शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

दु:ख होता है


बम गिर जाये भीड़ पर
सब खो जाएँ दु:ख होता है.
       वज्र गिर जाये चीड़ पर
       वन जल जाएँ दु:ख होता है.

देखा नहीं हो अपनी जाया तक को जिसने,
आहट पर ही मुँह खोल हिलाते हों गर्दन को
पक्षी-शिशुओं के अनजाने में-
कितना निष्ठुर प्रहार नियति का-
यदि घुन लग जाये नीड़ पर
बहुत दु:ख होता है.
         *** 

2 टिप्‍पणियां:

  1. गहरे भाव युक्ता कविता .-- आभार.

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  2. Bhaavo se saraabor maarmik rachna..
    Shubhkaamnaein..

    kabhi samay mile to mere blog par bhi aaiyega..

    palchhin-aditya.blogspot.com

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