सोमवार, 3 सितंबर 2012

विग्रही

मैं विग्रही हूँ.
मैं अशांति का बेटा हूँ
मेरी माँ ने अनिश्चित काल तक
मुझे अपने गर्भ में ढोया है.
असह्य प्रसव वेदना पाई है.

मैं उत्तेजित हूँ,
आक्रोशित हूँ,
अनियमित भी हो गया हूँ.
क्योंकि मेरी माँ को बहुविध दौरे पड़ने लगे हैं.
जिससे सर्वत्र भ्रांतियां पैदा हो रही हैं.

मेरी मुट्ठी कसी हुई है,
मेरी मुट्ठी तनी हुई है,
इसके अन्दर कोई सिक्का नहीं है,
लेकिन इंकलाब का बीज जरूर है.
माँ चाहती है कि
शतरंजी विसात को उलट दिया जाये

शान्ति और विश्रान्ति की बात मत करो,
मुझे व्यवस्था बदलनी है.
इसमें क्या जायज है?
क्या नाजायज है?
उसकी सीख मत दो.

मैं क्रान्ति चाहता हूँ,
समानता, न्याय और सदाचार चाहता हूँ.
आन्दोलन मेरा धर्म है-
मुझको मेरा धर्म निभाने दो.
मैं विग्रही हूँ.

                  ***

5 टिप्‍पणियां:

  1. सोमवार, 3 सितम्बर 2012
    वर्तमान व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह का परचम उठाती है यह बंदिश ,आक्रोश को सुनिश्चित दिशा में ले जाती है .

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  2. कसमसाहट सी उठती है, इस अंधकार से निकल आने के लिये..

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  3. बहुत बढ़िया।

    बार-बार 'मैं' न लिखे होते तब भी काम चल जाता।

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  4. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार 4/9/12 को चर्चाकारा राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच http://charchamanch.blogspot.inपर की जायेगी|

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  5. बहुत खूब !

    क्राँति चाह रहे हैं
    बहुत से लोग यहाँ
    हर किसी को चाहिये
    क्राँति उसके अपने
    घर के दरवाजे तक!

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