गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

कृपया सोचिये


सर्व प्रथम मैं ये घोषणा करता हूँ कि मैं वर्तमान में किसी राजनैतिक पार्टी का सदस्य नहीं हूँ और न किसी का हितैषी हूँ क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अधिकांश निर्णय अलोकतांत्रिक ढंग से लिए जा रहे हैं. चाहे केन्द्र हो या राज्य, कहीं की भी सत्ता में जो लोग काबिज हैं, सब की सोच केवल येन-केन प्रकारेन सत्ता हथियाना रह गया है. भविष्य के सारे निर्णय इसी बात को ध्यान में रख कर लिए जाते हैं कि उससे आगामी चुनावों में कितना लाभ मिल सकेगा? सत्ता की जो गरिमा थी वह धीरे-धीरे कम हो गयी है. आज स्थिति ये हो गयी है कि किसी को बड़ी गाली देनी हो तो उसे नेता जी कहना पर्याप्त होगा. सबसे अफसोसजनक बात ये हो गयी है कि देश को शाशित करने वाली सर्बोच्च संस्थाएं संसद तथा विधान सभाओं में आम आदमी की पहुँच नहीं है. क्योंकि उसके पास चुनाव लड़ने के लिए धन+साधन नहीं होता है. लोग अब ये तक कहने लगे हैं कि कोई शरीफ आदमी इन संस्थाओं में नहीं जा सकता है क्योंकि चुनावबाजी में सौ प्रपंच व अबैध खेल करने पड़ते हैं. ये कुछ शातिर लोगों का धन्धा बन गया है.

ये अजीब सी स्थिति है कि चुनावों से पहले हर बार राजनैतिक पार्टियां अपना घोषणा-पत्र छापती हैं और हर बार मतदाता ठगा जाता है. मतदाता भी ऐसा भोला/भेड़चाल है कि फ़ौरन लालच या आश्वासनों पर लुट जाता है. मतदाताओं का एक बड़ा तबका जो अपने को संभ्रांत व बुद्धिजीवी बताता है, मतदान करने ही नहीं जाता है. कुल मिलकर ५०% वोटिंग हो जाये तो बड़ी बात मानी जाती है. ये अशिक्षा व सिस्टम का विद्रूप चेहरा है.

ये कहना भी अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा कि कुछ अपवादों को छोड़ कर हम सब स्वार्थी और बेईमान हो गए हैं. सभी लोग निजी स्वार्थों की ओट में तीर चला रहे हैं और एक दूसरे को चोर साबित करने में लगे हुए हैं. लोकपाल बिल अथवा सशक्त लोकपाल बिल एक क़ानून का रूप ले लेगा तो क्या हमारे ये दुराचरण छूट जायेंगे? मैं सोचता हूँ यह एक दिवा-स्वप्न है. मैंने गत वर्ष २७ अगस्त को प्रश्न चिन्ह शीर्षक से इसी विषय पर ज्वलंत विचारणीय प्रश्न उठाये थे. मेरे कई मित्रों की धारणा थी कि अन्ना हजारे जी का आन्दोलन व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन ला देगा. देश के अनेक युवा अति उत्साहित थे, शायद आज भी होंगे, जो पूरी व्यवस्था का ध्वंश चाहते हैं ताकि नव निर्माण किया जा सके. मैं उनकी भावनाओं का दिल से समर्थन करता हूँ, पर यह वर्तमान संवैधानिक प्रावधानों के तहत पूरी तरह असंभव है. अपने मन को समझाने के लिए इसे क्रान्ति का नाम जरूर दिया जा सकता है.

अभी ये एपीसोड खतम नहीं हुआ है, इसमें जो लोग जोर-शोर से जुड़े हुए हैं, वे दिल से चाहते हैं कि देश से भ्रष्टाचार का बीज मिटा दिया जाये. लेकिन ऐसे भी लोग बहुत हैं, जो अपने व्यक्तिगत फ्रस्ट्रेशन के कारण पूर्वाग्रहों से पीड़ित है या विशुद्ध रूप से तमाशाई हैं. अपनी भड़ास निकालने के लिए सरकार में शीर्ष पर बैठे व्यक्तियों को पूरी ताकत से गालियाँ देकर अपनी लोकप्रियता चाहते हैं. इसमें भी राजनीतिक खेल है.

ताजी-ताजी बात, सोशल नेटवर्किंग पर लगाम लगाने की बात उठ रही है. मीडिया ने हाय-तौबा मचाना शुरू कर दिया है. मैं इस विषय में बिना लाग लपेट के कहना चाहता हूँ कि बहुत हद तक ये बात सही है कि कुछ लोगों ने इस प्लेटफार्म का उपयोग मात्र छिछोरापन व कुछ नामी हस्तियों पर कीचड़ उछालने के लिए किया है या अभी भी कर रहे हैं. इसके पीछे राजनैतिक प्रतिबद्धता हो सकती है अथवा गैर जिम्मेदाराना हरकत. यह हो सकता है कि कई लोग पूर्वाग्रहों से पीड़ित हों लेकिन यह सच है कि कई लेख, कार्टून व वीडियो क्लिप बहुत भद्दे व आपत्तिजनक ढंग से फेसबुक पर आये हैं. अगर यह किसी पक्ष विशेष की छद्म कार्यवाही है तो उनको होशियार हो जाना चाहिए क्योंकि जिस तरह से आतंकबाद के भस्मासुर को पाकिस्तान के हुक्मरानों ने भारत के बिरुद्ध प्रोत्साहित किया और अब उनके अपनी गर्दन तक पकड़ में आ गयी है, ठीक उसी तरह ये कीचड़ उछालो अभियान भविष्य में किसी को भी सुरक्षित नहीं रहने देगा. इसलिए इस ट्रेंड को रोका जाना चाहिए. भाषा के प्रयोग में संयम बरता जाना चाहिए.

जहाँ तक व्यक्तिगत अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की बात है, आपको ये भी सोचना होगा कि आपकी स्वतन्त्रता का अर्थ ये नहीं है कि आपको दूसरों की स्वतंत्रता पर हमला करने का अधिकार मिल गया है.

कृपया इस विषय में सोचिये.
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3 टिप्‍पणियां:

  1. सटीक,सामयिक विचार. जमाने में 'सभ्य नेता' तरीके से चुटकियों के छींटे मारते थे.उन्हीं से लज्जित हो कर तुरंत समस्या समाधान खोजते थे.अब उलटा दोसारोपन कर पूरा कीचड ही उड़ेल देते हैं साथ में ज़हर भी उगलते हैं, उस पे तुर्रा ये कि " हम करें तो ठीक,तुम करो तो गलत". तो कहीं से तो 'झाड़ू' लगना पड़ेगा, पर ये हैं कि 'एन केन प्रकारेण' 'झाड़ू' ही तोड़न-मरोड़ने लगते हैं, चाहे वह 'अन्ना' का हो या किसी और का.

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