सोमवार, 24 अक्तूबर 2011

कृतज्ञता, धन्यवाद, शुभकामनाएं


एक लड़का सुदूर उत्तर प्रदेश के गाँव से मुम्बई चला गया. वहाँ काम पर भी लग गया मुम्बई तो माया नगरी है, वहाँ की तेज रफ़्तार ज़िन्दगी, लोगों का रेला सब कुछ वह देख रहा था पर उस भीड़ में वह अपने आप को अकेला महसूस कर रहा था. उसे घर-गाँव की बहुत याद आती थी. उन दिनों चिट्टी-पत्री ही संपर्क का एकमात्र जरिया होता था सो वह पोस्ट आफिस से एक पोस्ट कार्ड खरीद लाया. बहुत भावुक होकर उसने लिखना शुरू किया, सिद्धि श्री सर्बोपमायोग्य माता पिता जी को प्रणाम, ताऊ ताई जी को प्रणाम, चाचा चाची को प्रणाम, पड़ोस के दादा जी को प्रणाम, गोपाल काका, सुरेश भाई, हीरा जी को प्रणाम, चुन्नू, मुन्नू, गुड्डू, पप्पू, मुन्नी, गुली, जानकी, रामी, चानो, और छम्मो को प्यार व शुभाशीशें. मामा मामी, बुआ फूफा जी को मेरा नमस्कार... इस तरह उसने गाँव के सभी लोगों का सिलसिलेवार नाम व प्रणाम लिखना शुरू किया. कोशिश की कि कोई छूटे ना. अब पोस्ट कार्ड में जगह तो सीमित होती है. नमस्कार, प्रणाम, प्यार, व शुभ आशीषें लिखने में ही भर गया कुछ और लोग रह गए थे तथा बाकी कुशल बात के लिए जगह बची ही नहीं इसलिए आख़िरी लाइन में उसने लिखा, बाकी लोगों को अगले पत्र में प्रणाम लिखूंगा.

कुछ ऐसी ही स्थिति आज मेरी है. मुझे संयुक्त राज्य अमेरिका में आये हुए एक सौ दिन हो गए है और यहाँ आकर ही मैंने इंटरनेट पर अपना ब्लाग जाले लिखना शुरू किया. जिसमे अपनी कल्पनाओं के आधार पर अनेक आंचलिक कहानियाँ व दृष्टान्त लिख डाले. अपने जीवन के द्वितीय प्रहर में लिखी हुई कई कविताओं को भी इसमें प्रकाशित किया. समसामयिक विषयों पर भी लिखा तथा ब्लॉग को रोचक बनाये रखने के लिए इधर उधर के मसाले व चुटकुले भी इसमें डाले हैं आज मैं संतुष्ट हूँ कि मैंने इस अवधि में पूरे एक सौ रचनाएं प्रकाशित करके अपनी सेंचुरी मार दी है. मेरे अनेक पाठकों के सन्देश मुझे मिलते रहे जिन्हें पाकर मेरा हौसला तो बढ़ा ही है, मुझको लगने लगा है कि मेरी ये कृतियाँ लंबे समय तक मुझे लोगों के जहन में स्थान देती रहेंगी.

लिखता तो मैं बचपन से ही था पर पिछले तीस सालों में मेरी लेखन कला रेगिस्तानी नदी की तरह लुप्तप्रायः थी. यहाँ आकर मैंने बहुत जल्दी जल्दी लिखा और बहुत लिखा, कारण मैं अब जीवन के अन्तिम सोपान में हूँ. मेरे पास ज्यादा समय नहीं बचा है. इसलिए जितना काम पूरा हो सका मैंने ओवरटाइम में भी किया.

इस सबका पूरा श्रेय में अपनी बेटी गिरिबाला व दामाद भुवनचन्द्र जोशी को देता हूँ, क्योंकि सारी लेखन प्रेरणा व प्रक्रिया इन्होंने ही मुझे दी. खाली प्रेरणा ही नहीं लेखन सामग्री से लेकर लेपटोप पर लिखना, संयोजन करना, था प्रूफरीडिंग करना, सब डैडीकेशन व धैर्य का कार्य था. मैं ह्रदय से इनको शुभ आशीर्वाद देता हूँ. मेरी नातिनी हिना जो आजकल जार्जिया मेडीकल कालेज में एम्.डी. की छात्रा है, उसके सफल, सुखद व लोकप्रसिद्ध जीवन की कामनाएं करता हूँ.

इसके बाद मैं उन तमाम पाठकों को जो प्रमुखतया फेसबुक पर मेरे मित्रों की लिस्ट में हैं तथा वे अनजान अपरिचित लोग जो निरंतर मेरी रचनाये पढ़ कर इंटरनेट पर अपनी उपस्थिति मुझे बताते रहते हैं; जिनकी संख्या इस छोटी सी अवधि में सैकड़ों में हो गयी है, मैं गाँव से मुम्बई गए गए हुए उस लड़के की ही तरह सबका नाम व उनको प्रणाम लिखना चाहता हूँ, चाहे वह आस्ट्रेलिया में हो, तंजानिया में हो, नैरोबी में हो, जर्मनी में हो नार्वे में हो, सिंगापुर में हो, इंग्लैण्ड में हो, यहाँ अमेरिका में हो, कनाडा में हो या मेरे देश भारत में ही रहता हो; सबको धन्यवाद व शुभ कामनाएं देता हूँ. दक्षिण भारत के उन पाठकों को जो तमिल, तेलगू, कन्नड़, या मराठी भाषी हैं, मेरी क्लिष्ट हिन्दी पढ़ने का साहस करते हैं, अपने दिल की गहराईयों से धन्यवाद देता हूँ.

मैं नवंबर में स्वदेश लौट कर उन रचनाओं को भी प्रकाशित करने का प्रयास करूँगा जो बरसों से मेरे घर पर फाइलों में संगृहीत हैं. अंत में अपना ई-मेल एड्रेस ppandey.blogs@gmail.com. इसलिए लिखना चाहता हूँ कि पाठक गण मुझे मेरी गलतियों व कमियों पर टोकते रहें.
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1 टिप्पणी:

  1. 'उपसहार' की तरह लगने वाला यह लेख कुछ अजीब व अटपटा सा महसूस हो रहा है, आपके सारे लेख रोचक है, चुहुल/ कविताऎ अच्छी है, मै जब भी समय मिलता है 'जाले' पर जरूर जाता हू, लगभग सारे देख चुका हू, अन्य लेखो का इन्तजार है, ईश्वर आपको अनगिनत समय तक अविरल लेखन शक्ति प्रदान करे, ऎसी मेरी कामना है!-------केवल,

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