शनिवार, 16 जून 2012

अहँकार

आम तौर पर मैं अपनी लेखनी को विवादास्पद राजनैतिक मुद्दों पर चलाता नहीं हूँ, लेकिन सुश्री ममता बैनर्जी के चाल-चरित्र को यानि उनके दर्प/अहंकार को देखकर बरबस लिखने का मन हो पड़ा है.

गत चुनाव में ममता बैनर्जी एक जुझारू राजनेता के रूप में उभरी. उन्होंने पश्चिम बंगाल की तीन दशकों से जमी हुई वामपंथी सरकार को लोकतांत्रिक ढंग से पदच्युत करने के लिए अकेले ही संघर्ष करके कठिन परिस्थितियों में एक संगठन खड़ा किया. आम लोग परिवर्तन के साथ साथ यह भी चाहते थे कि जमीन से जुड़ा कोई संघर्षशील नेता उनको मिले. ममता बहुमत के साथ जीती. कहते हैं कि दौलत कमाने से ज्यादा उसे सँभालने का हुनर आना चाहिए. अगर ममता बैनर्जी के ‘बर्रा प्रकृति’ और छिछोरपन का यही हाल रहा तो उनका सूर्य जिस तेजी से उभरा था, उसी तेजी से अस्त भी हो जाएगा.

इस पड़ाव पर उनमें बहुत संजीदगी आ जानी चाहिए थी. इससे पूर्व वाजपेयी जी की सरकार में भी वे अपने लड़ाकू व्यवहार की वजह से अलग हो गयी थी. जिस गठबन्धन की आप साझीदार हैं, उसके प्रति उत्तरदायित्व की भावना होनी चाहिए, पर नहीं, वे इस परिपेक्ष्य में कभी भी खरी नहीं उतरी. वे किसी की भी सगी नहीं रहीं. अब देश के गौरवशाली पद राष्ट्रपति के चुनाव में उन्होंने जो भूमिका निभाई उसकी कहीं भी तारीफ़ नहीं हो रही है, नतीजन वे अलग थलग पड़ गयी हैं. माननीय कलाम साहब की लोकप्रियता व योग्यता को उन्होंने जिस तरह अपना हथियार बनाकर उछाला, वह सही तरीका नहीं था. यह उनका अहंकार ही है जो उनको आगे जाकर अंधी गुफा में लेकर जाएगा. उनके निरंकुश व्यवहार से उनके अपने संगी साथी भी अलग होते चले जायेंगे. यह भविष्यवाणी नहीं है, अपितु परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित परिणाम की पूर्व घोषणा है.

राजनेताओं को अपनी वाणी पर संयम रखना बहुत जरूरी है. उनके सलाहकार सुलझे हुए दूरदर्शी होने चाहिए. पर ममता जी तो अपनी मालिक खुद ही हैं. लम्बी रेस के घोड़ों को दीवारों से टकराने व खाईयों में कूदने से बचना होता है. ममता जी का आचरण अपरिपक्वता एवं अहंकार से अभिभूत है. इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि अहंकारी व्यक्ति की सफलता क्षणिक होती है.

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3 टिप्‍पणियां:

  1. ढर्रा बदलेगी नहीं, रोज अड़ाये टांग ।

    खांई में बच्चे सहित, ममता मार छलांग ।

    'ममता' मार छलांग, भूलती मानुष माटी ।

    धंसी 'मुलायम' भूमि, भागता मार गुलाटी ।

    रविकर का अंदाज, लगेगा झटका कर्रा ।

    बर्रा प्राकृति दर्प, बदल ना पाए ढर्रा ।।

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    बेहतरीन रचना


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