शनिवार, 14 जनवरी 2012

छोटी माँ


हरप्रसाद चौबे थर्मल प्लांट में सीनियर इंजीनियर थे. उनकी छोटी सी गृहस्थी थी जिसमें उनकी पत्नी सुप्रिया व बेटा हर्ष, कुल जमा ३ जन थे. सब ठीक-ठाक चल रहा था. जब हर्ष ६ साल का हो रहा था तो उसके लिए एक भाई या बहिन के आगमन की तैय्यारी भी हो रही थी, लेकिन भाग्य को कुछ और ही मंजूर था. प्रसव के दौरान दवाओं का कुछ ऐसी गलत प्रतिक्रिया हुई कि सुप्रिया गर्भ सहित चल बसी. जिसकी कल्पना भी नहीं की थी वह हो गया. बाप-बेटे दोनों की दुनिया ही बदल गईं. घर का सारा कारोबार बिगड़ गया.

हरप्रसाद के माता-पिता व अन्य परिवार के लोग पटना के पास चौहद्दन में रहते थे, पर वहाँ का वातावरण बच्चे की परिवरिश के लिए ठीक नहीं था इसलिए हरप्रसाद उसकी बर्बादी नहीं देखना चाहते थे.

हर्ष के मामा उसे अपने साथ ले जाने की जिद कर रहे थे पर चौबे जी का मन नहीं माना. वे किसी ऐसी नौकरानी की तलाश में थे जो बच्चे की देखभाल करे और समय पर खाना बना कर भी उन्हें दे दे. दोस्तों की सलाह पर उन्होंने स्थानीय अखबार में इस आशय का विज्ञापन दिया तो कई आवेदन आ गए. उनकी जांच करने के बाद उन्हें मालती नाम की लड़की का बायोडाटा ठीक लगा. वह शादीशुदा थी पर परित्यक्ता थी. उन्होंने उससे कभी नहीं पूछा कि उसके ससुराल में ऐसी क्या गड़बड़ी थी कि उसे अलग होना पड़ा. मालती ने जल्दी ही अपनी जिम्मेदारी सम्हाल ली तो चौबे जी को बहुत राहत मिल गयी.

सुप्रिया के वार्षिक श्राद्ध के बाद रिश्तेदार-मित्रों का पुनर्विवाह के लिए लगातार दबाव बना रहा लेकिन चौबे जी सुप्रिया की याद में ऐसे डूबे रहते थे कि दूसरा विवाह करने को बेईमानी समझ रहे थे. उधर यद्यपि मालती मासिक वेतन ले रही थी पर उसने घर के कारोबार में इतना अपनापन बताया कि लगता नहीं था कि वह परिवार में कहीं बाहर से आई थी.

दो-ढाई साल सानिध्य में रहने के बाद एक दिन चौबे जी कुछ अस्वस्थ थे, सर दर्द की शिकायत थी तो मालती ने सहज में कह डाला, मैं आपका सर दबा दूं? और यहीं से शुरू हुआ दोनों का दैहिक आकर्षण व प्रेम वार्ता का दौर. ये परिणति, स्त्री-पुरुष का इस प्रकार साथ रहने का कोई नया प्रसंग नहीं है, स्वाभाविक वृति थी. आप्तोपदेश में लिखा है कि राजा, स्त्री व लता जिसके निकट होते हैं उन्ही को अपना लेते हैं. इस प्रकार मालती अघोषित पत्नी के रूप में चौबे जी के साथ रहने लगी. लेकिन हर्ष का बाल-मन नौकरानी का मालकिन की तरह व्यवहार स्वीकार नहीं कर रहा था. वह पिता से कुछ कहने के लिए बहुत छोटा था. वह मालती को माँ के रूप में नहीं देख पा रहा था, इसलिए उसके प्रति उदासीनता व द्वेषपूर्ण विचार पालने लगा. जो कभी-कभी दोनों में टकराव की स्थिति ला देता था. चौबे जी मालती के समर्पण व सेवा से इतने प्रभावित थे कि हर्ष को उसके व्यवहार पर कभी-कभी ज्यादा ही डांट देते थे.

लोकलाज से बचने के लिए चौबे जी ने मित्रों को निमंत्रित कर मंदिर में जाकर मालती से माल्यार्पण का आदान-प्रदान करके गंधर्व विवाह कर लिया. लोगों में जो सुग्बुगाहट व कानाफूसी इनके सम्बन्ध में होती रही थी उसको विराम मिल गया पर चटखारे लेने वालों की कमी नहीं रहती है. घरों में लोग जरूर इस विषय में उल्टी-सीधी बातें करते होंगे, इसलिए हर्ष के साथ पढ़ने-खेलने वाले अन्य बालक उसे नौकरानी का बेटा कह कर चिढ़ाया करते थे. ये बाल-मनोविज्ञान है कि हर्ष इस तरह की फब्तियों व टिप्पणियों से घायल होते रहा. उसके मन में मालती के प्रति घृणा व विद्रोह की ज्वाला जलती रही उसने उसे माँ या मौसी कभी नहीं पुकारा. हर्ष थोड़ा बड़ा हुआ तो चौबे जी ने घर के माहौल में तनाव देखते हुए उसे बोर्डिंग में डाल दिया. यों दिन, माह, और वर्ष गुजरते गए. मालती ने एक बेटा और दो बेटियों को बाद में जन्म दिया लेकिन हर्ष ने उनको कभी भी अपना भाई-बहन नहीं माना.

विधाता ने भविष्य का पूरा खेल पहले ही रच रखा है. हर्ष एक दिन बिना कुछ बताए चुपचाप मुम्बई चला गया. पिता ने खूब खोज-खबर करने की कोशिश की लेकिन उनको मायूसी हाथ लगी, उसका कोई अता-पता नहीं मिला.

मुम्बई भारत का ऐसा महानगर है जो बहुत समय से रोटी-रोजगार के लिए या उसके फिल्मी ग्लैमर द्वारा लोगों को आकर्षित करता रहा है पर हर्ष तो इन दोनों कारकों के कारण वहाँ नहीं पहुँचा था. अनेक प्रकार की विषम परिस्थितियों को झेलते हुए वह वहाँ रह रहा था. मुबई ऐसा नगर है वहां जो भी अनाथ जाता है, उसको आश्रय मिल ही जाता है, चाहे वह फुटपाथ पर रहे या किसी कोरीडोर में रहे. हर्ष एक मोटर मैकेनिक के वर्कशाप में काम करता था, खान-पान की अनियमितताओं व नशीली चीजों के लगातार सेवन से वह बीमार रहने लगा. डाक्टरी जाँच करने से मालूम हुआ कि उसके दोनों गुर्दे खराब हो गए थे.

जब आदमी को अंत समय निकट लगाने लगता है तो वह भगवान का स्मरण करने लगता है. इसी क्रम में उसे अपने पिता की बहुत याद आई और भाव बिह्वल होकर उसने अपने पिता को लिख भेजा कि वह बहुत बीमार है. चौबे जी को पत्र मिलते ही वे पत्नी मालती सहित मुम्बई कूच कर गए. यद्यपि बेटे से मिलकर उन्हें बहुत सन्तोष हुआ पर उसकी हालत देख कर चिंतित हो गए, वह बहुत कमजोर हो गया था. पूरे शरीर में सूजन आई हुई थी. इतना सब होते हुए भी उसके मन में अभी भी मालती में प्रति खलिश कम नहीं हुई थी. उसने उसको प्रणाम तक नहीं किया.

चौबे जी ने बेटे के लिए चिकित्सकीय व्यवस्था करने में देर नहीं की. उसे बोम्बे हास्पीटल में भर्ती किया गया. डाक्टरों ने तुरन्त एक गुर्दे का इन्तजाम करने को कहा. चौबे जी ने अपना गुर्दा देना चाहा, पर मालती ने कसमें दे कर उनको मना किया और खुद अपना गुर्दा देना चाहा. इस प्रकार मालती का एक गुर्दा हर्ष को प्रत्यारोपित हो गया. कालान्तर में वह स्वस्थ होता गया और उसे घर ले आये.

इस प्रकरण के बाद हर्ष की सोच में बहुत परिवर्तन आ गया मालती के प्रति उसके मन के विकार शांत हो गए उसे अपने व्यवहार पर बड़ा अफ़सोस हो रहा था. उसने मालती को माँ कह कर पुकारा तो मालती की आँखें छलछला आई और उसने बेटे को छाती से लगा लिया.

माँ के अनेक रूप, अनेक चरित्र, व त्याग की गाथाएं तमाम भाषाओं के अनेक ग्रंथों में वर्णित है, उनमें मालती की नई कथा भी जुड़ गयी है.
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3 टिप्‍पणियां:

  1. सहज परिस्थितियां, मान्यताओं को तोड़ कर ,सहज प्रबर्ति अपनाने को बाध्य कर ही लेती हैं.- रुचिकर लेख.

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