बुधवार, 25 जनवरी 2012

खुन्नस


कौन नहीं चाहता है कि व्यवस्था से भ्रष्टाचार ख़त्म हो? हम सब चाहते हैं, लेकिन जब हमारा अपना स्वार्थ होता है तो सारा आचार-विचार बदल जाता है क्योंकि नियम-उपदेश सब दूसरों के लिए होते हैं.

देश में इतना हल्ला-हुल्लड, आन्दोलन व थूका-पच्ची भ्रष्टाचार के खिलाफ हो रहा है फिर भी बेईमान लोग रिश्वत लेने से बाज नहीं आ रहे हैं क्योंकि आम आदमी रिश्वत देने को मजबूर है. पानी का कनेक्शन लेना हो, बिजली का कनेक्शन लेना हो, मकान का नक्शा पास कराना हो, ड्राइविंग लाइसेंस बनवाना हो, लाइसेंस रिन्यू करवाना हो, गाड़ी का ट्रांसफर एन.ओ.सी. बनवाना हो, पासपोर्ट बनवाना हो, भू-खंड की रजिस्ट्री करवानी हो, या इस तरह का कोई आवश्यक व्यक्तिगत कार्य सरकारी कार्यालय में करवाना हो तो बिना सुविधा शुल्क के कराना दु:स्वप्न है. कहने को सिद्धांत बहुत हैं पर जब खुद पर आ पड़ती है तब मालूम पड़ती है कि बिचोलिये-दलाल सब जगह उपलब्ध रहते हैं जो हर गलत-सही काम को सुविधा शुल्क लेकर आसान करवा देते हैं. होने को कानूनी मशीनरी है जो इस भ्रष्टाचार को पकड़ सकती है पर इसकी प्रक्रिया बहुत कठिन है, लम्बी है, लोग उलझ जाने से भी डरते हैं.

देश के बड़े सौदे व ठेकों का जो इतिहास उजागर होता रहा है, वह हमारा शर्मनाक पहलू है, जिससे आज हम बड़े भ्रष्ट देश के रूप में दुनिया भर में बदनाम हैं.

अन्ना जी ने लोगों की सही नब्ज पकड़ी और इस तरह के अनेक छोटे-बड़े आन्दोलन करके नाम कमाते रहे हैं. उनकी खुद्दारी पर अंगुली उठाना सूरज की तरफ थूकने के सामान है, पर उनकी आड़ में जो शिकार खेले जा रहे हैं उनसे वे भी बेखबर नहीं होंगे. परिस्थितियाँ इस तरह बन गयी हैं कि चाहते हुए भी उस मकड़जाल से अन्ना नहीं निकल पा रहे हैं. उनके पीछे जो अपार जन समर्थन है वह भी झूठा नहीं है पर जो राजनैतिक खेल दूसरे लोग खेल रहे हैं, उससे ये अच्छी तरह महसूस हो रहा है कि अन्ना जी को मोहरा बना कर अपनी-अपनी खुन्नस निकाली जा रही है. इसमें सबसे बड़े खिलाड़ी हैं, अरविन्द केजरीवाल, जो सारे चक्रव्यूह के रचनाकार हैं. मैं नहीं कहता कि वे प्रत्यक्ष रूप से भारतीय जनता पार्टी को लाभ पहुँचाने के उद्देश्य से ये सब कर रहे हैं, लेकिन उनका खुला मिशन कांग्रेस पार्टी को धराशाही करने का रहा है. अब इसका फ़ायदा किसको मिल रहा है, ये उनके लिए गौण बात है. बाकी चौकड़ी में जो लोग हैं, उन्हें क्रांतिकारी होने का तमगा दिया जा सकता है क्योंकि इस रस्साखींच में उनको मजा आ रहा है, और वे सब अन्ना टीम के रूप में स्टार बन गए हैं. आगे देखिये, इनमें से अधिकतर लोग अगले लोकसभा चुनावों में जीतने वाले उम्मीदवार होंगे. बलिदान से ज्यादा स्वार्थ भावना यहाँ भी अवश्य है. इसमें इनकी गलती भी नहीं मानी जा सकती है क्योंकि ये हर इंसान की फितरत है.

अभी हाल में जब टीम अन्ना कांग्रेस के खिलाफ प्रचार के लिए उत्तराखंड के रुद्रपुर शहर में गयी थी तो एक नौजवान ने अपने फेसबुक पर लिखा कि ये उसकी जिंदगी का स्वर्णिम दिन है कि वह टीम अन्ना से रूबरू हुआ है. मेरी ये कामना है कि उसका ये जज्बा अल्पकालिक न रहे क्योंकि टीम अन्ना कहीं उसी हमाम में न पहुँच जाये जहाँ आज के थके हारे बदनाम नेता पड़े हुए हैं. क्योंकि अधकचरे जनतंत्र का यही चरित्र होता है.

जब तक सब लोग शिक्षित नहीं होंगे, जब तक लोगों में सही राजनैतिक संस्कार नहीं होंगे, तब तक दारू, रुपया, पद, या अन्य प्रलोभनों में फंसते रहेंगे. जाति व धर्म के नारों से चुनाव में प्रभावित होते रहेंगे और वर्तमान संवैधानिक व्यवस्थाओं में कभी भी सही निर्णय नहीं ले पायेंगे.

जहाँ तक स्वामी रामदेव जी का मामला है, वह शुद्ध रूप से एक व्यवसायिक दृष्टिकोण से अपनी मुहिम चलाये हुए हैं उनकी दूकानें विश्व के अनेक देशों में चल रही है. खूब मुनाफ़ा कमा रही हैं, योग की महारत की आड़ में उन्होंने अपना जो साम्राज्य बनाया है, वह उतना शुद्ध नहीं है जितना आम लोग समझ रहे हैं. हर दुकान पर एक वैद्य भी नि:शुल्क उपलब्ध है  लेकिन वह जो दवा का प्रिस्क्रिप्शन लिखता है वह ५००-१००० रुपयों का होता हैं, जिसे मरीज की खरीदने की मजबूरी हो जाती है. लगभग हर पर्चे में स्वर्णभस्म एक बड़ी कमाई का जरिया है. एक बार जो फेर में पड़ जाता है, उसे देर में समझ में आता है कि कही खोट में फंस गया हैं. स्वामी जी की वाक्पटुता व अनेक असाध्य रोगों का इलाज करने का दावा भी भुक्तभोगी को देर में समझ में आता है. इन पंक्तियों का लेखक रामदेव जी की निंदा नहीं करना चाहता है क्योंकि उन्होंने योग और आयुर्वेद को नई पहचान जरूर दी है. पर उनका स्वदेशी का नारा केवल जनभावनाओं का दोहन करने के लिए है. उन्होंने अपने उद्योग में जितनी मशीनें लगाई हैं, सब इम्पोर्टेड हैं.

कुल मिला कर शहरी क्षेत्रों के मध्यवर्गीय लोग इन आन्दोलनों व उत्तेजनाओं के शिकार हैं. इन चुनावों में कांग्रेस पार्टी को निश्चित रूप से बहुत नुकसान उठाना पडेगा क्योंकि उसके अनेक सिपहसालार चारों ओर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घिरे हुए हैं. केंद्र की सत्ता में हैं इसलिए बैकफुट पर है. यद्यपि भ्रष्टाचार में सभी छोटे बड़े पार्टियों के नेता लिप्त हैं, जो जरूरत महसूस होने में दलबदल करके ईमानदार बन जाते हैं. कहावत है कि राजनीति और प्यार में सब कुछ जायज है.

सन २०१४ के लोक सभा चुनावों तक ये जूतम पैजार व गाली गलौज रहेगी पर अंत में सब ध्रुवीकरण होकर अपने पुराने ढर्रे पर आ जाएगा. मूलभूत परिवर्तन के लिये शायद बहुत लंबे समय का इन्तजार करना पडेगा क्योंकि अपवादों को छोड़ कर हम सब स्वार्थी हैं, नारे जरूर भ्रष्टाचार के विरोध में गला फाड़ कर लगा रहे हैं.
                                    ***

5 टिप्‍पणियां:

  1. सार्थक प्रस्तुति, आभार.

    कृपया मेरे ब्लॉग"meri kavitayen" पर भी पधारने का कष्ट करें .

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  2. आलेख का अंतिम अनुच्छेद से पूरी तरह सहमत, साथ ही यह कहना चाहता हूँ कि यह आकलन आपके उस मानव व्यवहार की पहचान पर आधारित है जो आपने ट्रेड यूनियन सक्रियता के दौरान प्राप्त की है। सर, एम आई राईट?

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  3. aap 10 minit nay merey jiwan ko he badal diya hey our us raha pey chala diya jes raha per her koi chalney kee sochatey per chaltey nahi hey



    vinod kota sey

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