मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

कर्मन की गति न्यारी

जिलाधिकारी बी.आर. तेजस्वी साहब की बैठक में कबीर का लिखा तथा अनूप जलोटा का गाया यह भजन अकसर गूंजा करता है:

कबीरा जब पैदा भये, जग हँसे हम रोये;
ऐसी करनी कर चलो, हम हँसे जग रोये.

यद्यपि जब तेजस्वी साहब पैदा हुए थे तब कोई हँसा नहीं था क्योंकि प्रसव-पीड़ा न सह पाने की वजह से उनकी माँ रामप्यारी अपने नाम को सार्थक करते हुए सचमुच भगवान को प्यारी हो गयी थी. बाप हरिनाथ इस दुर्घटना से पागल हो गया था और अनियंत्रित होकर कहीं चला गया. कहाँ गया, उसका आज तक पता नहीं चला. ऐसे में अनाथ बच्चे को उसके मामा-मामी ने पाला, पाला क्या, पालना पड़ा. उनकी आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी. थोड़ी सी जमीन थी जिससे गुजारा पूरा नहीं हो पाता था. इसलिए दूसरों के खेतों में मजदूरी करके काम चलाते थे.

मामा-मामी के दो जुड़वां बेटे रामू और श्यामू पहले से थे इस बच्चे का कायदे से कोई नामकरण संस्कार तो हो नहीं सका, हाँ, विपत्ति को साथ लेकर आया था इसलिए उसे 'बिपत्तू' पुकारा जाने लगा. बिपत्तू अभावों में पलकर, बड़ा होने लगा. ग्राम सभापति ने जोर देकर कहा कि “इस बच्चे को भी स्कूल भेजा करो,” सो एक दिन मामा जी उसे साथ लेकर नाम लिखाने ले गए. दुर्जनसिंह मास्टर ने बिना अपना दिमाग लगाए ही नाम लिख दिया, बिपत्ति राम. अगर वह चाहते तो उस वक्त कोई प्यारा सा, अच्छा सा नाम किसी राष्ट्र नायक या देवता के नाम पर आधारित लिख सकते थे, पर दुर्जनसिंह को अपने अटपटे नाम की शिकायत नहीं थी तो दूसरों पर करम करने की जुर्रत क्यों समझते. इस प्रकार बालक के भविष्य पर ‘बिपत्ति राम’ नाम की बुनियादी मोहर लगा दी गयी.

यह तो भला हो हाईस्कूल के प्रिंसिपल दयानिधि जी का, जिन्होंने सोचा कि भविष्य में कोई ठीक सा उपनाम पहचानसूचक रिकॉर्ड मे दर्ज कर दिया जाये. लड़का पढ़ने लिखने में बुद्धिमान और कुशाग्र था सो अपने मन से ही उन्होंने उसको ‘तेजस्वी’ बना दिया.

बिपत्ति राम तेजस्वी किसी रेगिस्तान में उगे हुए कैक्टस पर खिले सुन्दर पुष्प की तरह अपनी अलग पहचान बनाते चला गया. हायर सेकेण्डरी की बोर्ड परीक्षा में प्रथम आने पर वह सबकी नज़रों में आ गया. वजीफा भी मिलने लगा. क्षेत्रीय विधायक महोदय ने अपने इलाके के इस होनहार विद्यार्थी को सब प्रकार की सलाह व आर्थिक सहायता देकर आगे बढ़ने के लिए बहुत उत्साहित किया. जब इन्सान के अच्छे दिन आते हैं, तो सब तरफ से मार्ग खुलते चले जाते हैं.

सही सोच व अध्यवसाय की बदौलत नौजवान तेजस्वी भारतीय प्रशासनिक सेवा में भी चयनित हुए. वे अब एक आकर्षक, आदर्श व्यक्तित्व वाले अधिकारी हैं.

आजकल वे अपने मामा-मामी के घर से बहुत दूर जरूर हैं, पर दिल से बहुत नजदीक हैं. अपने पर किये उनके जीवनदायी अहसानों को वे याद करते रहते हैं. खुद को वे उनका तीसरा बेटा कहलाना पसन्द करते हैं और पारिवारिक हितों की पूरी तरह देखरेख करते हैं. उधर रामू और श्यामू दोनों ही पढ़ाई में फिसड्डी रहे. अत: आगे नहीं बढ़ सके. अब मामा जी की पहचान उनके भानजे बी.आर. तेजस्वी के नाम से होने लगी है. उसी की वजह से वे पूरे गाँव-इलाके में सम्माननीय हो गए हैं.

सार्वजनिक जीवन में भी तेजस्वी जी का दृष्टिकोण आम प्रशासनिक अधिकारियों से भिन्न है. फालतू दिखावे से दूर गरीब अनाथों के लिए वे सदैव चिंतित रहते हैं.

जब हम भाग्य और कर्मों के बारे में बात करते हैं तो परमात्मा की अदृश्य व्यवस्थाओं पर विश्वास करना पड़ता है.
***

7 टिप्‍पणियां:

  1. ईश्वर कब किसको क्या देता है इसका कोई आंकलन नहीं लगा सकता .... आईसु घटनाओं पर मुझे प्रेमचंद की कहानी प्रारब्ध याद आती है ।
    आपको अपने ब्लॉग पर देख कर सुखद आनुभूति हुई ....आभार

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  2. परमात्मा की योजना कहाँ किसी को ज्ञात रहती है।

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  3. आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (13-02-13) के चर्चा मंच पर भी है | जरूर पधारें |
    सूचनार्थ |

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  4. बिपत्ति राम तेजस्वी किसी रेगिस्तान में उगे हुए कैक्टस पर खिले सुन्दर पुष्प की तरह अपनी अलग पहचान बनाते चला गया. हायर सेकेण्डरी की बोर्ड परीक्षा में प्रथम आने पर वह सबकी नज़रों में आ गया. वजीफा भी मिलने लगा. क्षेत्रीय विधायक महोदय ने अपने इलाके के इस होनहार विद्यार्थी को सब प्रकार की सलाह व आर्थिक सहायता देकर आगे बढ़ने के लिए बहुत उत्साहित किया. जब इन्सान के अच्छे दिन आते हैं, तो सब तरफ से मार्ग खुलते चले जाते हैं.

    ऊधौ कर्मन की गति न्यारी ....
    ऊधौ कर्मन की गति न्यारी ....

    कसावदार भाषा और जीवंत परिवेश बुनती हैं आपकी सच्ची कहानियां .

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  5. बी.आर. तेजस्वी जी ने आश्‍चर्यचकित कर दिया।

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  6. आपकी सभी लघु कथाएँ मार्मिक है.सुन्दर रचनाओं के लिए हम आपके आभारी है.

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