शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

चरमोत्कर्ष


महफ़िलों के लिए सजाये गए गुलदस्ते,
चुनिंदों के लिए महकते हुए पकवान,
कमरों में बंद बहारें,
लदे-भरे बाजार
एक भरते हुए गुब्बारे की तरह
बढ़ाती जा रही है अपना क्षेत्रफल.

दूसरा पहलू  
पसीने से लथपथ-
कृषक की फटी अंगिया
अनजाने में कुछ चरमराती है,
बेबसी बताती है.

कृषक-पत्नी की गोद में-
बिलखता हुआ उसका नादान बालक
रक्तहीन व वस्त्र विहीन
किसी खिलोने या लड्डू के लिए नहीं-
मचलता है झड़बेरी के दानों के लिए.

तभी माँ भुलावा देती है
गुब्बारे फ़ैल कर आने वाले है झड़बेरी तक
और उसके फटने से
झड़बेरी के दाने आयेंगे छिटक कर
बबुआ, तेरे हाथों में.
                      *** 

2 टिप्‍पणियां:

  1. तभी माँ भुलावा देती है
    गुब्बारे फ़ैल कर आने वाले है झड़बेरी तक
    और उसके फटने से
    झड़बेरी के दाने आयेंगे छिटक कर
    बबुआ, तेरे हाथों में.
    sundar prastuti ....badhai tatha abhar Pandey ji

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