सोमवार, 26 दिसंबर 2011

लावण्यमयी लाखेरी (बूंदी, राजस्थान)


मैं लाखेरी के इतिहास से जुड़ा हुआ हूँ. मैंने अपनी जड़े यहाँ इतनी गहराई तक डाल दी थी, या यों कहना चाहिए कि गहराई तक जड़ें जाने के संयोग बनते चले गए थे.

ज्यों गंगा के किनारे पानी का विशेष महत्त्व नहीं होता, ज्यों तीर्थों के स्थाई निवासी वहाँ के देवस्थानों का कोई विशेष आकर्षण नहीं रखते, और जिस प्रकार सदाबहार हिमालय की वादियों में रहने वाले स्थाई निवासी वहाँ की अलौकिक छटा को नेत्रों से नहीं पी सकते, उसी तरह लाखेरी के घोंसले में रहने वाले व्यक्ति को इसके वास्तविक विलास का आनंद तभी मिल सकता है जब वह बाहर आकर उसे निहारे. अंतरिक्ष में पहुँचने के बाद अंतरिक्ष यात्री ने अपने उदगार बड़े उल्लास के साथ व्यक्त किये कि धरती बहुत सुन्दर व मनोहारी है. मैंने अन्दर से और बाहर से इस भूमि को एक कामगार की हैसियत से भी और एक रचनाधर्मी की दृष्टि से भी देखा है, इसलिए इसको मैं एक पुण्यभूमि व धन्यभूमि के नाम से संबोधित करता हूँ.

धर्म, अर्थ, काम, व मोक्ष, जीवन के ये चारों उद्देश्य यदि कोई प्राप्त करना चाहे तो लाखेरी लाखों स्थानों में से एक अनुपम स्थान है. अरावली पर्वत मालाओं की उपत्यकाओं की कवच में बसी यह प्राचीन नगरी अनेक अभाव-अभियोग होते हुए भी कितने लोगों के पेट पालती है, इसका हिसाब लगाना मुश्किल होगा. शहरों में शहर, और गाँवों में बड़ा गाँव, भारत के हर इलाके का व्यक्ति अपनी अपनी सभ्यताओं की छाप लिए एक महानगरीय विचारों का उदाहरण है. कस्बाई परिवेश के अनेक दोष होते हुए भी यह मातृतुल्य है, जिसके दोष गिनाने का अधिकार पुत्रों को नहीं होता है.

कुछ निराशाबादी लोग यों कह सकते हैं कि लाखेरी में क्या रखा है? यहाँ तो जीवन बेकार बिताना जैसा है. ये उलाहना  ग्लैमर पसंद लोगों का हो सकता है, लेकिन ग्लैमर तो चंद दिनों की चमक है. मैंने दिल्ली व मुम्बई में काफी दिनों तक रह कर देखा है वहाँ सब कुछ होते हुए भी कोई भाईचारा या अपनापन लोगों के जीवन में अनुभव नहीं होता है. वहाँ आदमी मशीन हो चुका है जहा रिश्तों को शुद्ध व्यावसायिक दृष्टि से देखा जाता है. जैसे तश्तरी में अनेक प्रकार के पकवान करीने से सजा कर परोसे जाते हैं पर उनकी शुद्धता व पवित्रता पर अनेक प्रश्नचिन्ह लगे होते हैं. जबकि लाखेरी वालों को शुद्ध तथा मीठे अनाज व सब्जियां प्रकृति के सौगात के रूप में प्राप्त हैं. कुवे-बावड़ी ही नहीं, मेज नदी का गंदला पानी भी अपने में स्वाभाविक मनोहारी मिठास रखता है. आप-पास में सवाई माधोपुर या गंगापुर चले जाइए वह स्वाद आपको नहीं मिलेगा.

चारों तरफ खेत-बाड़ी, अमराइयां, बरसात में पहाड़ियों पर उगे घास व पौधों की तरुणाईयाँ, छलछलाते जलाशयों व जलस्रोतों की शहनाईयां, यह सब देखकर, अब से पचास साल पहले मुझे सब कुछ मेरे कौसानी व नैनीताल की ही तरह आकर्षक व सुन्दर लगा था.

हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई, आस्तिक-नास्तिक, हर वर्ण के, कद काठी के, शराबी-कबाबी से लेकर राम और रहीम के अनन्य उपासक तक इस घरोंदे की कुशल कामना में मेरे साथ आवाज में आवाज मिलाते हुए एक असीम नाद के स्वर में सुनकर मैं आनंदित व बिह्वल हुआ था तथा उन तारों को आज कई वर्षों के बाद भी झंकृत महसूस कर रहा हूँ.

बन्देश्वर महादेव, बाला जी, चमावाली माता, मूडकटे बाला जी, शालन्ध्रा देव स्थान, लुनाबा देवस्थान, नानादेवी का मंदिर, गाँव के अन्दर राधा कृष्ण मंदिर, लकड़ेश्वर महादेव, भूमिया देव, आदि नारायण चारभुजा जी का प्राचीन मंदिर, मनसापूर्ण गणेश जी और ए,सी.सी. कालोनी के बीच बना नया शिव मंदिर, सभी इस चौहद्दी की रक्षा में अनवरत हिन्दू विश्वासों को बनाये हुए हैं. अलीशेर बाबा की जमीन पर सीमेंट प्लांट बना है. आज भी कंपनी जामा मस्जिद को कुछ मुआवजा/ चढ़ावा देती है? (मुझे आज की यथास्थिति मालूम नहीं है.) गरमपुरा, ईश्वर नगर व गाँधीपुरा में मुस्लिम मतावलंबी अपनी मस्जिदों में, सिख अपने गुरुद्वारा में और ईसाई रामधन चौराहे के पास अपने गिरजा घर में जगत कल्याण की प्रार्थनाएं करते रहते हैं:


सर्वे सुखिन: सन्तु, सर्वे सन्तु निरामया
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, माँ कश्चित दु:ख भाग भवेत.
                       (मनुस्मृति से साभार)

जिस नगरी में देवताओं को गुहार लगती हो, जहाँ लोग केवल राजनीति को धर्म नहीं समझते है, जहाँ स्त्री को माँ-बहिन तथा अन्य रिश्तों से भी पहचाना जाता है, जहाँ लोग एक दूसरे के सुख-दु:ख में हमेशा शामिल रहते हैं, जहाँ का पत्थर, सीमेंट के रूप में राष्ट्र के अनेक निर्माण कार्यों में पिछले नब्बे वर्षों से भी ज्यादा समय से सतत जाता रहा है, आज भी दिन-रात उत्पादन की प्रक्रिया जारी है, ऐसी पावन स्थली को शत शत नमन. प्रकृति ने जिस स्थान को इतना सुन्दर और समृद्ध बनाया है, इसकी गोद में मैं फिर फिर आना चाहूँगा.  
                               ***

7 टिप्‍पणियां:

  1. लाखेरी के बारे में जानकर अच्छा लगा। भगवान जिन्हें विविध स्थानों में रहने का अवसर प्रदान करता है वे सचमुच भाग्यशाली हैं, आप भी। हम तो पढकर ही संतुष्ट हैं।

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  2. असली पूजाघर तो ऐसे स्थल ही हैं। कम ही लोग हैं जो ग्लैमर के पर्दे के पीछे भी निगाह डालते हैं।

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  3. कर्म भूमि से अटूट लगाव, अन्य जानकारियां व् अभिब्यक्ति अदभुत हैं.

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  4. First time i have read your article. this is really great. You are superb. Please keep on writing.

    Regards.

    Pradeep Kumar Jain

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  5. chachaji ke dwara lakheri ke baare mai padkar bahut achcha laga. mai aath saal mumbai rahkar, vivash hokar vaapas lakheri aaya tha

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  6. Lakheri is place where I got an opportunity to function as 2nd in command for almost 9 years.Sentiments and emotional attachments of Lakherians are always rememberd.Shri Purushottam Pande ji and Shri Ravikant ji were the first to welcome me in the office the day I took charge.This is the place where my mother had a last breath @ +80yrs.age.Thanks to ACC Lakheri Hospital staff and a lady Narmada (Raw material unloading contract employee) who used to take care of my mother; that was the most difficult period as the expansion project was coming up,my family was away at Pune for children's higher education and my total attention was focussed in running the plant efficiently despite so many constraints!

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  7. Whenever I go down my memory lane I always have nostalgic feeling...loving and dedicated people without any religion,caste, creed, color, age etc there are no words to express about the place, people and life at Lakheri. Would love to visit again and again .one should experience and feel after visiting and staying there. The plant started journey in 1917 now completing a century. I think it is a good enough reason for all the people stayed and worked there to reach and celebrate 100 years of Lakheri plant. I was fortunate to be amongst the key organisers in 75 years celebration.

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