मंगलवार, 20 सितंबर 2011

यादें (आत्म-कथा से )

२० सितम्बर मेरे स्वर्गीय पिता श्री प्रेमवल्लभ पाण्डेय की पुण्यतिथि है. आज ही के दिन सन १९८० मे वे हमसे हमेशा के लिए विदा हुए थे.
 
सन १९५५ में मेरे पिता ने अपने पैतृक गाँव गौरीउडियार की जमीन-मकान बेच दिया था और गरुड़-बैजनाथ के पास सैण (मैदान) कत्यूर में १५ नाली सेरे की जमीन खरीदी. स्यालटीट-मटेना में एक छोटा सा दुमंजिला घर बनवाया. वे अध्यापक थे. प्रगतिशील विचारों वाले और दूरदर्शी भी थे. उन्होंने अपने बच्चों के भविष्य के बारे में अच्छा ही सोचा था. दरसल इस स्थानान्तरण के पीछे और भी अनेक कारण थे. उन्होंने अपनी नौकरी की बदली भी नजदीक में गागरीगोल विद्यालय में करवा ली.

परिवार का ये माइग्रेशन हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के शरणार्थियों की तरह ही कष्टदायक व असुविधापूर्ण रहा. ये स्थान गौरीउडियार से करीब १५ मील दूर था, लेकिन नजदीक का रास्ता पहाड़ लांघ कर बनता था. हाउस-होल्ड सामान ढोने-ढुलवाने में पिता जी आधे रह गए थे. मैं तब इंटर फाईनल में कांडा में पढता था. मुझे तो सब जमा-जमाया मिला. ५ भाइयों में मेरे पिता सबसे छोटे थे इसलिए दादी हमारे साथ रहती थी. कहते हैं कि इस स्थानांतरण की प्रेरणा दादी ने ही दी थी. क्योंकि उस गाँव का सामाजिक व्यवहार बहुत बिगड़ा हुआ था. आपस में कलह, दुश्मनी, चोरी-चकारी बहुत होने लगी थी; अन्यथा कई मायनों में वह गाँव आदर्श था.

नए गाँव का नाम स्यालटीट-मटेना था. स्यालटीट का शाब्दिक अर्थ है, सियारों का मैदान. सियार तो वहाँ आज भी बहुतायत में एक साथ मिलकर हूटर बजाते हैं. पिता जी ने अपने सपनों का घर बनाते हुए, घर के आस-पास अनेक फल-फूलों के पौंधे लगाए. नाशपाती, आलूबुखारा, आडू, केला, अखरोट व नीबू प्रजाति के गलगल, चकोतरा तथा माता ककड़ी के पेड़ थे. गूल से सीधे हौज में पानी लाने की व्यवस्था भी कर रखी थी. कत्यूर के लोग शाक-सब्जी नहीं उगाते थे पिता जी ने सब्जी उगा कर सबको बता दिया कि मेहनत करने से सब कुछ हो सकता है.

मैं कालांतर में दिल्ली विश्वविद्यालय होता हुआ नौकरी में राजस्थान में कोटा के निकट लाखेरी चला गया. पिता जी १९७० में प्रधानाध्यापक के पद से रिटायर हो गये. छोटा भाई बसंतबल्लभ (जो वर्तमान में एक कालेज प्रिंसिपल है) गनाई-गंगोली में अध्यापक हो गया था. हम दोनों बेटों से पिता जी का नियमित संवाद पत्र द्वारा हर सप्ताह होता रहता था. 

जिस जगह पर हमारा घर बना था वहाँ दीमकों का जबरदस्त प्रकोप था. जिसका कोई स्थाई इलाज पिता जी को मालूम न था. इस कारण वे बहुत दु:खी रहते थे. दीमक ने घर की छत तक की लकड़ी चट कर डाली थी और मिट्टी गिरती रहती थी. गर्मियों की छुट्टियाँ होने पर मैं अपने बीबी-बच्चों सहित घर आ जाता था. इसी तरह बसंत की भी छुट्टियाँ होती थी तो सारा परिवार मिलता था.तीनों बहिनें भी नजदीक के गाँवों में क्रमश: मोतीसारी. तिलसारी व सिल्ली में ब्याही गयी थी. इस पैराडाईज में हम सब कुटम्बीजन मिलन व स्नेह का जो आनद पाते थे उसका मैं आज शब्दों में वर्णन नहीं कर सकता हूँ.

जून में पहाड़ में वर्षा हो जाती है और हमारी छत दीमक के नुकसान के कारण जगह-जगह से टपकने लगती थी. मैं पिता जी की आँखों में तब असह्य वेदना देखा करता था. ठीक बच्चों का घर आना, वर्षा का होना और छत का टपकना. मकान के उपरी मंजिल के बांसे-डंडे तो उन्होंने दो तीन बार बदलवा डाले थे किन्तु पहली मंजिल पर जो मोटा भराणा था वह नहीं बदला जा सका, हाँ सुरक्षा के लिए गोठ के बीच में पत्थरों का एक स्तंभ दे दिया गया था. फिर भी एक बड़ा हादसा हो गया. कि एक शाम जब मेरी माँ बसंत के एक वर्षीय पुत्र हेम को गोद में लेकर अंगीठी सेक रही थी तो उस जगह पाल बैठ गयी. माँ हेम सहित नीचे भैस के खूंटे पर जा गिरी. पिता जी को बहुत देर में समझ में आया कि हुआ क्या था ? अन्यथा वे भयभीत हो गए कि कहीं बाघ उठाकर न ले गया हो.

भैस ने बड़ी समझदारी रखी कि कोई शारारिक क्षति दादी-पोते को नहीं हुई. हाँ मेरी माँ, जिसकी प्राकृतिक मृत्यु बाद में सन १९९७ में हुई, आखिर तक कहती थी क़ि खूंटे से उसकी कमर पर जो आघात हुआ उसका दर्द उसे सालता था.

पिता जी की मृत्युपरांत माँ हमारे साथ रहने लगी पर ज्यादा समय उसने बसंत के परिवार के साथ शांतिपुरी में बिताया.

हम पाँचों भाई-बहनों के विवाहोत्सव इसी घर में हुए. अब वह प्यारा सा पिता जी के सपनों का घर छूट गया है और टूट भी गया है. हम दोनों भाई हल्द्वानी आ बसे हैं.

                                   ***

1 टिप्पणी:

  1. its really great tau ji..aapane to ghar ki puri yad dila di.mujhe wo din to yaad nahi jo maine waha gujare the; han par jagah achhe se yaad hai,chhutiyon main jate the to in nashpati,aaru or neebu ke peron ke charo or khelate the.

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