सोमवार, 12 सितंबर 2011

राज की बात

रामू भाई पढ़े-लिखे किसान थे. गाँव में उनकी बड़ी इज्जत थी. पंचायत या राजनीति पर उनकी बातों को सभी लोग बहुत महत्व देते थे. पर अपने घर में वे बाहर की बातों की चर्चा कभी नहीं करते थे. उनकी पत्नी भागवन्ती बड़ी सुशील थी, लेकिन उसको रामूभाई से हमेशा यही शिकायत रहती थी कि वे उसको कोई भी राज की बात नहीं बताते है. उसको रामूभाई की कई बातें बाहर वालों के मार्फ़त सुनाई पड़ती थी.

एक दिन जब वह रामूभाई से प्यार भरे दु:ख-सुख की बातें कर रही थी तो बोली, “आपने मुझ से कभी प्यार नहीं किया. अगर आपके दिल में मेरे लिए ज़रा भी प्यार होता तो कोई भी राज की बात मुझसे नहीं छुपाते.”

रामूभाई को विश्वास था कि औरतों के पेट में बात अटकती नहीं है इसलिए वह तमाम बातों का जिक्र पत्नी से करना उचित नहीं समझता था. पत्नी की उलाहना सुन कर वह थोड़ी देर सोचता रहा और फिर बोला, “ठीक है, तू वायदा कर कि जो भी गुप्त बातें मैं तुझको बताऊँगा तू किसी को नहीं बताएगी.”

भागवन्ती ने गले पर हाथ लगाकर कसमियाँ स्वीकारोक्ति की कि वह उसकी गुप्त बातें कभी किसी को नहीं बताएगी.

“ठीक है, आइन्दा तुझे कोई शिकायत नहीं रहेगी.” इस प्रकार भागवन्ती खुश हो गयी.

उक्त बातचीत के ठीक तीन दिन बाद रामूभाई बीमार पड़ गया. पेट दर्द की शिकायत लेकर बिस्तर पर लोट-पोट होने लगे. भागवन्ती की खूब परेड हो गयी. कभी पुदीन-हरा, कभी हरड़, कभी गुड-अजवाइन तो कभी मीठा सोडा लेकर आई और रामूभाई के इर्द-गिर्द घूमती रही. दर्द् कम होने का नाम नहीं ले रहा था. रामूभाई लोटा लेकर दिशा जंगल गए और लौट कर आकार बोले, “दर्द में तो आराम हो गया है पर....”

भागवन्ती ने उत्सुकता से पूछा “पर क्या?”

“अरे! तू किसी को बता मत देना मेरे पाखाने में कौवे का पंख निकला है.” ये कह कर रामूभाई चुपचाप सो गए.

भागवन्ती को मगर रात भर नींद नहीं आई. ये सोचती रही कि मुन्ने के पापा के पेट मे कौवे का पंख घुसा तो कैसे घुसा? सुबह सवेरे पानी भरने कुवें पर गयी तो सोनू की माँ मिल गई. बहुत बोलने वाली भागवन्ती को चुपचाप व उदास देख कर बोली, “क्या बात है बहिन जी! आज चेहरा लटका हुआ है, क्या तबियत खराब है?”

भागवन्ती धीरे से बोली “नहीं बहिन, मेरी तो तबीयत ठीक है पर मुन्ने के पापा की ठीक नहीं है.”

क्यों क्या हुआ” सोनू की माँ ने पूछा.

भागवन्ती बोली “ कोई विशेष बात नहीं है.” 

जब सस्पेंन्स बढ़ गया तो सोनू की माँ और निकट आ गयी बोली, “मैं कोई पराया थोड़े ही हूँ. अगर तू अपना कष्ट नहीं बताएगी तो वह कैसे कम होगा? दर्द तो बांटने से ही कम होता है.”

“तो, तू कसम खा. किसी को बताना मत.” भागवन्ती ने रुआँ से स्वर में कहा.

“तू जिसकी चाहे कसम ले ले. तेरी बात मैंने आज तक किसी को बताई है क्या?”

इस पर भागवन्ती ने कान के पास जाकर धीरे से कहा, “क्या बताऊँ, मुन्ने के पापा की लैट्रिन में कौवे के पंख निकले है.”

बात जंगल की आग की तरह सुलग गयी. सोनू की माँ घर जाकर अपने सोते हुए पति से बोली “अजी सुनते हो ! भागवन्ती बता रही थी कि उसका पति बहुत बीमार है, उसके पेट में से खूब कौवे के पंख बाहर आ रहे है.”

सोनू के पापा को जैसे बिच्छू काट गया, तुरंत उठा और अफ़सोस करने लगा.”कौवा निकला है तो ये तो बहुत गंभीर बात है. पूरे गाँव के लिए अपशकुन हो सकता है.”

तुरंत ही वह तैयार हो कर वह गाँव के जिम्मेदार लोगों को बताने निकल पड़ा. एक दहशत सी लोगों में हो रही थी. पड़ोस रहने वाले देबू ने सबको बताया कि उसने कल रामूभाई के सामने वाले छप्पर पर नौ कौवे बैठे हुए देखे थे अब बात ज़रा सीरिअस हो गई. अंत में मशविरा हुआ कि सबसे पहले चल कर रामूभाई की तबीयत पूछी जाये.

वे सब लोग रामूभाई के आँगन में पहुचे तो रामूभाई अन्दर से निकले बोले, “क्या बात है भाई लोगों, आज सबेरे-सबेरे कैसे आना हुआ?”

सोनू के पापा ने पूछा, “भैया एक बार में कितने कौवे निकल रहे हैं?”

रामूभाई ने भागवन्ती को आवाज लगाई और कहा, “इनको बता कि अभी तक कितने कौवे निकल चुके हैं.”

***

4 टिप्‍पणियां:

  1. हा हा ...मज़ेदार कहानी!!! हमारे घर में उल्टा होता है. मेरी मम्मी मेरे पापा को राज की सारी बातें नहीं बताती :D

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  2. हहहहा... बहुत मज़ा आया पढ़कर...
    और पहली बार आपके ब्लॉग में आकर भी... :)

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