गुरुवार, 22 सितंबर 2011

साबूदाने का भाव

किशोरीलाल गुप्ता की सदर में परचून की एक भरी-पूरी दूकान है. आधी से भी ज्यादा जिंदगी इसी में निकल गयी. दो बेटियाँ थी समय पर शादी कर दी, ससुराल चली गयी. श्रीमती गुप्ता घर पर अकेली रह गयी इसलिए समय निकाल कर गुप्ता जी वक्त-बेवक्त घर चले आते थे. ताकि घरवाली ज्यादे अकेले ना रहे. घर भी उनका काफी पुराना है. हमेशा नए घर का प्लान बनाते, फिर सोचते क्या करेंगे नया घर बना कर? दो ही प्राणी है. आराम से रह रहे है. बड़ा घर होगा तो पत्नी के लिए और काम बढ़ जाएगा. घर की दीवारें पत्थर-गारे की बनी है. हाँ छत उन्होंने पत्थर के चौड़े पटले डलवाकर मजबूत बनवा रखी है.

बैंक आने-जाने में तथा वहाँ लाइन लगाने की परेशानी की वजह से वे अपनी रोकड़ घर में ही छुपाकर रखते आ रहे थे. वैसे पिछले ३० वर्षों में कभी कोई चोरी-चकारी उनके घर में हुई भी नहीं. यद्यपि घर की सिचुएशन ऐसी है कि यहाँ का हल्ला-गुल्ला पड़ोसियों को नहीं सुनाई दे सकता है.चहारदीवारी से पूरी तरह सुरक्षा का भाव था. एक बार एक कुत्ता जरूर पाला था, पर वह ऐसा ही साधारण रोडेशियन था. राह चलतों को काटने लगा तो भगा दिया.

गर्मियों के दिन थे. दिनभर लू की तपन रहती थी. शाम होते-होते कुछ ठंडक हो जाती थी. श्रीमती गुप्ता पानी छिड़क-छिड़क कर और अच्छा कर लेती थी. घर के अन्दर तो गर्मी के मारे ठहराना मुश्किल होने लगा था. आँगन में दो खाटें डाल कर दोनों मियाँ-बीवी तान कर सोते थे. हवा चलती तो नींद भी बड़ी सुखकर आती थी.

एक बार आधी रात के बाद श्रीमती गुप्ता की आँख खुली. घर में कुछ खटपट होने का आभास हुआ. उसने धीरे से गुप्ता जी को हिलाया और खतरे के सूचना दी. गुप्ता जी उठ बैठे और तुरन्त बनियाबुद्धि का प्रयोग करते हुए बोले, अरे ले जाता है तो ले जाने दे. आजकल सोने-चांदी को कोई नहीं पूछ रहा है. तू तो ये बता वो साबूदाने का थैला कहाँ रखा है?

ये बात इतनी ऊंची आवाज में कही गयी कि अन्दर वाला व्यक्ति भी सुन ले. वास्तव में अन्दर एक चोर घुसा था और बाहर की वार्तालाप पर भी उसने कान लगा रखा था.

श्रीमती गुप्ता बोली, घर में इतना सामान पड़ा है आपको साबूदाने के थैले की पडी है.

गुप्ता जी ने कहा, तुमको मालूम नहीं, जब से लड़ाई लगी है, साबूदाने का भाव ५००० रुपया तोला हो गया है. कहाँ रखा है थैला?

रसोई में ड्रम के बगल में रखा है, श्रीमती गुप्ता ने कहा.

थोड़ी देर रुक कर गुप्ता जी ने खांस कर व हल्ला जैसा कर के किवाडों को खटखटाया, ताला खोला, अन्दर गए तो देखते क्या है कि घर के पिछवाड़े की दीवार तोड़ कर घर में घुसने का रास्ता बना रखा है. दोनों जनों ने छानबीन  करके पाया कि साबूदाने के थैले के अलावा सभी कुछ सुरक्षित अपने स्थान पर था.

गुप्ता जी ने पत्नी से कहा, घर में बहुत सारा रुपया रखा है कल ही बैंक में रख आऊँगा. अगले दिन गुप्ता जी ने घर की मरम्मत करवाई, रूपये बैंक में डाले और दोपहर बाद से नियमित दूकान खोल ली.

उधर चोर साबूदाने का ५ किलो का थैला पाकर बहुत प्रसन्न और उत्साहित था. अगले दिन दूसरे शहर में बेचने के लिए निकल पड़ा पर जहाँ भी भाव पूछता ४०-५० रुपया प्रति किलो से ज्यादा देने को कोई राजी नहीं था. उसने कई दूकानदारों को बताया कि जब से लड़ाई लगी है, साबूदाने का भाव हजारों में चल रहा है. पर सब उसका मखौल उड़ाते थे. थोड़े दिनों के अंतराल में चोर ने सोचा कि साबूदाने का पैकिंग थैला बदल कर सदर बाजार में गुप्ता जी को ही बेचना ठीक रहेगा क्योंकि उसको साबूदाने का बाजार भाव मालूम है. सो वह सीधे उनकी दूकान पर गया बोला, सेठ जी साबूदाना खरीदोगे?

गुप्ता जी ने उसको प्यार भरे निगाहों से देखा और आदर पूर्वक बिठाया. बोले, अरे, तू ही था क्या? थैला क्यों बदल लाया? कीमत तो उसी थैले की थी. इतना कह कर वे हँस पड़े और चोर शर्मिन्दा होकर निकल लिया. गुप्ता जी ने साबूदाने का थैला ठीक से संभाल कर रख लिया.

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1 टिप्पणी:

  1. Namaskaar,,Many congratulations for 'Jaale'. I have read all the pieces of stories,you are really a great writer."Apke anubhaun ki maala ati sundar, rochak evam maarmik hai". Keep it up, we will gain some drops from your sea,which will be very joyfuller for all of us....'Kewal'

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