शनिवार, 29 सितंबर 2012

चलो अपने गाँव चलें

मन अब भर चुका है
 डीजल और पेट्रोल के धुएं से
  खारा लगता है क्लोरीनी पानी
   ताजा पियेंगे अपने कुँए से
    चलो अपने गाँव चलें.

चाचा की भैंस ब्या गई है
 ऐसी चिट्ठी आई है
  मन करता है ‘खींच’ खाने को
   बेस्वाद लगता है ये पैकेट का दूध
    चलो अपने गाँव चलें.

नवरात्रियों में जागरण करेंगे
 जगरिये गायेंगे, डंगरिये नाचेंगे
  धान की मंडाई भी होनी है
   दीवाली नजदीक आई है.
    चलो अपने गाँव चलें.

कोल्हू अब लगने वाले हैं
 गन्नों की पिराई होगी
  प्यारी महक गुड़-राब की
   मन में कब से समाई है
    चलो अपने गाँव चलें.

यहाँ अब इंसानियत कहाँ रही?
 मिलावट ही मिलावट है
  रिश्तों में भी सियासत है
   वहाँ प्यार भरी सच्चाई है
    चलो अपने गाँव चलें.

सड़कें घर घर पहुँच गयी हैं
 नई हवा का दौर वहाँ है
  बचपन के सपने आते हैं
   आ लिपट मिलेंगे अनायास ही
    चलो अपने गाँव चलें.

            ***

12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर,
    सार्थक और सामयिक पोस्ट, आभार.

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (30-09-2012) के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    सूचनार्थ!

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  3. सुंदर रचना:

    गाँव तो बस
    सपने में आता है
    वैसे गाँव कोई नहीं
    जाना चाहता है
    गाँव दूर से बहुत
    सुंदर नजर आता है
    जिम्मेदारियाँ भी
    जुडी़ होती हैं
    कुछ लेकिन
    याद आते ही
    वो सब
    गाँव खट्टे अंगूर
    हो जाता है !!

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  4. गाँवों में अब बचा हुआ हो,
    जैसा छोड़ा देश हमारा।

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  5. सावन, कांवर, झूले, तीज, कजरी...आपने सबकी याद दिला दी सर जी .

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  6. गांव की मि‍ट़टी की खूश्‍बू आने लगी....बहुत सुंदर कवि‍ता..

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  7. पर आज कल ऐसे सपने वाले गावं कहाँ रहे ...गाँव भी थी शहरीकरण की भेंट चढ़ रहे हैं

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  8. "बचपन के सपने आते हैं-
    आ लिपट मिलेंगे अनायास ही
    चलो अपने गाँव चलें"

    वाह, बिसरे - भीगे ख्वाब .. फिर मचलने लगे.... आभार.

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