रविवार, 25 मार्च 2012

मन पंछीड़ा

मैं गाजियाबाद के इंदिरापुरम इलाके के वैभव खंड की बहुमंजिली इमारत की छठी मंजिल की बाल्कनी में बैठ कर बाहर के विहँगम दृश्य को निहार रहा हूँ. नीचे सड़क पर सैकड़ों की संख्या में रंग बिरंगी कारें खड़ी हैं या रेंग रही हैं. चारों ओर अट्टालिकाओं का किला सा बना हुआ है और गोलाई में सब तरफ घरों की बाल्कनियां ही बाल्कनियां हैं. बीच में बड़ा सा हरा-भरा गोल पार्क है जिसमें घरों से बाहर निकल कर आये हुए थके-मांदे लोग, औरतें तथा खेलने-कूदने में व्यस्त छोटे बच्चे, गतिमान नजर आ रहे हैं. पार्क के एक गेट पर फलों का एक ठेला नित्य लगता है, जिसमें सेव, संतरे, अमरुद, पपीते, अंगूर, चीकू, अनार और केले आदि प्रचुर मात्रा में रहते हैं, खूब बिकते भी हैं. वैभव पार्क में वैभवशाली लोग ही रहते हैं. फलों की खरीद में बिरले ही उनका भाव पूछते हैं. ये महानगर का ऐसा हिस्सा है, जहां हमारे देश की एक नई संस्कृति का संक्रमण हो रहा है.

पार्क में ६०+ या ७०+ आयु वर्ग के लोगों के अनेक लोग समूह बना कर उपस्थित होते हैं. कुछ तो सुबह-सवेरे टहलने, सामूहिक योगाभ्यास करने अथवा कसरतें करने के लिए आते हैं, और बहुत से रिटायर्ड+टायर्ड लोग बाद में धूप/छाँव में बैठ कर देश-दुनिया की राजनीति संबंधी या अपने स्वास्थ्य सम्बन्धी विषयों पर बहस/चर्चा करके समय काटते हैं. इनमें कोई उत्तराखंडी, कोई कश्मीरी, कोई पंजाबी, कोई यू.पी. का या बिहार-बंगाल का मूल निवासी है. ये लोग पिछले दो-पाँच वर्षों में इन फ्लैटों के मालिक बने हैं. लगभग सभी के बेटे/बहू रोजगार करते हैं.

जनवरी-फरवरी में इस बार ठण्ड भी ज्यादा ही पड़ी तो घूप सेकनेवाली औरतें भी बड़ी संख्या में पार्क में नजर आ रही थीं. मनोरंजन के लिए अन्ताक्षरी, तम्बोला व हंसी ठट्टे की आवाजें इनके समूहों से आती थी. कुल मिला कर मैं ये निष्कर्ष निकालता हूँ कि ये अपनी मूल जमीन से उखड़े हुए लोग इस नए वातावरण में आत्मसात होने की प्रक्रिया में हैं.

अपने अपने गाँव-शहरों या प्रदेशों से आये हुए पुरानी पीढ़ी के लोग, जरूर अपने अतीत को याद करके लम्बी लम्बी सांसें लेते रहते हैं, पर नई पीढ़ी तो साईबर युग की है, जो घास, गोबर, गाय, भैंस, बकरी इत्यादि को केवल डिस्कवरी चैनल पर देख कर मस्त हो जाती हैं या कभी छुट्टी-छपाटी में अपने नौनिहालों को चिड़िया घर ले जाकर आदिम धरा के मूल निवासियों के वंशजों को देख आते हैं. घर लौटते हुए रास्ते में गोलगप्पे, चाट, चाउमिन, बर्गर, पिज्जा या छोले-भठूरे से तृप्त हो कर आते हैं.

यहाँ मैं अपने कनिष्ट पुत्र चिरंजीव प्रद्युम्न के आवास में सभी आधुनिक सुख-सुविधाओं को भोगते हुए जिंदगी के चौथे पहर की दहलीज पर समय रूपी विशाल पहाड़ की चोटी पर विचारों की दूरबीन लिए हुए, एक तरफ अतीत व दूसरी तरफ भविष्य का दृश्य देख सकता हूँ. भविष्य के दृश्य तो अभी कल्पनातीत ज्यादा हैं इसलिए स्पष्ट भी नहीं हैं लेकिन अतीत को मैं साफ़ साफ़ देख रहा हूँ. अपने बाल्यकाल में जाकर, बागेश्वर धाम से सात मील उत्तर में गौरीउडियार/पुरकोट की वादियों में विचरण करने लगा हूँ.

आज से चैत्र का महीना लग गया है. प्योली और बुराँश फूले हुए होंगे. आज ही फूलदेई का मनोहारी त्योहार मनाया जा रहा होगा. छोटे बच्चे घर-घर जा कर फूल और अक्षत देहरियों पर बिखेर रहे होंगे. जल्दी ही काफल, हिसालू, किलमोड़ी, बेडु, चुआरू, खुमानी, आलूबुखारा, जामुन, किम (शहतूत) व गुनकाफल पकने लगेंगे. धौल के लाल फूलों में शहद भर गया होगा तथा दय के साबूदाने जैसे श्वेत दानों में मिठास आ गयी होगी. बाद में शहद भरे तिमिल पकने लगेंगे. दाड़िम, अनार, जामीर, माताककड़ी, नीबू आदि फल अपने समय से हर वर्ष की तरह पेड़ों पर लद जायेंगे. नाशपती, मिहोल, लुकाट अखरोट, पांगर, आम, व केलों की सौगात समय समय पर मिलती होगी.  

अभी तो गेहूं की उमी और असोज में तिल, भंगीरा, गुड़ युक्त खाजे, घी में तर उडद के बेडू रोटी, धारे नौले का निर्मल शुद्ध पानी, हरेला जन्यो-पुण्यों, बग्वाली पर खीर-पूड़ी, घीत्यार का दानेदार-खुशबूदार घी, मकर संक्रांति के घुघुते, बिना चीनी का स्वादिस्ट दूध-बिगौत, मलाईदार दही, मडुआ की रोटी, कौणी-झुंगर का भात, छांछ वाला जौला, भट की चुरकानी, तरूड, गेठी, गडेरी की सब्जी और कार्तिक-मार्गशीष में कोल्हू पर बनने वाला गुड़ और शीरा, किस किस मिठास को याद करूँ रील बहुत लम्बी है.

मैं उड़ कर सत्तर साल पीछे जाकर अपनी ईजा (माँ) की गोद में सर रखना चाहता हूँ. चाहता हूँ कि बाबू (पिताजी) के कन्धों पर फिर से बैठ जाऊं. पर क्या मेरे इस दिवास्वप्न के पंख गुजरे समय के तरफ उड़ने की ताकत दे सकेंगे? माता-पिता को स्वर्ग सिधारे एक अरसा हो गया है. उन सुनहरे लम्हों को यहाँ याद करके दिल भर आ रहा है और आनंद की अनुभूति कर रहा हूँ, लेकिन अक्षम हूँ एक खुले पिंजड़े के पंख विहीन पंछी की तरह.
                                      ***

9 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया भाई जी |

    आभार ||

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...
    आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 26-03-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  3. वतमान और अतीत को दृष्टा भाव से निहारता संस्मरण ,रिपोर्ताज और वह सब कुछ जो हमारे आस पास निरंतर घटित हो रहा है .बढ़िया पोस्ट .आभार .

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  4. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति।

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  5. अतीत नजरों मे स्पष्ट भले हो पर वहाँ पहुँचना नामुमकिन....
    भविष्य धुंधला हो मगर वहाँ पहुँच कर संवारना मुमकिन...

    सादर....

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  6. आपकी सभी रचनाये हृदयस्पर्शी और informative होती है

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  7. मार्मिक, हृदयस्पर्शी आलेख.
    अपनी बालकनी से आपने मुझे भी 'उन वादियों' में बिचरने को मजबूर कर दिया...अंतिम पैरा तो ... बरबस ही डुबोता है भावुकता में....आभार.

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  8. kshmaa chhahtaa hoon ki hindi mein type nahin kar paa rahaa hoon...
    mujhe apne almore main bitaaye pyaare bachpan ki yaad taazaa ho aayee...aapke sateek varnan ki mein dil se prashanshaa karataa hoon..aapke is saahitya se mere jaise bahut saare log laabhaanvit ho rahen honge...aise he anek saahitya ko aage bhi padhte rahne ki aakaaksha rakhtaa hoon....saadar...ravi

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