रविवार, 1 जनवरी 2012

बूबू


हम बंगाली लोग नाना को भी दादू कहते हैं और दादा को भी दादू ही पुकारते हैं. यहाँ कुमायूं में नाना-दादा को बूबू कहा जाता है. यों किसी भी बुजुर्ग को बूबू कहना सम्मानसूचक होता है.

मैंने अपने सगे दादू को कभी नहीं देखा. मेरे बाबा बताते हैं कि सन १९७१ में बांग्लादेश छोडने के बाद वे हमेशा ही बीमार रहे और अपने सोनार देश को याद करते करते चल बसे थे. मुझे तो उनकी तमाम बातें अब रामायण-महाभारत की सी कहानी लगती है, क्योंकि मेरा जन्म तो २१वीं सदी में उत्तराखंड के रुद्रपुर शहर के पास बंगाली बस्ती में हुआ और मैंने अपने पहले सूरज को भारत की धरती पर ही देखा, हाँ अलबत्ता मेरे बाबा अपने बचपन की बातें बताते हुए बहुत भावुक हो जाते हैं क्योंकि उनको अन्य हिन्दू परिवारों के साथ खुलना जिले के बागेरहाट से भाग कर जान बचाते हुए भारत आना पड़ा. बाबा ये भी बताते हैं कि बागेरहाट रुपसा नदी के सुरम्य तट पर बसा हुआ कस्बा है, बहुत सुन्दर दृश्यावलियों वाली जगह है. हमारे खेत होते थे, आम, केले, नारियल, चीकू आदि फलों के पेड़ होते थे, अंगूर की खेती होती थी और नदी में बहुत सी रोहू मछली भी मिलती थी. चूंकि मैंने वह कभी देखा नहीं इसलिए मुझे मलाल नहीं होता है पर मेरे बाबा तो याद करते रहते हैं. क्यों ना करे, उसका तो इस पालायन में सब कुछ पीछे छूट गया, वह एक काश्तकार से मजदूर जो बन गए थे.

रुद्रपुर में ऐसे ५०-६० घर थे जो पाकिस्तानियों के अत्याचार सहन कर यहाँ ए बी सी ही से अपनी जिंदगी शुरू करके जी रहे थे. ये तो अच्छा हुआ यहाँ की सरकार ने सबको शरण दी और भोजन कपडे देकर ज़िंदा रहने के आधार दिये. कई सालों तक तो उन झोपड़ पट्टियों में रह कर निरुदेश्य जी रहे थे पर अब यहाँ के समाज में सभी बंगाली आत्मसात हो गए हैं. नागरिक अधिकार भी मिल गए हैं. पर पेट भरने के लिए मेहनत-मजदूरी तो करनी ही पड़ती है. यहाँ तराई भाबर में खेती-बाडी का बहुत काम मिलता है. अब तो सिडकुल में सैकड़ों कारखाने लगने के बाद सबकी गाड़ियों को पटरी मिल गयी है. हम बंगाली बच्चे स्कूल जाने लग गए थे. मैं अभी दसवीं में पढता हूँ.

मेरे बाबा मेसन का काम करते हैं. यहाँ हल्द्वानी में चारों तरफ मकान बनते रहते हैं. मेरे बाबा मुझे और मेरी माँ को लेकर बूबू के मकान के आहाते में बने किराए के कमरों में पिछले आठ सालों से रहते आये हैं. बूबू बताते थे कि पहले उन्होंने यहाँ एक मुर्गीखाना बनाया था. बूबू कभी कभी अपने बच्चों के पास चले जाते थे. अक्सर यहाँ अकेले रहते थे. अब बूबू काफी बूढ़े हो चले थे इसलिए बूबू को हमारी और हमको बूबू के आश्रय की हमेशा जरूरत रहती थी. बूबू ने एक खाना बनाने वाली भी रखी थी जो सुबह-शाम आती थी. वह हमको डांटती रहती थी. मुझे उससे डर लगता था लेकिन बूबू तो मुझे बहुत प्यार करते थे. मेरा नाम विमलेन्दु राय है पर बूबू तो मुझे विमल कह कर ही बुलाते थे.

बूबू के साथ मुझे बहुत अच्छा लगता था वे पहले पहले तो लाठी टेक कर या रिक्शा बुलाकर बाजार तक जाते थे तो मेरे लिए चाकलेट, टॉफी, बिस्कुट या केला लाना नहीं भूलते थे. पर जब से बूबू की नजर ज्यादा कमजोर हो गयी वे मुझे या मेरे बाबा को बाजार का काम बताने लगे थे. बूबू को भुक्कंनलाल हलवाई की दुकान की जलेबी औए समोसे बहुत पसंद थे, वे अक्सर दही के साथ ये चीजें मंगवाया करते थे. मुझे भी उसमे हिस्सा मिलता था. खाना खाते समय भी कई बार बूबू मुझे बुला लेते थे. उनके द्वारा दिया गया भोजन मुझे अत्यंत प्रिय लगता था.

बूबू बताते रहते थे कि उनके कुछ बच्चे सात समुन्दर पार रहते हैं. बूबू के पास फोटो की एल्बम भी थी. वे मुझे अपनी व अपने परिवार की फोटो दिखाते रहते थे, कहते थे कि दुनिया बहुत बड़ी है. बूबू ने जवानी में आर्मी में भी काम किया था और अनेक देश देखे थे. वे हवाई जहाज़ों में भी खूब सैर कर चुके थे. मैं बूबू के साथ बैठ कर उनके टीवी पर सिनेमा देखा करता था, बूबू तो अक्सर सो जाया करते थे, मुझे ही टीवी बंद करना पडता था. बूबू की नजर कम हो गयी तो मैं ही बूबू के टेलीफोन नम्बर मिलाकर उनको देता था. बूबू मेरे स्कूल से आने का इन्तजार करते मिलते थे.

बूबू पेपर वाले से बच्चों के मैग्जीन  चम्पक व नंदन जरूर लेते थे और खुद उन कहानियों को बार-बार पढ़ते थे, मुझे भी सुनाते थे.

बूबू के बाग में दस पेड़ आम के और पाँच पेड़ लीची के थे. ये पेड़ बूबू ने खुद अपने हाथों से लगाये थे. गर्मियों में जब उनके फल पकते थे तो बहुत से लोग लेने आ पहुंचते थे. मेरे बाबा कहते है कि इतने आम तो उन्होंने बागेरहाट में भी नहीं खाए थे. बूबू बहुत सारी दवाइयां भी खाते रहते थे, मुझे उनकी दवाएं छांट कर देने का काम भी करना पड़ता था. बूबू घर के सामने आने जाने वाले सभी पर नजर रखते थे पर कोई भिखारी बूबू के घर से खाली हाथ नहीं जाता था, वे मेरे हाथों से ही सिक्के या आटा दिलवाया करते थे.

उस दिन स्वतन्त्रता दिवस था, स्कूल में झंडारोहण व खेल कूद थे. मैं जब घर लौटा तो लोगों की भीड़ जमा थी, सब तरफ खामोशी थी, मुझे मालूम हुआ कि बूबू अब इस सँसार में नहीं रहे, सुबह तो वे मेरठ जाने की बात कह रहे थे. अचानक स्वर्ग चले गए. उस रात मैं सो नहीं सका, बाहर भीषण वर्षा होती रही थी. सुबह बूबू का एक लड़के के आने के बाद उनको रानी बाग, चित्रशिला घाट अन्तिम संस्कार के लिए ले गए. मेरे बाबा भी गए थे. मैंने उस दिन खाना भी नहीं खाया.

कुछ दिनों तक घर में भीड़-भाड़ रही उसके बाद सभी चले गए थे. ये अब तीन साल पुरानी बात हो गयी है. मैं अकेले उनको याद कर के रोता हूँ. बूबू का कुत्ता शेरू जानता है कि उनकी याद में मैं बहुत उदास हूँ. वह टुकुर टुकुर मेरे चहरे पर देख कर मन के भाव पढ़ने की कोशिश करता है लेकिन मैं जानता हूँ कि शेरू भी उनकी राह ताकता रहता है. आज भी ना जाने मुझे ऐसा क्यों लगता है कि बूबू यही कहीं हमारे आस पास ही हैं.
                                         ***

3 टिप्‍पणियां:

  1. फिर एक सुन्दर व रोचक कहानी, लिखते रहिए, हम पड़ते रहेंगे.

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  2. नव बर्ष '2012' की सारी- शुभ कामनाएँ .

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  3. क्षमा चाहता हूँ,ये कहानी मुझे कुछ देर से समझ आई है. पुन: आभार.

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