सोमवार, 5 दिसंबर 2011

दु:खों की जड़


देश के लिए प्राण न्यौछावर करने वाले सैनिकों के परिवारों को सरकार की तरफ से अनेक प्रकार की आर्थिक सहायता देने का प्रावधान किया है. पुराने नियम कानूनों में सारी राशि उनकी विधवाओं के नाम पर ही आवंटित की जाती थी किन्तु बृद्ध व लाचार माता-पिता इसमें किसी प्रकार हिस्सेदार न होने के कारण, कई मामलों में दोहरे शोक-कष्ट में पड़ जाते थे. जहाँ बहुएँ सास-ससुर को तिरस्कृत कर देती थीं, वहाँ झगड़े-लफड़े भी होते रहे हैं. ये भी बिडम्बना ही है. बहुत से माता-पिता इसी विषय में अदालत का दरवाजा भी खटखटाते रहे पर न्याय तो क़ानून के खूंटे से बंधा होता है, उनको निराशा ही हाथ आती थी. अत: सरकार ने सारी बातों को ध्यान में रख कर अब ये शेयर आधा आधा कर दिया है ताकि माता पिता मोहताज ना रहें.

लंमगड़ा के स्वर्गीय कैप्टन जगदीश सिंह का केस इस सम्बन्ध में अनोखा है कि उसकी बृद्धा माँ और विधवा पत्नी को जिलाधिकारी ने अपने पास बुला कर सरकार की तरफ से गहरा दु:ख व्यक्त किया और दस लाख रुपये सहायता राशि स्वीकृत होने के सूचना दी. जगदीश के पिता तो पहले ही गुजर चुके थे, माता भगवती देवी को जब बताया गया कि आधी राशि यानि पाँच लाख रुपये उनके खाते में डाले जायेंगे जिसके लिए अलग से व्यक्तिगत खाता किसी बैंक या पोस्ट आफिस में खोलना होगा तो वह अनपढ़ ग्रामीण महिला जिलाधिकारी पर बहुत बिगड़ गयी, बोली, तुम मेरे और बहू के बीच झगड़ा करवाना चाहते हो, मुझे अलग खाता नहीं खोलना है. डी. एम. साहब ने इस विषय में विस्तार से भविष्य की समस्याओं व नियम क़ानून का हवाला दिया, बहुत तरह से समझाया, पर वह नहीं मानी. एस.डी.एम. (जो स्वयं कुमाउनी थे) को समझाने की जिम्मेदारी दी गयी पर वे भी समझाने में विफल रहे. बुढ़िया को बहू पर अति विश्वास था जीवन के शेष दिन उसी के आश्रय में रह कर काटने का इरादा था. अस्तु प्रशासन ने मजबूर होकर सारी राशि जगदीश की विधवा ज्योति के नाम जारी कर दी.

कहा जाता है कि पैसा अपनी रंगत अवश्य दिखाता है. इतनी बड़ी राशि मिलने पर ज्योति को पंख लग गए. कुछ रोजगार तलाशने के चक्कर में उसका नैनीताल शहर में आना-जाना होने लगा. भरी जवानी में विधवा हो जाना भी एक अभिशाप है. जब शरीर को भूख लगती है तो तमाम सामाजिक व धार्मिक मान्यताएं बेमानी लगने लगती हैं. ऐसा ही हुआ एक नौजवान हरमिंदर सिंह से ज्योति की आशनाई हो गयी और दो साल के अंतराल में ही वह अपनी सारी चल सम्पति ले कर उसके साथ फुर्र होकर कहीं पंजाब की तरफ चली गयी. कहाँ गयी, कैसे गयी, भगवती देवी को कुछ भी नहीं मालूम, उसने तो काठगोदाम तक आने वाली रेल भी कभी नहीं देखी थी. इसलिए सब तरफ अन्धकार ही अन्धकार था. परिवार में कोई तीसरा सदस्य भी नहीं था जो भाग दौड़ करता. ग्राम सभा के लोगों ने जिला प्रमुख व डी.एम. साहब के पास समाचार पहुंचाया पर अब कुछ नहीं हो सकता था.

अशिक्षा व अज्ञानता बहुत से दु:खों की जड़ है. बुढ़िया अब भीख मांग कर गुजारा कर रही है.
(इस कहानी में पात्रों व स्थान के नाम काल्पनिक हैं पर प्रकरण सत्य घटना पर आधारित है.)
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3 टिप्‍पणियां:

  1. सास बहू दोनों ही शिक्षा व अज्ञान के शिकार हैं!!

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  2. ऐसे प्रकरणो के पिचचे अशिक्षा एक बहुत बड़ा कारण रहा है और आगे भी रहेगा विचारणीय प्रस्तुति ...समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है

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  3. 'सास' ने तो अपना फ़र्ज़ निभाया, 'बहू' जानवर निकली तो क्या किया जाय.

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