शनिवार, 23 जून 2012

विधना रूठ रहे

हिडम्ब सिंह को बचपन में ही उसके झगडालू स्वभाव के कारण संगी साथियों ने 'झगडू' नाम दे दिया था. आज तो वह ८२ साल की उम्र में हैं और नरक भोग रहे हैं, पर कहते हैं कि कभी इमारत बहुत बुलंद थी. घर, गाँव, इलाके में उनकी तूती बोलती थी.

अपने कार्यकलाप एवं बात व्यवहार में हिडम्ब सिंह ने कभी न्याय-अन्याय को नहीं परखा, जैसा मन में आया बोल दिया, और तेवर बता दिये. लोग तो भेड़ों की तरह होते हैं, डर जाते हैं. कौन उसकी दवंगाई का विरोध करके जोखिम उठाये? वैसे भी विरोध करने के लिए घर-गाँव में बचा ही कौन था? नौजवान सब बाहर पलायन कर गए थे, बूढ़े अपाहिज बचे थे, जो किसी हालत में मुकाबला करने की स्थिति में नहीं थे.

हिडम्ब सिंह डील-डौल से पूरे भीमकाय रहे हैं, माता-पिता की इकलौती संतान हैं, उनकी पिछली तीन पीढियाँ भी एक एक बेटा ही जनती आई हैं. इसलिए जमीन का बँटवारा भी नहीं हुआ, और अब वे गाँव में सबसे ज्यादा जमीन के मालिक भी हैं. २१ साल की उम्र में वे फ़ौज में भर्ती हो गए थे, वहाँ का खाना खुराक भी उनको खूब माफिक आया. १५ साल के बाद जब वे सिपाही के सिपाही ही पेन्शन लेकर गाँव लौटे तो उनके रंग-रूप और मिजाज में अलग ही तुर्सी थी. वे किसी को कुछ समझते ही नहीं थे. गाँव के छोटे-बड़े सभी पर उनका स्वाभाविक दबदबा हो गया था.

शादी तो उन्होंने फ़ौज में जाने से पहले कर ली थी, पर उनकी पत्नी कांता को हजार मिन्नतों व पूजा अर्चनाओं के बाद भी कोई संतान सुख नहीं मिला. फ़ौज से रिटायर होने के उपरान्त कान्ता की ही सलाह पर उन्होंने आन गाँव के एक गरीब की बेटी बैजंती से दूसरा विवाह भी किया लेकिन उससे भी कोई संतान पैदा नहीं हुई. यहाँ पहाड़ में जिस घर में वंश बेल न उगे उसे नठाई कहा जाता है. हिडम्ब सिंह और उसकी दोनों पत्नियों ने इसे ईश्वर की इच्छा मान कर अपने भाग्य को कोसा. परिवार नठाई ही रह गया.

संतान न होने से मनोवैज्ञानिक दुष्परिणाम ये हुआ कि हिडम्ब सिंह हर मामले में कृपण होते चले गए. बड़ी बीबी कांता की पित्त की थैली में पथरी रोग होने के कारण वह पीलियाग्रस्त हो गयी. लंबे समय तक बीमार रही, लेकिन खर्चा होने के डर से उसका ऑपरेशन तक नहीं कराया. यद्यपि पूर्व फ़ौजी होने की वजह से उनको बहुत सुविधाएँ मिल सकती थी, पर जब मनुष्य दुष्प्रवृत्तियों में उतर जाता है तो अच्छे रास्ते अपने आप बन्द होते चले जाते हैं. बेचारी कांन्ता ईलाज के अभाव में जल्दी चल बसी.

ऐसा नहीं कि उनके पास रुपयों की कमी थी, फ़ौज की पेन्शन थी, लोगों को वक्त-बेवक्त रूपये उधार देकर दादागिरी से वसूली कर लिया करते थे, पर फितरत को क्या किया जाये? आदमी जोड़ने के चक्कर में सब कुछ भूल जाता है. ये दुनिया की रीति है कि जो लोग धन को पकड़ कर कुंडली मार कर बैठे रहते हैं, एक दिन उसे बिना भोगे ही औरों के लिए छोड़ कर चले जाते हैं. कभी कभी किसी को ये बात देर में समझ में आती है. इसलिए वैजन्ती के आग्रह पर उन्होंने गाँव में भंडारा करने की ठानी. पुरोहित जी से सलाह करने के बाद सात दिनों का 'भागवत कथा सप्ताह' करने के बहाने पुन्य कमाने की बात बन गयी.

कथा-कीर्तन, पूजा-पाठ सब मन को सन्तोष करने के लिए होते हैं, इसलिए हिडम्ब सिंह को भी लगने लगा कि उसके द्वारा किये गए सभी दुष्कर्म इस आयोजन से धुल जायेंगे पर कर्मों की गति तो न्यारी है. एक दिन जब गाँव में होलिकोत्सव हो रहा था तो हिडम्ब सिंह एक बड़े कटे हुए पेड़ की तरह सबके सामने धडाम से जमीन पर बेहोश हो कर गिर पड़े. लोगों ने बड़ी मुश्किल से उनके भारी बदन को उठाया और कठिनाई के साथ डोली में लाद कर अल्मोड़ा जिला अस्पताल तक पहुंचाया. अल्मोड़ा के डाक्टरों ने देखा कि उनको ह्रदय सम्बन्धी बड़ी बीमारी है, साथ ही कमर के जोड़ों की हड्डियां भी खिसकी हुई हैं, तो उन्हें तुरन्त हल्द्वानी रेफर कर दिया. जहाँ ऑपरेशन की बात सामने आते ही हिडम्ब सिंह डर गए और चीर-फाड़ कराने से मना कर दिया. डॉक्टरों की सलाह न मानते हुए वे उसी रुग्ण अवस्था में वापस गाँव में लाये गए. कुछ लोगों ने समझाया भी कि आर्मी अस्पतालों में सब सुविधाएँ हैं, खर्चा भी नहीं होगा, पर उनकी मति पर पत्थर पड़े थे, जिद पर अड़े रहे कि ऑपरेशन नहीं कराना है. उनको चिंता हो रही थी कि अगर ऑपरेशन में मैं मर गया तो मेरी जायदाद का क्या होगा? बैजन्ती का क्या होगा?

'झगडू सिपाही' करीब आठ साल से बेबस बिस्तर पर पड़े हुए हैं, बहुत कमजोर हो गए हैं, मल-मूत्र उठाते हुए बेचारी बैजन्ती परेशान है, पर मजबूरी में अर्धांगिनी होने का अपना फर्ज निभा रही है.

वाणी की कठोरता व कटुता की वजह से पहले से ही भले लोग उनसे किनारा करते थे, अब इस लम्बी असाध्य बीमारी ने मातम-पुर्सी करने आने वालों का भी आना लगभग बन्द हो गया है. हिडम्ब सिंह भगवान से प्रार्थना करने लगे हैं कि भगवान मुझे मौत दे दे, पर भगवान भी इतना निष्ठुर बन गया है कि उनकी बात सुनता ही नहीं.
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4 टिप्‍पणियां:

  1. निर्णय लेने की क्षमता ही जीने का मार्ग खोलती है..

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    उम्दा लेखन, बेहतरीन अभिव्यक्ति


    हिडिम्बा टेकरी
    चलिए मेरे साथ



    ♥सप्ताहांत की शुभकामनाएं♥

    ब्लॉ.ललित शर्मा
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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (24-062012) को चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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