहीं पाता हूँ, लेकिन महसूस करता हूँ कि बच्चों की निकटता तो इस उम्र में हर व्यक्ति चाहता है. वैसे उन्होंने कभी भी मुझसे मेरी व्यक्तिगत बातें नहीं पूछी, लेकिन कल ना जाने उनको क्या सूझी उन्होंने मुझसे पूछा, तुम्हारे कितने बच्चे हैं?” मैंने बताया कि एक ही बच्चा है. तो वे गंभीरता से बोले, बच्चे तो कम से कम दो होने चाहिए," और ये कहते हुए वे गहन उदासी में डूब गए.    
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4 टिप्‍पणियां:

  1. जज साहब एक व्यक्ति चित्र बेहद प्रभावशाली रहा .हाँ एक दौर था जब डोमेस्टिक हेल्प परिवार का हिस्सा होता था .जज साहब की अधिकाधिक निर्भरता मुंशी और घरेलू सहायक पर बढती जाती है .यह सोच दो तरफ़ा है .मुंशी और वह सहायक भी ऐसा ही सोचतें हैं .

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  2. बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....

    इंडिया दर्पण की ओर से नव संवत्सर व नवरात्रि की शुभकामनाएँ।

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  3. aap bahut achcha likhte hai...bahut achchi prastuti

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