शनिवार, 10 दिसंबर 2011

मैं दिल्ली का लाट हूँ


जनता  का  सिपाही हूँ, बातों  का  सम्राट  हूँ
मैले बिस्तर पलट दिये पर वही पुरानी खाट हूँ.

बामन भी हूँ, बनिया भी हूँ, कोई कह ले जाट हूँ
बहुरूपी, समदर्शी  कह  लो, भाई मैं तो भाट  हूँ.

सबके  गंदे  कपड़े  आते, मैं  वह  धोबीघाट हूँ
दारूबंदी  की  बोतल  का, मैं  अनमोल डाट हूँ.

नए पुराने चावल मिल गए, मैं वह गीला भात हूँ
चीनी अमेरिकी माल मिलेगा मैं वह देसी हाट हूँ.

माल  चरपरा  दस्तावर भी, बहुरंगी  मैं चाट  हूँ
हर गरीब जो  पहन  सकेगा, प्यारा कपड़ा टाट हूँ.

समाजवादी  पूंजीपति  हूँ, गांधीवादी  ठाट  हूँ 
श्वेत/बिरंगी टोपी  के  नीचे  खद्दर-टाई नाट हूँ.

बरसाती  नाले  से  उभरी,  नई-नवेली  पाट  हूँ
थूक से जिसको चिपका रखा, मैं कागज़ की फाट हूँ.

मन चाहे जो भोजन परसो, मैं इमली का पात हूँ
आयोगों की फसल उगाता मैं दिल्ली का लाट हूँ.
                 ***

4 टिप्‍पणियां:

  1. मैले बिस्तर पलट दिये पर वही पुरानी खाट हूँ...very interesting!!

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  2. आयोगों की फसल उगाता मैं दिल्ली का लाट हूँ...वाह-- क्या बात है.

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  3. बहुत उम्दा,सुन्दर

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