गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

बैठे ठाले


द्विज का शाब्दिक अर्थ होता है दो बार जन्म लेने वाला. सनातन धर्म की वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मणों को द्विज कहा गया है. सोलह संस्कारों में उपनयन संस्कार किये जाने के उपरान्त व्यक्ति का दूसरा जन्म होना माना गया है. मैं इन पंक्तियों की व्याख्या के औचित्य पर नहीं जाना चाहता हूँ, किन्तु सनातन धर्म की वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मण को भगवान के बाद दूसरे नम्बर का दर्जा दिया गया है. पौराणिक कथाओं में सर्वत्र ही ब्राह्मणों को पूजनीय बताया गया है.

वैसे नभचरों में सभी पक्षी, उभयचरों में सांप व मेंढक, तथा जलचरों में मछली, जो भी अंडज हैं, सच में द्विज हैं क्योंकि उनका दो बार जन्म होता है. अनेक कीड़े-मकोड़े भी द्विज की परिभाषा में आते हैं पहले के लोगों ने अपनी सहूलियत के अनुसार उनको उचित नाम दिये हैं.

ब्राह्मण शब्द की एक सर्वग्राह्य परिभाषा यह भी है कि ब्रह्मम जानोति स:ब्राह्मण: यानि जो ब्रह्मज्ञानी है वही ब्राह्मण है. चाहे वह किसी भी वर्ण या कुल में पैदा हुआ हो. सनातन धर्म में जो आदि वर्ण व्यवस्था थी उसका एक बड़ा सामाजिक व वैज्ञानिक आधार था और यह कर्म के अनुसार नियत होता था कि व्यक्ति किस वर्ण का है. एक ही पिता की सन्तानें अलग अलग वर्ण की होती थी. बाद में इसमें विकृति व कट्टरता आती गयी. कुकर्मी, दुष्ट, व नीच भी अगर ब्राह्मण कुल में जन्मा हो तो वह ब्राह्मण ही रहता था. इसी तरह क्षत्रिय व अन्य वर्णों का हाल रहा.

पौराणिक काल में जब अनेक मर्यादाएं नियत नहीं थी तो भिन्न वर्णों में विवाह होने के भी उदाहरण मिलते हैं. क्षत्रिय राजा जनक की पुत्री सीता के स्वयम्बर में ब्राह्मण लंकेश रावण भी था. मध्य काल में इतिहास बताता है कि राजा लोग ब्राह्मणों के आश्रयदाता थे और ब्राह्मण उनके पुरोहित’ यानि पूरे हितों के लिए नियुक्त रहते थे. सनातनी लोग धर्मभीरू भी थे, इसलिए जन्म से मृत्यु तक ब्राह्मणों द्वारा ही शुभाशुभ कार्य हुआ करते थे. ये विषय बहुत लंबा है, विस्तृत है, परन्तु भारत देश के हर क्षेत्र में किसी न किसी रूप में धर्म की ये एकरूपता बनी रही है.

सामाजिक मान्यताओं के अनुसार ब्राह्मण ज्ञानी, सदाचारी व सात्विक होना चाहिए पर अब ये अपवाद बन गए है. कर्मकांड करना भी एक धन्धा बन गया है, विचारों की शुद्धता व परमार्थ भावना गौण हो गयी है. ईर्षा, द्वेष, व अहंकार जैसे दुर्गुण सर्वत्र समाज में भी आम बात हो गयी है. देश काल व परिस्थितियों के अनुसार सभी लोग कलयुगी हो गए हैं. गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस के उत्तर कांड में कलयुगी चरित्र को बहुत सुन्दर ढंग से चित्रित किया है. कि कलिकाल में सभी लोग अपने धर्म व कर्म से च्युत हो जायेंगे और ईर्षा-द्वेष से ग्रस्त रहेंगे. इसी सदर्भ में हवलदार किसनसिंह ने एक आपबीती घटना हमें सुनाई थी कि दो प्रबुद्ध ब्रह्मज्ञ ब्राह्मण किस तरह से व्यवहार करते हैं. उनकी कहानी निम्न है.

धुरफाट, बिनसर की पर्वत माला पर दुर्गम स्थान पर बसा हुआ एक छोटा सा गाँव है, जहाँ गरीब लोगों के १५-२० घर हैं. पिछले पंचायत के चुनाव में गांव वालों ने हवलदार किसनसिंह को निर्वोरोध सभापति बना दिया था. किसनसिंह एक सुलझा हुआ व्यक्ति है. उसका घर व रहन-सहन अन्य ग्रामीणों से बेहतर है. पेंशन पाता है. सब तरह से सुखी है. एक दिन शाम के वक्त आँन गाँव से पंडित दुर्गादत्त शास्त्री उसके घर आ गए और उन्होंने रात्रि विश्राम वहीं करने की अपनी इच्छा जताई तो किसनसिंह खुश हो गया और अपनी पत्नी से पंडित जी के लिए खीर, पूड़ी और हलवा के पकवान बनाने को कह दिया. वह अपना अहोभाग्य समझ रहा था कि पंडित जी के आने से उसका गरीबखाना पवित्र हो गया है. संयोगवश थोड़ी देर में पंडित जीवानंद जी भी कहीं से घुमते-घामते वहीं आ गए. अब दो विद्वान ब्राह्मण उसके घर मेहमान हो गए. दूध में आटा मल कर पूडियां बनी, घर के शुद्ध घी में हलवा बना औए मलाईदार खीर बनी. किसनसिंह को ये मालूम नहीं था कि दोनों पंडितों के बीच कोई मन मुटाव व द्वेषभाव भी है. वह तो एक श्रद्धालु यजमान की तरह उनकी सेवा में तत्पर था.

भोजन तैयार हुआ तो किसनसिंह पानी की बाल्टी-लोटा लेकर आँगन के भीडे पर पंडित दुर्गादत्त को हाथ-पैर धुलवाने के लिए ले गया तो दुर्गादत्त जी ने अनायास ही कह डाला, इस बैल (पंडित जीवानंद) को भी आज के ही दिन तुम्हारे घर आना था?

किसनसिंह को बड़ा आश्चर्य हुआ कि पंडित दुर्गादत्त अपने बराबर के दूसरे पंडित को बैल बता रहे हैं. किसनसिंह ने कहा मैंने तो किसी को बुलाया नहीं है, जैसे आप पधारे वैसे ही वे भी आ गये.

इसके बाद जब वह पंडित जीवानंद के हाथ-पैर धुलवाने लगा तो उसको एक शरारत सूझी उसने जीवानंद जी को बताया कि दुर्गादत्त जी आपको बैल बता रहे हैं. इस पर जीवानंद जी आक्रोषित स्वर में बोले, अगर मैं बैल हूँ तो वह भी भैंसा है.

मामला गंभीर हो गया, जब दोनों ब्राह्मण भोजन के लिए चौकी पर बैठे तो किसन सिंह ने खीर- पूड़ी के बजाय थाली में हरी-हरी घास परोस कर सामने रख दी. और कहा आप दोनों ही विद्वान पुरुष हैं एक दूसरे को खूब पहचानते हैं. बैल और भैंसे का भोजन आपको पेश है. इस प्रकरण के बाद दोनों ही ब्राह्मण बिना भोजन पाए उठ कर चले गए.

इस प्रकार की ईर्षा-द्वेष की भावना निर्मल मन में नहीं होनी चाहिये. पर ये तो चाहिए वाली बात है. यहाँ ये बात प्रासंगिक लगती है कि सतयुग में भी देवर्षि वशिष्ठ के यश व प्रतिष्ठा को देख कर राजर्षि विश्वामित्र को बहुत ईर्षा हुई थी, पर वह तो पौराणिक बातें हैं.
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बुधवार, 14 दिसंबर 2011

भूत विसर्जन


उत्तरांचल को देवभूमि भी कहा गया है. देव भूमि इसलिए कि इस प्रदेश में मंदिरों के रूप में अनेक आस्था के केन्द्र स्थापित हैं. इसी के पूर्वी भाग में कूर्मांचल है और कूर्मांचल में एक खास इलाका है, जिसे नाग देश भी कहा जाता है. अनेक नाग देवताओं के मंदिर भी यहाँ हैं. नाग देवताओं के अलावा अनेक ग्राम देवताओं की भी स्थापना ईष्ट देवों के रूप में स्थान स्थान पर की गयी है. देवताओं में कई यक्ष-गंधर्वों के अलावा नौलिंग देवता, भोलानाथ देवता (शंकर महादेव नहीं,) भोलानाथ के भान्जे गोलू देवता, नेपाल से आये हुए गंगनाथ देव और अनेकानेक कल्याणकारी महापुरुष देवता के रूप में जगह जगह स्थापित हैं, जिन पर स्थानीय लोगों की जबरदस्त आस्था व विश्वास है. दु:ख-सुख में सभी लोग अन्ध भक्त हो कर इन्हीं के प्रति समर्पित भाव से पूजा पाठ करते रहते हैं.

बीमार होने पर या किसी भी विपत्ति के आने पर सबसे पहले देवता के द्वार पर ही हाथ जोड़े जाते हैं, और जोत जलाई जाती है. अशिक्षा व अज्ञानता के कारण पहले के लोग भी देवताओं के डंगरिये, जगरिये व पुछियारों के माध्यम से जागर पूजा अनुष्ठान करते थे. बहुत जगह तो आज भी ये परम्परा जीवित है.

कांडा और चौकोडी के बीच एक ब्राह्मणों का गाँव है, पचार, जहाँ कर्मकांडी वृति वाले पांडे लोगों की बिरादरी ज्यादा थी वे लोग पौराणिक आस्थाओं-व्यवस्थाओं के अधीन अन्ध विश्वासी संस्कारों से त्रस्त भी थे. यद्यपि कांडा नजदीक में था जो कि पिछली सदी के दूसरे दशक से ही शिक्षा का केन्द्र रहा और गाँव के अनेक लोग पढ़ लिख कर देश-विदेश तक में नौकरी करने भी पहुंच गए. बहुत से लोग नए जमाने की हवा के साथ पलायन करके नैनीताल जिले के मैदानी इलाकों में बस गए, लेकिन आस्था व भय का दौर ऐसा है कि वर्तमान पीढ़ी भी साल में एक बार ग्राम देवता की पूजा के लिए पुश्तैनी गाँव आकर देवताओं का आशीर्वाद अवश्य लेती है.

अन्ध विश्वासों के कारण कुछ विकृतिया भी आती गयी जैसे कोई बीमार हो जाये तो पुछ्यार बता दें कि अमुक मृत व्यक्ति या कई पीढ़ी पहले के पितरों की अतृप्त आत्मा इसके पीछे है तो उसके नाम का थान (खड़े पत्थरों का एक छोटा सा मंदिर) स्थापित करके पूजा अर्चना की जाने लगी. एक दौर ऐसा भी आ गया कि गाँव में परेशान करने वाली मृतात्माओं/भूतों के २०-२५ थान बन गए.

पंडित हरिदत्त व शिवदत्त दोनों भाई अपने परिवार पर आई हुई दुरात्माओं की छाया से बहुत दु:खी थे. कभी कोई बीमार तो कभी कोई बीमार रहता था. भैंस ब्याई, पर दूध नहीं दे रही थी. थोरी मर गयी थी. एक बैल जंगल में फिसल कर दम तोड़ चुका था. पुछियार ने बताया कि ये सब दादा-परदादा की अतृप्त आत्माओं की करामात है. अत: जागर लगा कर उनका आह्वान किया गया तदनुसार उनका थान स्थापित किया गया, पूजा की गयी लेकिन पारिवारिक परेशानियां कम नहीं हुई. ग्राम पंचायत में इस मुद्दे पर भी विचार हुआ कि गाँव पर आई विपत्तियों के निराकरण के लिए क्या किया जाये?

ग्राम सेवक गोपालदत्त, जो गरुड़-बैजनाथ के निकट किसी गाँव का रहने वाला था, ने बताया कि भेटा (कौसानी के निकट) गाँव के पंडित गोविन्द बल्लभ लोहनी ऐसे मामलों में स्थाई समाधान करने में माहिर हैं तो दो आदमी भेजकर उनको सादर बुलावाया गया.

लोहनी जी मनोविज्ञान के प्राध्यापक रहे थे. रिटायरमेंट के बाद वे लोगों के इस तरह की समस्याओं का निराकरण करने में लगे थे. पूरे इलाके में उनकी इस प्रतिभा व ज्ञान की चर्चाए होने लगी थी. वे कोई फीस भी नहीं लेते थे इसलिए लोगों में उनके प्रति श्रद्धाभाव भी था.

लोहनी जी ने पचार गाँव आकर सारी दास्तान सुनी, जगह जगह भूत-प्रेतों के थान बने हुए देखे. उनको ये देख कर दु:ख और आश्चर्य हुआ कि इस वैज्ञानिक युग में पढ़े लिखे लोगों में भी इस कदर अन्धविश्वास घर किया हुआ है. उन्होंने उनकी मूल बीमारी को समझ लिया. सारे ग्राम वासियों से एक विशेष पूजा करवाई गयी. जिन जिन भूत/प्रेत्माओं के थान बने थे उन सबके पुतले बनाए गए. सब पुतलों को एक साथ बागेश्वर के सरयू-गोमती के संगम पर लाकर जल में विसर्जित कर दिया गया. थानों के सब पत्थर हटा दिये गए.

पचार के ही एक पंडित जी बताते हैं कि तब से गाँव में कोई भूत-पिचास/प्रेतात्मा पूजन नहीं होता है. लोग भय मुक्त हो गए है.
(ये विवरण सत्य आधारित है,व्यक्तियों के नाम काल्पनिक हैं.)
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मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

निर्मोही?

मेरे पिताश्री की अलमारी में अनेक बड़ी बड़ी पुस्तकें व ग्रन्थ थे. मैं जब छोटा था और कुछ हिन्दी पढ़ने व समझने लगा तो इन पुस्तकों में छपे हुए रंगीन चित्र बहुत अच्छे लगते थे, खासतौर पर शुक सागररामचरित मानस में हर अध्याय पर पौराणिक कथाओं से संबद्ध चित्र होते थे. तब मैं कोई श्रद्धाभाव या धार्मिक भावना से इनको नहीं देखता था, ना ही तब मुझमें इतनी समझ थी कि उन पर कोई सोच विचार करूं. लेकिन एक पुस्तक जिसने मुझ पर असर डाला था वह थी, ज्ञान बैराग्य प्रकाश, वह मुझे बहुत जीर्ण अवस्था में मिली. उसके प्रकाशक गीता प्रेस गोरखपुर थी या श्रीकृष्ण प्रकाशन बम्बई मुझे याद नहीं है. सरल भाषा में दोहों के साथ साथ अनेक कहानियां/दृष्टांन्त इसमें थी.

एक कहानी निर्मोही राजा की भी थी. उसके परिवार के सभी लोग निर्विकार व निर्मोही थे. मुझे अब हल्की सी याद है उस राजा का लड़का यानि राजकुमार आखेट के लिए दूर जंगलों में जाता है, जहाँ एक साधू-सन्यासी के आश्रम में पहुँच जाता है और अपना परिचय देता है कि वह निर्मोही राजा का बेटा है’. सन्यासी को बड़ा आश्चर्य हुआ कि राजा तथा निर्मोही दोनों विशेषण एक ही व्यक्ति के कैसे हो सकते हैं? अस्तु जाँच करने के लिए वह राजपुत्र को आश्रम में ही ठहरा कर उसके राज्य में राजमहल तक पहुँचा. सबसे पहले द्वारपाल से मुलाकात हुई उसको बताया कि राजकुमार को उसके सामने ही शेर ने खा लिया है. उसके बाद महारानी को यही बात बताई तथा राजा को जाकर भी यही संदेश दिया तो सभी की प्रतिक्रया यही थी कि राजकुमार की शायद इतनी ही आयु दी गयी होगी, इसमें परेशान होने वाली कोई बात नहीं है, यह सँसार व सभी प्राणियों के शरीर नश्वर ही होते हैं. सन्यासी को उन सबकी बातें सुन कर विश्वास हो गया कि गृहस्थी हो कर भी राजा और उसके आसपास के लोग निर्मोही थे. जो सुख-दु:खे समेकृत्वा, लाभालाभो जयाजये के आदर्श भाव से जी रहे थे.

आज, पैंसठ-सत्तर साल के बाद मुझे पंडित दीनानाथ जी से एक आध्यात्मिक गोष्ठी में मुलाक़ात हुई तो उन्होंने इसी विषय पर लगातार कई दिनों तक प्रवचन किये. बहुत से लोगों को ये बोरिंग लग रहा था क्योंकि आज के भौतिक युग में लोग संपत्ति जोड़ने के लिए दिन-रात प्रयत्नशील रहते हैं. ऐसे में धन-संपत्ति व परिवार से उदासीन रहने का उपदेश पच नहीं रहा था. पर मुझे उनके प्रवचनों ने अपने अतीत में झांकने का एक आनंदपूर्ण अवसर मिला. जब पंडित जी से घनिष्ठता हुई तो मैं उनको उसी निर्मोही राजा के रूप में देख रहा था जिसकी मूरत मेरी जहन में बाल्यकाल से बिराजी हुई थी.

संयोग कुछ ऐसा हुआ कि पंडित दीनानाथ जी ने मेरी बस्ती में एक जमीन का बड़ा रिहायसी प्लाट खरीद लिया और उस पर विधिवत मकान बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी. दौलत के मामले में पंडित जी बड़े सौभाग्यशाली थे. उनकी बातों से लगता था कि उनके पास खूब धन-संपत्ति है. उन्होंने एक बड़े नामी आर्किटेक्ट+बिल्डर को ये मकान बनाने का ठेका दे दिया.

पंडित जी के आसपास मंडराने वाले हम सभी लोग, उनके बस्ती में ही आवास बनवाने से अभिभूत थे, खुश थे. पंडित जी नित्यप्रति मकान की प्रगति के बारे में अपना उल्लासपूर्ण वक्तव्य हम लोगों को सुनाया करते थे. सबसे बढ़िया क्वालिटी की महंगी ईटें बाँस बरेली से मगवाई गयी थी. चौखटों व अलमारियों के लिए सागवान की लकड़ी बिजनौर से, अखरोट की लकड़ी सीधे जम्मू से, तुन की लाल लकड़ी बागेश्वर से, ह्वाईट सीमेंट बिरला वाला, साधारण क्वालिटी सीमेंट ए.सी.सी. होलसिम से, संगेमरमर के पत्थर मकराना राजस्थान से, और इटैलियन फर्नीचर पंचकुइया रोड नई दिल्ली से आ रहा था. सजावटी सामान बढ़िया नाम व ऊंचे दाम तथा प्रसिद्ध मार्का, जो हमने कभी सुने भी नहीं थे, प्रोसेस में थे. हम सुनने वालों को ईर्ष्या तो नहीं होती थी, पर वैराग्य और निर्मोह का प्रवचन करने वाले पंडित जी के मुँह से ये बखान अजीब सा लगता था. वे कुछ ज्यादा ही मोहित थे. मुझे भी उनकी कथनी और करनी में काफी विरोधाभास लगने लगा था.

जब वे मकान को घर में तब्दील करने की तैयारी कर रहे थे, तब गृहप्रवेश के लिए आयोजन व व्यवस्था की बात हो रही थी तो एक रात को पंडित जी को ब्रेन स्ट्रोक हो गया उनको तुरन्त ICU में भर्ती होना पड़ा. डाक्टरों का कहना था कि ब्लड प्रेशर बढ़ने से दिमाग की कोई नस फट गयी है. बहुत दिनों तक अस्पताल में रहे, जान तो फिलहाल बच गयी, पर पंडित जी के पूरे दाहिने अंग में लकवा पड़ गया और वे चलने-फिरने तथा बोलने से लाचार हो गए. गृह प्रवेश नहीं हो पाया. वे अब इशारों से अपनी अभिव्यक्ति करते हैं कि उनको उस मकान से कोई मोह नहीं रहा है.
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सोमवार, 12 दिसंबर 2011

छप्पर फाड़ के


सोनी टी.वी. पर कौन बनेगा करोड़पति के एपीसोड देखकर मुझे भी लगता था कि काश! मैं भी हॉट सीट तक पहुँच पाता. फिर तो मैं एक करोड़ की रकम जीत कर ही लौटता क्योंकि जो प्रश्न पूछे जाते हैं वे अधिकाँश मुझे आते हैं. मेरा छोटा पोता कहता था कि दादा जी आपको वहाँ पहुँचने के लिए ट्राई करना चाहिए. पर मैं जाऊं कैसे? कोई करिश्माई करामात हो जाये तो ही मैं मंजिल पा सकता हूँ. इस बार तो खैर, मैं ज्यादा समय विदेश में रहा पर पिछले हर बार मैं रोज ही SMS करके इन्तजार ही करता रह गया था. रूपये कमाने का लालच तो था ही. टी.वी. पर आकर सभी मित्रों-अमित्रों को अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाना भी मेरी मंशा रही है. अफ़सोस इस बात का रहा कि सोनी वाले मेरे जैसे उमरदार लोगों को बुलाने से डरते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि अनुभव का कोई शार्टकट नहीं होता है. बूढ़े तो जानवर भी ज्ञानी हो जाते हैं.

धन, भगवान तो नहीं है, पर इससे बहुत सी नियामतें खरीदी जा सकती हैं. ये सांसारिक खेल-व्यापार धन को केन्द्र बना कर ही चल रहे हैं. खूब दौलत जमा हो जाये फिर भी मन कभी नहीं भरता है. दुनिया के ज्यादातर झगड़े-लफड़े, मार-काट के पीछे धन ही तो है जो सब करवा रहा है. रमता जोगी भी सुखी नहीं है. पेट भरने के लिए उसको भी किसी न किसी रूप में धन चाहिए होता है.

मैं जब कड़की में जी रहा था तो सोचता था कि अलादीन के चिराग की तरह कोई जादू की छड़ी मुझे भी मिल जाए तो पौ बारह हो जाएँ. मैं अकसर दिवास्वप्न देखा करता था कि ऐसा दैवीय वरदान प्राप्त हो जाये कि इच्छा करने पर शहर भर के बैंकों व सेठों की तिजोरियों में रखे गए करेन्सी नोट वहाँ से सरक आयें और आसमान के रास्ते कबूतरों की तरह उड़ कर मेरे घर की चौड़ी छत पर बरस जाएँ. मैं उन तमाम नोटों को लोहे के बक्सों में या ड्रमों में सहेजता जाऊं. कभी कभी यों भी मन में आता रहा कि नोटों के अलावा सोने के बिस्किट भी जमा हो जाये तो मजा आ जाये. उसके बाद मैं क्या क्या कर लेता? अनेक तरह की योजनाओं पर जाकर स्वप्न समाप्त होता था. वैसे ऊपर वाले ने दो टाइम घी में चुपड़ी दाल-रोटी का इन्तजाम मेरे लिए कर ही रखा है. पर इंसान का मन है ये सोचता ही रहता है कि कहीं से छप्पर फाड़ के दौलत आ जाये और ऐश की जाये. मृगतृष्णा कभी खतम नहीं होती है.

ये तो मेरे मन की बात है पर मैं आपको एक सत्यकथा से रूबरू कराता हूँ जो कि मेरे एक मित्र परमानन्द जी (रिटायर्ड पोस्ट मास्टर) ने मुझे सुनाई है.

सन १९६०-६१ में बिजली विभाग में पेट्रोल-मैन (तार खीचने वाला श्रमिक) भवान सिंह को जब यह सूचना दी गयी कि उसको पोस्ट आफिस की लाटरी में एक लाख रुपयों का इनाम लिकला है तो उसने उसे अपने साथियों का मजाक समझा. लेकिन जब खुद पोस्ट मास्टर ने आकर उसको बताया तो उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था. एक लाख रूपये उन दिनों बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी.

भवान सिंह प्राइमरी तक ही पढ़ा था और बिजली विभाग में सबसे निम्न श्रेणी का कर्मचारी था. नैनीताल् जिले के किसी गाँव से दूर बागेश्वर कस्बे में उसको काम पर लगाया गया था. पिछले आठ महीनों में वेतन से बचत करके सुरक्षा की दृष्टि से दो सौ रूपये, बचत खाता खोल कर पोस्ट आफिस में रख दिये ताकि अपने गाँव जाते समय निकाल कर ले जा सके. उसको ये पता भी नहीं था कि बचत खाते पर पोस्ट आफिस ने कोई ईनामी योजना भी निकाली है.

पोस्ट मास्टर जनरल की तरफ से ६ माह पूर्व उन सभी खातेदारों के नाम मांगे गए थे जिनके बचत खाते में कम से कम २०० रुपये जमा थे. ये स्कीम बचत खातों में रूपये जमा रखने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए निकाली गयी थी. लाटरी का जो भी तरीका रहा होगा बहरहाल भवान सिंह के नाम एक लाख रुपयों का ईनाम घोषित हो गया. ये सूचना टेलीग्राफ द्वारा जब बागेश्वर आई तो जाँच करने पर पाया कि भवान सिंह ने तो अपना पूरा रुपया दो महीने पहले निकाल कर खाता बंद कर लिया था. पोस्ट मास्टर जनरल को यथास्थिति की जानकारी दी गयी तो उनका जवाब आया कि चूंकि उस निर्धारित तिथि को भवान सिंह के खाते में २०० रूपये थे इसलिए वह ईनाम का हकदार है, अतः उसे ढूंढा जाये और ईनाम की राशि का चेक समारोह करके सौंपा जाये.

जब भवान सिंह की तलाश की गयी तो वहाँ पेट्रोल मैन के रूप में दो व्यक्तियों का नाम भवान सिंह निकला. खैर पूछताछ करके असली भवान सिंह को समारोह में बुलाया गया, जिसमें पोस्ट आफिस के कारिन्दों के अलावा बिजली बिभाग के कर्मचारी और कुछ सामान्य नागरिक भी शामिल हुए. उन दिनों दूर दूर तक कोई बैंक नहीं था, न इस बारे में ज्यादा जानकारी ही थी. भवानसिंह के सामने ये समस्या आ गयी कि अब उस चेक का क्या किया जाये?
पोस्ट मास्टर की सलाह पर फिर से नया खाता खोल कर चेक पोस्ट आफिस में ही जमा कर दिया गया. मजेदार बात ये थी कि उन दिनों सिर्फ दो रुपयों से खाता खोला जा सकता था.

भवान सिंह का यह दृष्टांत पोस्टल डिपार्टमेंट की ईमानदार कार्य प्रणाली व चरित्र का उदाहरण है. भवान सिंह को तो ऊपर वाले ने ये रूपये छप्पर फाड़ कर दिये थे और उसे रातों रात सेलेब्रिटी बना दिया था. मैं सोचता हूँ कि मेरे साथ भी ऐसी ही करामात हो जाती तो सत्य नारायण भगवान की कथा अवश्य करवाता. अलबत्ता इसी उम्मीद में मैंने पोस्ट आफिस में बचत खाता खोल कर एक हजार रूपये रख छोड़े हैं.
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शनिवार, 10 दिसंबर 2011

मैं दिल्ली का लाट हूँ


जनता  का  सिपाही हूँ, बातों  का  सम्राट  हूँ
मैले बिस्तर पलट दिये पर वही पुरानी खाट हूँ.

बामन भी हूँ, बनिया भी हूँ, कोई कह ले जाट हूँ
बहुरूपी, समदर्शी  कह  लो, भाई मैं तो भाट  हूँ.

सबके  गंदे  कपड़े  आते, मैं  वह  धोबीघाट हूँ
दारूबंदी  की  बोतल  का, मैं  अनमोल डाट हूँ.

नए पुराने चावल मिल गए, मैं वह गीला भात हूँ
चीनी अमेरिकी माल मिलेगा मैं वह देसी हाट हूँ.

माल  चरपरा  दस्तावर भी, बहुरंगी  मैं चाट  हूँ
हर गरीब जो  पहन  सकेगा, प्यारा कपड़ा टाट हूँ.

समाजवादी  पूंजीपति  हूँ, गांधीवादी  ठाट  हूँ 
श्वेत/बिरंगी टोपी  के  नीचे  खद्दर-टाई नाट हूँ.

बरसाती  नाले  से  उभरी,  नई-नवेली  पाट  हूँ
थूक से जिसको चिपका रखा, मैं कागज़ की फाट हूँ.

मन चाहे जो भोजन परसो, मैं इमली का पात हूँ
आयोगों की फसल उगाता मैं दिल्ली का लाट हूँ.
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