शनिवार, 2 जून 2012

गीत -३

तेरी मन-मोहन अखियों में
      अपने सपने देखा करता हूँ,
सुधियाँ पाकर सुध खो डाली
      सुधियों में खुद खो जाता हूँ.

अवलंबन पाकर भी कोई
     उर की पीर बनी रह जाये,
झंकृत तार कसे हैं ऐसे,
      कहना चाहूँ कही न जाये

सब भूल भुलैया साथ रहे जब
      दूर  की  दूरी  ही समझाए
कैसे बिन प्रियवर जीवन,
      लिखना चाहूँ लिखा न जाये.

बनते रहते गीत मौसमी
      उनमें तुमको समा रहा हूँ
उनसे प्यारी सेज कहाँ है?
      फलत: तुमको बुला रहा हूँ.
             ***

3 टिप्‍पणियां:

  1. वाह...बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  2. सब भूल भुलैया साथ रहे जब
    दूर की दूरी ही समझाए
    कैसे बिन प्रियवर जीवन,
    लिखना चाहूँ लिखा न जाये.
    ..बहुत खूब प्रेम की बानगी ..

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