मंगलवार, 5 जून 2012

बिच्छू का डंक

अनीश्वरवादी लोगों का तर्क रहता है कि इस सँसार में कोई भी अदृश्य शक्ति ईश्वर के नाम की नहीं होती है. ये तो सब प्रकृति का करिश्मा है, जो समय चक्र के साथ घटनाएँ घटती रहती हैं, वे संयोगवश ही आपस में जुड़ी रहती हैं.

मैं इनके तर्क पर बहस नहीं करना चाहता हूँ और ये मानता हूँ कि कोई ऐसी पराशक्ति जरूर है जो सारी प्रकृति पर नियंत्रण रखती है. हमारा दर्शन शास्त्र इस विषय में बहुत स्पष्ट एवँ गंभीर विवेचन करता है, और हर व्यक्ति इसकी तह तक जा भी नहीं सकता है.

इस विश्व में कई अजूबे हैं, कई करिश्माई चीजें हैं, जिनसे यह विश्वास होता है कि कोई तो है जो सारे चक्र को घुमा रहा है. एक रोचक दृष्टान्त मैं अपने पाठकों तक पंहुचाना चाहता हूँ :

राजस्थान के बूंदी जिले में स्थित हमारे ए.सी.सी. सीमेंट कारखाने में प्रेमसिंह नाम के एक हवलदार, सेक्युरिटी डिपार्टमेंट में थे. वे बहुत सरल और सीधे व्यक्ति थे. पहले आर्मी में सर्विस करते थे जहाँ से उन्हें मेडिकल ग्राउंड पर रिटायर कर दिया गया क्योंकि उनके कमर के जोड़ों में दर्द रहता था. जिसका आर्मी में रहते हुए बहुत ईलाज कराया गया और बाद में भी अस्थि रोग विशेषज्ञों को कई जगह दिखाया गया पर दर्द लाईलाज बना रहा. जिस कारण उनको, कमर आगे को झुका कर लाचारी में चलना पड़ता था.

सोल्जर बोर्ड के माध्यम से उनको प्राइवेट सेक्युरिटी में पुन: काम मिल गया, जहां उन्होंने बीस वर्षों तक नौकरी भी की. चूँकि वे मेरे ही गृह जिला, अल्मोड़ा, के रहने वाले थे इसलिए विशेष रूप से उनसे स्नेह-सम्बन्ध व अपनापन बना रहा. सं १९७० में मेरा स्थानातरण शाहाबाद, कर्नाटक, को हो गया, तब उनसे उसी टेढ़ी कमर की स्थिति में विदाई ली थी. चार साल बाद जब मैं पुन: स्थानातरित होकर वापस राजस्थान लौटा तो देखता क्या हूँ कि प्रेमसिंह बिलकुल स्वस्थ थे. सीधी कमर करके परेड कर रहे थे. जब मैंने इस बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि एक बार नाईट ड्यूटी में वे पत्थर की खदानों की तरफ थे. रात में वहीं खुले में लेट गए. सौभाग्य या दुर्भाग्यवश एक जहरीले बिच्छू ने उनके पैर में डंक मार दिया. वे तड़पते रहे, बेहोश हो गए. अन्य कर्मचारियों ने उनको अस्पताल पहुंचाया. अगले दिन जब उनको होश आया तो ताज्जुब इस बात का रहा कि जिस कमर दर्द को वे सालों से झेल रहे थे, वह पूरी तरह गायब हो गया था.

इस बारे में तत्कालीन सी.एम.ओ. डॉ. जी.एस. चड्डा ने बताया कि बिच्छू के डंक में आर्सनिक नाम का विष होता है, जो असाध्य जोड़ों के दर्द में रामबाण का काम कर गया.

बिच्छू के डंक मारने पर जो असह्य वेदना होती है उससे बचाव के लिए अस्पतालों में लोकल ऐनेस्थीसिया दिया जाता है, उससे काफी राहत मिलती है. काले बड़े जहरीले बिच्छूओं के डंक जानलेवा भी होते है.

बहरहाल प्रेमसिंह वाले बिच्छू कांड पर विचार करने पर ऐसा लगता है कि यह मामला पूरी तरह किसी पराशक्ति द्वारा प्रायोजित था, जिसको हम ईश्वर नाम देते हैं.
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5 टिप्‍पणियां:

  1. अपने बहुत ही अच्छी तरह से और सयुक्त सब्दो को सजोया है मन पर्फुलित होगया यहाँ आके
    http://dineshpareek19.blogspot.in/2012/06/blog-post_04.html
    आप मेरे ब्लॉग पे आये इस से मेरा मन बड़ा ही खुश हुवा है आशा करता हूँ की आप आगे भी निरंतर आते रहेंगे
    आपका बहुत बहुत धयवाद
    दिनेश पारीक

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  2. बिच्छू का डंक... खतरनाक
    अच्छी प्रस्तुती

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  3. लोहा लोहे को काटता है

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  4. बिच्छू के डंक मारने पर जो असह्य वेदना होती है उससे बचाव के लिए अस्पतालों में लोकल ऐनेस्थीसिया दिया जाता है, उससे काफी राहत मिलती है. काले बड़े जहरीले बिच्छूओं के डंक जानलेवा भी होते है...
    बहुत बढ़िया जानकारी ...

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  5. maybe we should try to bind everything in reason, and just feel the moment .

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