शनिवार, 24 दिसंबर 2011

नफ़रत


मैं और मेरी पत्नी संयुक्त राज्य अमेरिका से जर्मन एयरवेज लुफ्थांसा से भारत वापस आ रहे थे. बीच में फ्रेंकफर्ट में ५ घन्टे का विराम था जहाँ से लुफ्थांसा की कनेक्टिंग फ्लाईट हमको लेनी थी. फ्रेंकफर्ट में अन्य देशों से आने वाले यात्री भी यहाँ इसी तरह इकट्ठे होकर भारत के लिए फ्लाईट पकड़ते हैं. फ्रेंकफर्ट का एयरपोर्ट इतना विशाल है कि कई किलोमीटर दूर दूसरा एंट्री गेट मिलता है. अधिकाश बुजुर्ग यात्री, यात्रा टिकट के साथ ही ह्वीलचेयर की भी बुकिंग करवा लेते हैं, जो एयरपोर्ट पर भागा-दौड़ी व मार्गदर्शन में बड़ा सहायक होता है.

यहाँ नार्वे से आने वाली एक ४० वर्षीय महिला डाक्टर हमें मिली. संयोग से इकानॉमी क्लास में वह हमारी सिटिंग रो में तीसरी यात्री निकली. जैसा कि मैं अपनी आदत के अनुसार हर अजनबी से उसके बारे में पूछताछ करता हूँ, उससे भी मैंने हाय-हेलो किया पर वह शुरू में हाँ, हूँ में अनिच्छा पूर्वक जवाब देती रही. मेरी पत्नी नहीं चाह रही थी कि मैं अनावश्यक रूप से उसकी बातें पूछता रहूँ, लेकिन जब उसने बताया कि वह एक फिजीशियन है तो मैंने भी अपना परिचय एक मेडीकल प्रेक्टिशनर के रूप में उसको दिया. उसके बाद उसने मेडिकल टर्म्स के बारे में मेरी जानकारी के बारे में अनेक प्रश्न पूछे. मैंने उसको बताया कि मैं I.C.M.R. (इन्डियन कौंसल आफ मेडिकल रिसर्च) से संबद्ध एक रिसर्च इंस्टिटयूट में काम कर चुका हूँ तो वह व्यग्रता से मेरे अनुभव सुनने लगी. मैंने बताया कि बैक्टीरियोलॉजी में मीडिया प्रिपरेशन, कल्चर से लेकर सेंसीटिविटी टेस्ट तक की प्रक्रिया द्वारा किस प्रकार डाइग्नोसिस किया जाता है, सीरोलौजिकल टेस्ट में किस तरह जींस व ट्रांसमिटिंग डिजीजेज पर रिपोर्ट दी जाती हैं, हिस्टोपैथोलॉजी में औरगन्स को वैक्स में डालकर पतले स्लाइसों में काट कर स्लाइडों में उतारा जाता है तथा बायो-कैमिस्ट्री में औटोएनेलाइजर किस प्रकार फंक्शन करता है, आदि अनेक विषयों में उसने गंभीरता से मुझ से चर्चा की. वह मेरी इन बेसिक जानकारियों से बहुत प्रभावित लग रही थी. फिर वह कुछ खुल कर बोलने लगी. उसने अपने विषय में बताया कि वह पंजाब में भटिंडा से है. पी.जी. करने के बाद कुछ महीने दिल्ली में लेडी हार्डिंग में अपनी सेवाएं दी और उसके बाद नार्वे सरकार के एक ऐड पर आवेदन किया और १५ साल पहले ओस्लो आ गयी और अब वहीं की होकर रह गयी है. वहीं की नागरिकता उसे मिल गयी है. इस बार कई वर्षों के बाद भारत अपनी बीमार नानी से मिलने जा रही थी.

फ्रेंकफर्ट से नई दिल्ली ७ घंटों का लंबा सफर था, वह कोई किताब पढ़ कर या टच स्क्रीन पर वीडियो देख कर अपने-आप को व्यस्त रख रही थी पर बीच-बीच में हम दोनों से बतियाने भी लगी थी. उसने हमसे हमारे घर-परिवार व व्यक्तिगत जीवन की बहुत पूछताछ की. उसको ये आश्चर्य हो रहा था कि हम एक प्लैंड व व्यवस्थित जीवन जी रहे हैं और अपनी शादी की गोल्डन जुबली मना चुके हैं. उसका ख्याल था कि भारत में अधिकाँश लोग अज्ञानता, अशिक्षा, दरिद्रता, स्वार्थपूर्ण, अनियमित जीवन के शिकार हैं. सफर के अंत में उसने एक छोटी सी किताब मुझे दी, जिसकी जिल्द पर नाम लिखा था, I  Hate Men. उसने मुझसे कहा कि यह उसकी संक्षिप्त autobiography है और मैं उसे घर जा कर ही पढूं.

घर पहुँच कर उस पुस्तक को मैंने एक घन्टे में आद्योपांत पढ़ डाला. मुझे दु:ख हुआ कि उसके विचारों में अनेक गलतफहमियां थी जिनको मैं दूर कर सकता था. क्योंकि उसने बाल्यकाल में जो भोगा और अनुभव किया वह भारतीय समाज का एक विद्रूप चेहरा व अपवाद है. प्रथम वचन में लिखी उसकी आत्मकथा का संक्षिप्त इस प्रकार है: मैं अमृता उर्फ अमृत कौर बचपन में ही मातृहीन हो गयी थी. पिता आर्मी में मेजर थे. मेरे डैडी ने मेरी मॉम को बहुत परेशान किया, जिस कारण उसने खुद ही अपने जीवन का अंत कर लिया.... I hate my dad. मुझे नौकरों के भरोसे रखा गया जिन्होंने मुझे हमेशा परेशान किया. मुझे molest करने की भी कोशिशें भी की गयी. मैं होस्टल में रहने लगी. मेरी हंसी बचपन में ही छीन गयी थी.... कॉलेज में भी लड़कों ने मेरे साथ योन दुर्वव्यवहार करने की कोशिश की. मुझे लगने लगा कि भारत में लड़कियों के लिए आत्मसम्मान जैसी कोई चीज नहीं बची है. उनको खिलौना समझा जाता है. I hate India.… कहने को भारत की संस्कृति वैदिक व नैतिक है पर मुझे यह जंगली जानवरों की संस्कृति लगती है. I hate Indian culture.… मैंने आजीवन कुंवारी रहने का निश्चय किया है. मैं किसी पुरुष की मित्रता स्वीकार नहीं करती हूँ. I hate men.... इसीलिये मैं यहाँ स्वीडन की वादियों में श्वेत बर्फीले धरती-आसमान के बीच अपने जीवन को ट्यूलिप के फूल की तरह अलग से सहेजे हुई हूँ.

अमृता ने ये सम्पूर्ण बातें बड़े मार्मिक ढंग से लिखी हैं. एकांत की नीरवता में जैसे सारे सांसारिक सुख खो गए हों. काश ! वह मुझे दुबारा मिलती तो मैं उसे वास्तविक भारतीय वांग्मय संस्कृति व सभ्य समाज के भी दर्शन करा कर प्यार के अनेक रूपों के विषय में बता सकता.

मैं उसकी किताब में छपी ई.मेल एड्रेस द्वारा ये बताना चाहूँगा कि जो उसने देखा-भोगा वह अवश्य ही दुर्भाग्यपूर्ण था, पर सब ऐसा नहीं है. ईश्वर की बनाई इस प्रकृति में बुराइयों से ज्यादा अच्छाइयां भी है. भारत भी इसका अपवाद नहीं है.
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3 टिप्‍पणियां:

  1. तरह तरह के लोग, तरह तरह की परिस्थितियां, तरह तरह की सोच - सबकी अपनी अपनी रामकहानी.

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  2. उसके जीवन के कटु अनुभवों ने जो उसे दिया निश्चय ही दुखद है. उसे शायद सुअवसर ही नहीं मिला कि जीवन के अन्य पहलू से अवगत हो पाती. प्रभु उसे प्रसनन रखे.

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  3. सचमुच दुखद अनुभव हैं। जिन्होंने ऐसी स्थितियों को भोगा है वे किसी पर विश्वास करें भी तो कैसे।

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