गुरुवार, 13 अगस्त 2015

जिग-जैग डैम

लाखेरी सीमेंट प्लांट तथा इसकी रिहायसी कालोनी के लिए अंग्रेजों के समय में ही पानी की व्यवस्था के कई विकल्प रखे गए थे. नानादेवी का नलकूप, गाँव का बड़ा तालाब, जिसमें बरसाती पानी जमा होता है, और सखावादा में पम्पिंग स्टेशन, जो पहाड़ी के ऊपर से पाईप लाइन लेते हुए नयापुरा स्थित रिजरवॉयर में पानी लाता है, जहां पानी फ़िल्टर होता है, और उसका ट्रीटमेंट किया जाता है. पिछली सदी के चौथे दसक में चमावली की पहाड़ियों से आने वाले  बरसाती पानी को रोक कर जमा करने के लिए एक बांध बनाया गया. और उसी के पूर्व में बूंदी रोड के किनारे भरान करके एक और मजबूत डैम बनाया गया, जिसे जिग-जैग डैम या बन्दा भी लोग कहा करते हैं. इसको मजबूत सीमेंट की दीवार देकर बनाया गया है. पानी के दबाव या लहरों के जोर को रोकने के लिए डैम के किनारे को आड़े-तिरछे कोण देकर ऐसी बनावट दी गयी है कि ये बहुत सुन्दर दीखता है. खासतौर पर जब पानी ऊपर से छलकता जाता है बरसात में यहाँ एक बड़ी झील बन जाती है. चूंकि इसमें पानी का कोई प्राकृतिक स्रोत नहीं है, पानी गर्मियों तक धीरे धीरे सूख जाता है. इसलिए आवश्यकतानुसार पानी जमा रखने के लिए दक्षिण में रेलवे स्टेशन से करीब डेढ़ किलोमीटर आगे नयागाँव के पास मेज नदी पर एक छोटा पम्पिंग स्टेशन बनाया गया, जहां से पाईप लाइन द्वारा सीधे जिग-जैग डैम में पानी आता था और एक पम्प द्वारा पाईप के माध्यम से फ़िल्टर प्लांट से जोड़ा गया था.

जिग-जैग डैम मानसून के दिनों में छलकने लगता है. यह स्थान बहुत रमणीक व दर्शनीय हो जाता है. कई बार गर्मियों में पानी सूखने के बाद इसमें जमा सिल्ट हटाना भी जरूरी होता था.

गौरतलब है कि कंपनी की सारी जमीन पहले बूंदी रियासत से तथा बाद में रियासतों के विलय के बाद राज्य सरकार से लीज पर ली हुयी है. बूंदी के राजा इस कंपनी के स्थानीय डाईरेक्टर हुआ करते थे.

आठवें-नवें दशक में फैक्ट्री लम्बे समय तक घाटे के दौर से गुजर रही थी. वैट प्रोसेस  तथा पुरानी टेकनोलाजी होने के कारण उत्पादन कम और लागत ज्यादा आ रही थी. तब खर्चे घटाने के क्रम में जिग-जैग डैम की उपयोगिता के बारे में भी सोचा गया होगा क्योंकि इसकी मैनटेनैंस पर बड़ा खर्चा आ रहा होगा. उसी बीच ये भी देखा गया की डैम की नींव में से बहुत पानी का रिसाव होने लगा था. डर ये भी था कि कभी अगर डैम टूट गया या फूट पड़ा तो आगे बजरंगनगर व शिवनगर की नई बसावट डूबत में आ जायेगी. ये सारी संभावनाएं हैड आफिस को भेजी गयी तो वहाँ से आदेश हुआ की डैम को जिला प्रशासन को दे दिया जाये. जांच- पड़ताल के इस प्रोसेस में कई साल लग गए. इस बीच कुछ लोगों ने जमीन पर अवैध कब्जा करके गेहूं तथा सरसों की खेती करना भी शुरू कर दिया था.

मुझे याद है कि जब सं १९६० में मैं लाखेरी आया था तो वह अगस्त का ही हरियाला मौसम था आगे वर्षों में इस डैम की पाल पर लोग परिवार सहित पिकनिक मनाने आते थे. बन्दा मंदिर की तरफ तालाब के किनारे नाव के लिए एक टिन शेड बना हुआ था. लोग नौकायन का आनन्द लिया करते थे. किनारे की सीढ़ियों पर नहाना-धोना भी करते थे, लेकिन ये भी सच है कि यहाँ पर जानलेवा दुर्घटनाएं भी बहुत होती थी.

अब मुझे लाखेरी छोड़े हुए लगभग सोलह साल हो गए हैं इसलिए वर्तमान व्यवस्था के बारे में मुझे पूरी जानकारी नहीं है. फेसबुक पर हमारे मित्रों द्वारों डाली गयी चित्रावली से मालूम हो रहा है कि ये स्थान आज भी गुलजार है. गुलजार रहना चाहिए. सभी मित्रों को शुभ कामनाएं.

पुन:श्च : मेरे इस लेख पर एक मित्र ने टिप्पणी करके बताया है कि जिला प्रशासन ने इस डैम को लाखेरी नगर पालिका को जीर्णोद्धार के लिए सौंप दिया था. तत्कालीन चेयरमैन स्वनामधन्य श्री महावीर गोयल ने इस कार्य योजना में व्यक्तिगत रूचि लेकर तत्कालीन  सांसद श्री रामनारायण मीणा से एक लाख रुपयों की आर्थिक अनुदान लेकर संपन्न कराया.
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