शनिवार, 17 सितंबर 2011

गोल्ज्यू का वरदान

बागेश्वर एक तीर्थ है, जहाँ साक्षात् कैलाशपति विराजते हैं ऐसी मान्यता है. सरयू व गोमती का संगम होता है, और सरस्वती की परिकल्पना की जाती है कि वह लुप्त है.

पंडित बद्रीदत्त पांडे, जिन्होंने ‘कुमायू का इतिहास’ लिखा है, ने विस्तार से बागेश्वर की महिमा का वर्णन किया है. आस-पास पर्वतमालाओं का आलेख भी इसमें है.

पश्चिम दिशा में खड़ी-धार पहाड़ी, विनसर वाली पर्वत-श्रंखला का उत्तरी किनारा है. सामने चीड़ का ऊंचा जंगल ‘कुकुड माई का डाना (पहाड़)’ है वहाँ से दृष्टि डालिए तो समुद्र ताल से ४५०० फीट की ऊंचाई पर बसा एक गाँव नजर आता है नाम है जौलकांडे. जिसकी बसावट सैकड़ों साल पुरानी है. वहां २०-२५ घर थे. अधिकतर खेतिहर ब्राह्मण परिवार थे. गाँव के चारों ओर बांज, फयाँठ, चीड, तूनी, क्वेराला के पेड़ रहे है. हिसालू, किलमोड़ी, काफल, तिमिल, बेडू, जैसे जंगली फल भी धौल के झाड़ियों के साथ बहुतायत में यहाँ उगते रहे है. आज भी गाँव में आडू, खुबानी, आलूबुखारा, नींबू, गलगल, नाशपाती के अनेक पेड़ लगाए जाते हैं.

उत्तर दिशा में गाँव का मुख है. उत्तुंग धवल हिमालय अंधियारी रातों में भी दमकता दीखता है. जापान की मिसाल दें तो सबसे पहले सूर्योदय इसी गाँव में होता है क्योंकि यह ऊंचाई पर स्थित है. अन्य पहाड़ी गाँव की तरह यह भी स्वावलंबी गाँव रहा होगा, पर अब बाजारीकरण हो गया है. पढ़े-लिखे परिवार सब बाहर निकल गए हैं, या निकल रहे है. गर्मियों में पानी की कमी हो जाती है क्योंकि ऊंचाई के कारण जल-श्रोत सूखने लगते हैं.

गाँव में पुरोहित चामी गाँव से आते रहे हैं. चामी में कर्म-कांडी वृत्ति वाले पांडे लोग रहते हैं. ये उनका पुस्तैनी कार्य रहा है, आज भी है.

यह कथा अब से सौ वर्ष पुरानी है. पंडित कुलोमणि पांडे एक बालक का उपनयन संस्कार करने हेतु आये थे. आजकल तो लोग जनेऊ कराने का दस्तूर भर करने लगे हैं, पर तब ऐसा नहीं था. यह सोलह संस्कारों में एक अहम संस्कार होता है. बालक का नाम था भागीरथ. भागीरथ नाम भी पंडित कुलोंमणि ने ही नामकरण संस्कार के समय बालक के कानों में सर्वप्रथम शंख कान पर लगाकर सुनाया था. उन्होंने तब रघुवंशी भागीरथ की कथा उपस्थित लोगों को सुनाई थी, आज फिर सुनाई. बच्चे बड़े सभी ने आनंद से कथा को सुना.

बालक भागीरथ के मन में कुछ बड़ी हिलोरें चल रही थी. वह सोच रहा था कि उसके गाँव में भी यदि गंगा अवतरण हो जाता तो पानी की समस्या हल हो जाती. उसने मन ही मन सोचा कि वह भी तपस्या करेगा. अगले दिन से वह ग्राम देवता गोल्ज्यू के थान (छोटा सा मंदिर) पर जाता १०-१५ मिनट तक एक पैर पर खड़ा रह कर प्रार्थना करता, “भगवान मेरे गाँव में भी गंगा दे दो.” कई दिनों तक ये क्रम चलता रहा. निष्कपट, भोला, व आस्थावान बालक की नित्य प्रार्थनाएं सुनकर सचमुच एक दिन श्वेत वस्त्रधारी गोलू देवता श्वेत अश्व पर विराजमान साक्षात प्रकट हो गए.

उन्होंने बालक से प्रसन्नता पूर्वक पूछा, “क्या चाहिए भागीरथ?”

भागीरथ उनकी उपस्थिति से एकाएक भोंचक्का रह गया, बोला, “गंगा चाहिए.”

गोल्ज्यू ने फिर पूछा, “कुछ और भी चाहिए?”

“सरस्वती चाहिए,” बालक ने कहा.

गोल्ज्यू ने फिर से पूछा, “और कुछ?”

भागीरथ ने कहा, “और कुछ नहीं चाहिए.”

गोल्ज्यू ने कहा, “जो तू मांग रहा है वह तुझे अवश्य मिलेगी पर सब तरफ ढाल है रुकेगी नहीं.” इसके बाद “तथास्तु” कह कर गोलू देवता घोड़े सहित अंतर्ध्यान हो गए.

बालक खुश हो गया. वह आश्वस्त था कि भगवान ने जो कहा वह गलत नहीं हो सकता है. उसको एक बात का मलाल रहा कि वह गंगा के आने के समय पर बात नहीं कर पाया. अब सब काम अपने समय से ही होगा ये सोच कर बात आगे बढ़ गयी. भागीरथ जवान हो गया. गंगा वाली बात आई गयी हो गयी. पर भगवान ने जो कहा है वह तो होना ही था. भागीरथ का विवाह हुआ, पत्नी का नाम था गंगा. दो वर्ष बाद उसको एक पुत्री प्राप्त हुई, नाम पड़ा सरस्वती. इस प्रकार गाँव में गंगा और सरस्वती दोनों आ गयी. देवता का कहा असत्य नहीं हो सकता है.

ये तो था दृष्टांत.

अब इसका दार्ष्टताँत प्रत्यक्ष में आज इस गांव के अनेक डिग्रीधारी, डाक्टरेट किये हुए लोग बाहर दुनिया में फैले हुए हैं, कोई जलशास्त्र में, कोई अर्थशास्त्र में, कोई आरोग्यशास्त्र में, कोई शिक्षा-शास्त्र में तो कोई व्यवहार-शास्त्र में पारंगत है. ये सब गोल्ज्यू का आशीर्वाद है. गंगा-सरस्वती की धारा वहाँ रुके या ना रुके पर वहाँ से बह  जरूर रही है.

***

1 टिप्पणी:

  1. आपका यह प्रस्तुतीकरण ज्ञानवर्धक है और मुझे अपने प्रिय कुमा-उनी पहाड़ियों के विषय में बोध कराता है...
    शब्दों का जाल बिछाना देवताओं को हमेशा से आता है...एक बालक की सामान्य सी सब का भला करने की इच्छा को
    देवता ने किस प्रकार पूर्ण किया, अचंभित कर देती है !

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