शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2011

जाति-बाहर


दिल्ली रामलीला मैदान के पास जो जयप्रकाश नारायण अस्पताल है, इसका पुराना नाम इर्विन हॉस्पिटल था. वायसराय लार्ड इरविन के नाम से आज भी पुराने लोगों की जुबान पर आता है. खरसिल गाँव का नन्दाबल्ल्भ तिवारी इसमें बतौर ड्रेसर काम करता था. इस बार वह गाँव गया तो अपने भतीजे हीराबल्लभ को भी साथ ले आया और उसके लिए काम की तलाश करता रहा. हीरा दसवीं फेल था इसलिए कहीं ढंग की नौकरी नहीं लग सकी.

एक दिन सिस्टर ऐन्जिला ने बाईचान्स नन्दाबल्लभ से कहा, कोई पहाड़ी लड़का खाना बनाने वाला हो तो बताना.
ऐन्जिला और क्रिस्टीना दोनों नर्सें केरला की रहने वाली थी. यहाँ एक साथ स्टाफ क्वार्टर में रहती थी और बहुत दिनों से एक नौकर की तलाश में थी. सिस्टर ऐन्जिला की बात सुन कर नन्दाबल्लभ ने बताया कि लड़का तो है पर उसको साउथ इन्डियन खाना बनाना नहीं आता है.

ऐन्जिला ने कहा, कोई बात नहीं हम उसे सिखायेगा.

इस प्रकार हीरा उन दो नर्सों की सेवा में लगा दिया गया. घर की साफ़-सफाई कपडे-बिस्तर साफ़ रखने के अलावा चाय- काफी बनाता था, धीरे धीरे इडली, दोसा व साम्भर बनाना भी सीख रहा था. उसको सेवक रखने से दोनों नर्सों को बहुत सहूलियत हो गयी.

छ: महीनों तक सब ठीक चल रहा था. इस बीच सिस्टर क्रिस्टीना को मुम्बई जे.जे. हॉस्पीटल में स्टाफ नर्स का जॉब मिल गया तो वह मुम्बई चली गयी. ऐन्जिला अकेले रह गयी. अब हीरा केवल उसी की सेवा में रह गया. हीरा सीधा सादा व सिंनसियर लड़का था. क्रिस्टीना के जाने के बाद ऐन्जिला उसकी ओर ज्यादे ध्यान देने लगी, सर्दियाँ आ गयी तो गरम कपडे बनवा दिये..

ये मनुष्य प्रबल कमजोरी होती है कि जब दो अपोजिट सैक्स के लोग साथ साथ रहें तो एक दूसरे के प्रति आकर्षित हो ही जाते हैं. सच तो ये था कि ऐन्जिला हीरा से प्यार करने लगी थी. हालाँकि वह उससे उम्र में आठ साल छोटा था. ऐन्जिला हीरा को साथ में हर रविवार चर्च ले जाने लगी. हीरा भी साहिबा की बातों में पूरा आसक्त हो चुका था. उसके कहने पर उसने क्रिश्चियन धर्म अपना लिया और कुछ ही दिनों बाद विधिवत शादी कर ली. अब वह हीरा से बदल कर हैरिसन हो गया.

उधर नन्दाबल्लभ को ये बात बहुत देर से मालूम हुई. तब तक गाड़ी बहुत आगे निकल चुकी थी. चर्चाएँ व चटाखेदार बातें स्टाफ में व परिचितों में होती रही पर 'मियाँ बीवी राजी तो क्या करेगा काजी' वाली बात हो गयी.
खरसिल के और कई लोग दिल्ली में नौकरी पर थे. उन्होंने हीरा के ईसाई होने और मद्रासी नर्स से शादी करने की बातें तुरन्त गाँव तक पहुँचा दी. गाँव में बवंडर सा आ गया. आजतक किसी ने ऐसी हिमाकत नहीं की थी.

पंचायत ने हीरा के बाप चंद्रबल्लभ को तलब किया जहां उसने पंचायत की उपेक्षा करते हुए कह दिया, तुमको जो करना है कर लो मेरी एक ही औलाद है. मैं अपने बेटे को नहीं त्याग सकता हूँ.

पंचायत ने एक स्वर से चंद्रबल्लभ को जाति से बाहर करने का फरमान जारी कर दिया. इस प्रकार चंद्रबल्लभ को सपरिवार बहिष्कृत कर दिया गया. गाँव में कुछ समय उपेक्षित रहने के बाद चंद्रबल्लभ सब कुछ छोड़-छाड कर
पत्नी नरुली देवी सहित रुद्रपुर के पास दिनेशपुर में अपने ससुरालियों के पास चला आया. जब ऐन्जिला को ये सब मालूम हुआ तो उसने हैरिसन के मा-बाप को भरपूर आर्थिक मदद दे कर उनका दिल जीत लिया. इस बीच हैरिसन को भी सुपर मार्केट में सेल्स मैंन की नौकरी मिल गयी.

चंद्रबल्लभ ने तीन एकड़ जमीन खरीद कर दिनेशपुर में अपनी जिंदगी की ए बी सी फिर से शुरू कर दी.
दिल्ली में बेटे-बहू से उसका संपर्क बना रहा. कालांतर में हैरिसन और ऐन्जिला के दो बेटों का जन्म हुआ. खुशी में दादा-दादी भी शामिल हुए. खरसिल की तरफ उन्होंने कभी जाने की सोची भी नहीं.

ये घटना ३० वर्ष पूर्व की है. इस बीच यमुना में लाखों मन पानी बह चुका है. हैरिसन के दोनों बेटे पढ़ लिख कर बहुत आगे बढ़ गए है बड़ा लड़का स्टीफन तिवारी I.A.S. होकर दिल्ली में ही सेंट्रल सेक्रेट्रीएट में नियुक्त है तथा छोटा लड़का डाक्टर फ्रेंकलिन तिवारी M.S. करके आल इंडिया इंस्टिट्यूट आफ मेडिकल साइंसेज में कार्यरत है. ऐन्जिला हाल में मैट्रन के पद से रिटायर हो गयी है. उसने पहले ही गुडगाँव में सुशांत लोक में अपना चार बेडरूम वाला घर ले लिया था. अपने सास-ससुर को अपने पास ही रखा है. उनकी खबर रखने वाले बताते हैं कि उनकी बड़ी अच्छी देखभाल होती है.      


  पिछली गर्मियों में स्टीफन और फ्रैकलिन दोनों ही अपने दादा-दादी की इच्छा पर अपनी होंडा सिटी कार में पहाड घुमाने ले गए. खरसिल गाँव जाकर कर चंद्रबल्लभ को आश्चर्य हुआ कि उनकी पीढ़ी का कोई भी व्यक्ति अब वहाँ मौजूद नहीं था. ज्यादातर परिवार भाबर की तरफ निकल गए थे. नई पीढ़ी के लोगों को उन्होंने ज्यादा परिचय देना ठीक नहीं समझा.

यहाँ आ कर चंद्रबल्लभ ने अपने पोतों को बहुत सी पुरानी बातें बताई. गाँव छोड़ने का कारण बताया जिसे सुन कर वे रोमांचित थे.

स्टीफन ने अपनी डायरी में इस पुरानी कहावत को दुहराया ‘Every adversity brings a seed of equivalant advantage with it,’ जिसका अर्थ होता है हर दुर्भाग्य अपने साथ उसी के बराबर अच्छाई के बीज भी लाता है.
                                            ***

1 टिप्पणी:

  1. आपकी कहानी ने मुझे एक वाकया याद दिला दिया जिसमें कुछ ऐसा ही होता है पर परिवार वालों ने लड़के को त्याग दिया . अफ़सोस होता है की समाज, जो की न आपके दुःख में काम आतहै और न ही सुख में, उसके खातिर बच्चों का त्याग कर दिया गया. क्यूँ ऐसा लगता है की बच्चे घमंडी और सिर्फ अपनी ख़ुशी देखते हैं, क्यूँ नहीं ये देखा जाता की उनकी दुनिया भी उतनी ही adhoori है जितनी की उनके बिना मान बाप की.....कहानी पढ़ कर बहुत अच्छा लगा...धन्यवाद

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