मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

निर्मोही?

मेरे पिताश्री की अलमारी में अनेक बड़ी बड़ी पुस्तकें व ग्रन्थ थे. मैं जब छोटा था और कुछ हिन्दी पढ़ने व समझने लगा तो इन पुस्तकों में छपे हुए रंगीन चित्र बहुत अच्छे लगते थे, खासतौर पर शुक सागररामचरित मानस में हर अध्याय पर पौराणिक कथाओं से संबद्ध चित्र होते थे. तब मैं कोई श्रद्धाभाव या धार्मिक भावना से इनको नहीं देखता था, ना ही तब मुझमें इतनी समझ थी कि उन पर कोई सोच विचार करूं. लेकिन एक पुस्तक जिसने मुझ पर असर डाला था वह थी, ज्ञान बैराग्य प्रकाश, वह मुझे बहुत जीर्ण अवस्था में मिली. उसके प्रकाशक गीता प्रेस गोरखपुर थी या श्रीकृष्ण प्रकाशन बम्बई मुझे याद नहीं है. सरल भाषा में दोहों के साथ साथ अनेक कहानियां/दृष्टांन्त इसमें थी.

एक कहानी निर्मोही राजा की भी थी. उसके परिवार के सभी लोग निर्विकार व निर्मोही थे. मुझे अब हल्की सी याद है उस राजा का लड़का यानि राजकुमार आखेट के लिए दूर जंगलों में जाता है, जहाँ एक साधू-सन्यासी के आश्रम में पहुँच जाता है और अपना परिचय देता है कि वह निर्मोही राजा का बेटा है’. सन्यासी को बड़ा आश्चर्य हुआ कि राजा तथा निर्मोही दोनों विशेषण एक ही व्यक्ति के कैसे हो सकते हैं? अस्तु जाँच करने के लिए वह राजपुत्र को आश्रम में ही ठहरा कर उसके राज्य में राजमहल तक पहुँचा. सबसे पहले द्वारपाल से मुलाकात हुई उसको बताया कि राजकुमार को उसके सामने ही शेर ने खा लिया है. उसके बाद महारानी को यही बात बताई तथा राजा को जाकर भी यही संदेश दिया तो सभी की प्रतिक्रया यही थी कि राजकुमार की शायद इतनी ही आयु दी गयी होगी, इसमें परेशान होने वाली कोई बात नहीं है, यह सँसार व सभी प्राणियों के शरीर नश्वर ही होते हैं. सन्यासी को उन सबकी बातें सुन कर विश्वास हो गया कि गृहस्थी हो कर भी राजा और उसके आसपास के लोग निर्मोही थे. जो सुख-दु:खे समेकृत्वा, लाभालाभो जयाजये के आदर्श भाव से जी रहे थे.

आज, पैंसठ-सत्तर साल के बाद मुझे पंडित दीनानाथ जी से एक आध्यात्मिक गोष्ठी में मुलाक़ात हुई तो उन्होंने इसी विषय पर लगातार कई दिनों तक प्रवचन किये. बहुत से लोगों को ये बोरिंग लग रहा था क्योंकि आज के भौतिक युग में लोग संपत्ति जोड़ने के लिए दिन-रात प्रयत्नशील रहते हैं. ऐसे में धन-संपत्ति व परिवार से उदासीन रहने का उपदेश पच नहीं रहा था. पर मुझे उनके प्रवचनों ने अपने अतीत में झांकने का एक आनंदपूर्ण अवसर मिला. जब पंडित जी से घनिष्ठता हुई तो मैं उनको उसी निर्मोही राजा के रूप में देख रहा था जिसकी मूरत मेरी जहन में बाल्यकाल से बिराजी हुई थी.

संयोग कुछ ऐसा हुआ कि पंडित दीनानाथ जी ने मेरी बस्ती में एक जमीन का बड़ा रिहायसी प्लाट खरीद लिया और उस पर विधिवत मकान बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी. दौलत के मामले में पंडित जी बड़े सौभाग्यशाली थे. उनकी बातों से लगता था कि उनके पास खूब धन-संपत्ति है. उन्होंने एक बड़े नामी आर्किटेक्ट+बिल्डर को ये मकान बनाने का ठेका दे दिया.

पंडित जी के आसपास मंडराने वाले हम सभी लोग, उनके बस्ती में ही आवास बनवाने से अभिभूत थे, खुश थे. पंडित जी नित्यप्रति मकान की प्रगति के बारे में अपना उल्लासपूर्ण वक्तव्य हम लोगों को सुनाया करते थे. सबसे बढ़िया क्वालिटी की महंगी ईटें बाँस बरेली से मगवाई गयी थी. चौखटों व अलमारियों के लिए सागवान की लकड़ी बिजनौर से, अखरोट की लकड़ी सीधे जम्मू से, तुन की लाल लकड़ी बागेश्वर से, ह्वाईट सीमेंट बिरला वाला, साधारण क्वालिटी सीमेंट ए.सी.सी. होलसिम से, संगेमरमर के पत्थर मकराना राजस्थान से, और इटैलियन फर्नीचर पंचकुइया रोड नई दिल्ली से आ रहा था. सजावटी सामान बढ़िया नाम व ऊंचे दाम तथा प्रसिद्ध मार्का, जो हमने कभी सुने भी नहीं थे, प्रोसेस में थे. हम सुनने वालों को ईर्ष्या तो नहीं होती थी, पर वैराग्य और निर्मोह का प्रवचन करने वाले पंडित जी के मुँह से ये बखान अजीब सा लगता था. वे कुछ ज्यादा ही मोहित थे. मुझे भी उनकी कथनी और करनी में काफी विरोधाभास लगने लगा था.

जब वे मकान को घर में तब्दील करने की तैयारी कर रहे थे, तब गृहप्रवेश के लिए आयोजन व व्यवस्था की बात हो रही थी तो एक रात को पंडित जी को ब्रेन स्ट्रोक हो गया उनको तुरन्त ICU में भर्ती होना पड़ा. डाक्टरों का कहना था कि ब्लड प्रेशर बढ़ने से दिमाग की कोई नस फट गयी है. बहुत दिनों तक अस्पताल में रहे, जान तो फिलहाल बच गयी, पर पंडित जी के पूरे दाहिने अंग में लकवा पड़ गया और वे चलने-फिरने तथा बोलने से लाचार हो गए. गृह प्रवेश नहीं हो पाया. वे अब इशारों से अपनी अभिव्यक्ति करते हैं कि उनको उस मकान से कोई मोह नहीं रहा है.
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3 टिप्‍पणियां:

  1. ये तो उपरवाले का विधान है, साधारण मानव कभी तृप्त नहीं हो सकता.

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  2. बेहद उत्तम रचना अंकल........ह्मारे समाज मे ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाते हैं......

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  3. कथनी और करनी यदि एक हओ जाये तो शायद हमारी सामाजिक व्यवस्था म काफी सुधार हो जाये । यहाँ सन्तोष कहाँ ?

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