शनिवार, 29 अक्तूबर 2011

ओम महिषाय नम:


पन्नालाल दस दिन पहले ही एक दूध देने वाली जवान भैंस खरीद कर लाया था जिसने ना जाने क्यों खाना पीना छोड़ दिया है. खाना पीना छोड़ा तो दूध देना भी बंद हो गया. समझ में नहीं आ रहा था कि भैंस अनशन पर क्यों आ गयी. बस टप-टप आंसू गिराए जाय. पेट भी कुछ फूला फूला सा लगने लगा. श्रीमती पन्नालाल ने सोचा कोई बुरी नजर लगा गया है अतः उसने एक थाली में गेहूं, राई, और सिंदूर रख कर भैंस की तीन परिक्रमा की और एक अठन्नी के साथ चौराहे के ठीक बीच में उड़ेल कर आई. पर भैंस थी कि कुछ टस से मस भी नहीं हो रही थी. यथास्थिति देख कर पन्नालाल बड़े चिंतित हो गए. गाँव में जानवरों के जानकार भंवरलाल को बुलाया गया. उन्होंने हाथ से दो चार फटके भैंस की पीठ पर और पिछवाड़े पर दे मारे लेकिन उनकी समझ में भी कुछ नहीं आ रहा था. इतना जरूर बोले, लगता है अनाज ज्यादा खिला दिया है, इसको कब्ज हो गयी है. गिलोय लाओ और कूट कर इसको पिलाओ.” जब पन्नालाल गिलोय की तलाश में निकला तो सामने हसन अली मिल गया. उसने कहा, तुम गिलोय के चक्कर में कहाँ पड़े हो? वैटनरी अस्पताल लेकर जाओ वहाँ आजकल डाक्टर चोंचले हैं जो बहुत अनुभवी भी हैं, उनको दिखाओ.

पन्नालाल को वैटनरी अस्पताल के बारे में इतना मालूम था कि वे लोग जानवर को जाते ही इंजेक्शन ठोक देते हैं जिससे वह लड़खड़ा कर गिर पड़ते हैं. अस्पताल जानेवाले जानवरों में से आधे ही घर आ पाते हैं. पर मरता क्या नहीं करता? पन्नालाल ने रस्सी खोली और भैंस को डरते-डरते अस्पताल ले गया.

डाक्टर चोंचले उमरदार आदमी थे. तिरछी नजर से भैंस को देख कर पन्नालाल से पूछने लगे, क्या हो गया?
डाक्साब इसने घास खाना छोड़ दिया है. पानी भी नहीं पी रही है. तीन दिनों से न गोबर किया और न दूध दिया, बस रोये जा रही है.

डाक्टर चोंचले ने स्टेथोस्कोप से भैस की छाती, पीठ, पेट व गर्दन की जाँच के बाद पूंछ के नीचे थर्मामीटर डाल कर बुखार भी नापा. तपास पूरी होने पर बोले, पन्नालाल, तुम्हारी भैंस को कोई बीमारी नहीं है. लगता है इसको अपनी पुरानी मालकिन की याद सता रही है. नींद न आने से भी ऐसा हो जाता है. सर खुजलाते हुए डाक्टर साहब फिर बोले, मैं एक गोली देता हूँ सब ठीक हो जाएगा. और फिर डाक्टर साहब ने एक बड़ा सा अंटा (जिसे वे गोली कह रहे थे) पन्नालाल को थमाते हुए कहा, लो इसे खिला देना.

पन्नालाल बोला, ये गोली इसके पेट में जायेगी कैसे. ये तो थूक देगी?

डाक्टर ने एक दो फीट लंबा पाइप भी दिया बोले इसे मुँह में घुसेड़ कर ऊपर करके गोली डाल देना. फिर जोर से फूँक मार देना गोली सीधे पेट में पहुँच जायेगी.

पन्नालाल बड़े भरोसे के साथ भैंस की रस्सी खींचते हुए घर की ओर चला गया. पर आधे घन्टे के बाद ही हाँफते हुए, घबराते हुए, दौड़ा दौड़ा वापस आया, और बोला, डाक्साब गजब हो गया.

डाक्टर की समझ में कुछ नहीं आया. सोचने लगे 'कहीं भैंस मर तो नहीं गयी? उन्होंने पूछा, क्यों क्या हुआ?

पन्नालाल बोल नहीं पा रहा था. डाक्टर ने फिर पूछा, गोली खिलाई?

पन्नालाल थोड़ा संयत हुआ तो बोला, भैंस तो घर जाते हुए रास्ते में खूब सारा गोबर करने के बाद ठीक हो गयी लगती है. मैंने फिर भी आपकी दी हुई दवा देना ठीक समझा और भैंस के मुँह में पाइप डाल कर गोली अन्दर डाली और फिर जैसे ही मैं फूँक मारने लगा, भैंस ने पहले फूँक लगा दी और गोली मेरे पेट में चली गयी है.
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3 टिप्‍पणियां:

  1. जाले के निराले अंदाज।
    अच्छी..बहुत अच्छी लगी पोस्ट। फुर्सत में पढ़ना पड़ेगा आपके ब्लॉग को।

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