मंगलवार, 19 जून 2012

वारुणी-वर्जना

दारू ऐसी है बला-
      ठौर ठौर से खाय,
धन घटे, ऊर्जा घटे,
      पत पंचों में जाय.
घर में बसे क्लेश निरंतर,
      मन बेचैन कराय.
हीरा जनम अनमोल था,
      सुरा में दियो डुबाय.
उत्तम कहे बात पते की,
      जो ना समझे,पछताय.
          ***

9 टिप्‍पणियां:

  1. 'उत्तम' कहते हैं बात पते की,
    उदाहरन दे कर; बिना निर्देश
    समझने वाले समझ जायेंगे
    मूर्खों को कौन दे उपदेश!

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  2. very nice Uncle ji...I specially like the way you ended the poem...You do not direct people to not drink, but merely state the facts in a poetic way...Wah-wah

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  3. पी पी कर पछता रहे, रोज पियक्कड़ आज ।

    नारी धन दौलत गई, लत पर लेकिन नाज ।

    लत पर लेकिन नाज, राज की बात बताता ।

    काट लीजिये नाक, खुदा फिर साफ़ दिखाता ।

    रविकर संध्या होय, लगे इक सिर पर टिप्पी ।

    कदम बढ़ें दो सीध, बहकते फिर से पी पी ।।

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  4. फिर से चर्चा मंच पर, रविकर का उत्साह |

    साजे सुन्दर लिंक सब, बैठ ताकता राह ||

    --

    बुधवारीय चर्चा मंच

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  5. वाह.....
    बात पते की है....
    बहुत सुन्दर.

    सादर
    अनु

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  6. बात सच में बहुत पते की है पर लोग समझे तब न लत कहाँ छूटती है ...बहुत अच्छा लिखा बधाई

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