सोमवार, 18 फ़रवरी 2013

दूध की कीमत

सत्यनारायण शर्मा के दिवंगत होते ही परिवार की सत्ता बड़े बेटे डॉ. रामदत्त शर्मा के पास आ गयी. बेटे की धारणा थी कि पिता जी की पगड़ी उसे पहना दी गयी है इसलिए घर पर सारे आदेश उसी के क्रियान्वित होंगे. उसने बचपन से ही देखा था कि पिता जी किस हेकड़ी के साथ रहते थे और हर बात में अपनी ही चलाते थे, लेकिन उसने कभी यह नहीं देखा कि माँ लाजवंती उनके मनमाने व्यवहार पर कह कुछ नहीं पाती थी, अन्दर ही अन्दर कुढ़ती-उबलती रहती थी. अब बाप के मरते ही बेटा भी उसी अंदाज में आँखें तरेर कर बात करने लगा तो उसके अन्दर छुपी हुई नारीशक्ति विद्रोह करने लगी.

शर्मा परिवार मूल रूप से पुराने आगरा शहर के लोहा मंडी इलाके के रहने वाले थे. वहाँ उनका एक पुश्तैनी मकान भी है, जो अब जर्जर हालत में है. सत्यनारायण अपनी जाति जांगिड ब्राह्मण बताते थे, पर उनका खानदानी पेशा खाती (लकड़ी की कारीगरी) रहा है. राजस्थान के सवाईमाधोपुर में डालमिया सेठ के दामाद का एक बड़ा सीमेंट का कारखाना था तो वहाँ आकर नौकर हो गए. जिंदगी ने एक रफ्तार पकड़ ली. कॉलोनी में एक कमरे वाला क्वार्टर भी मिल गया. इसी घर में लाजवंती ने पहले रामदत्त को जन्म दिया और उसके लगभग पन्द्रह सालों के बाद विजयप्रकाश का जन्म हुआ.

लाजवंती अनपढ़ होने के बावजूद एक संजीदा गृहणी थी, कॉलोनी की महिलाओं में आदरणीय थी क्योंकि उसमें गाना-बजाना, नाचना व कौतुक करने के कई गुण थे. सभी शुभ अवसरों पर उसकी उपस्थिति याद की जाती थी. पति सत्यनारायण स्वभाव से टेढ़ा व रूखा होने के कारण कभी कभी उसे मन मसोस कर रहना पड़ता था, पर इसे भाग्य की विडम्बना समझ कर आम भारतीय स्त्री की तरह सहती जाती थी.

रामदत्त को बड़े प्यार-दुलार व आशाओं के साथ बड़ा किया. वह ठीक ही पढ़ रहा था. इंटर करने के बाद उसे जयपुर के एस.एम.एस. मेडिकल कॉलेज में प्रवेश भी मिल गया. तब पी.एम.टी. की परीक्षा नहीं होती थी. माँ तो माँ होती है, बहुत खुश हो गयी कि बेटा डॉक्टर बनेगा. मिलने जुलने वालों की बधाइयाँ स्वीकार करती और अपने आप पर गौरव करती थी. सत्यनारायण की बात और थी, वह अपने स्वाभव व औकात के अनुसार ओछेपन पर आ गया क्योंकि उसकी बराबरी के कर्मचारियों में से किसी का बेटा अब तक M.B.B.S. डॉक्टर नहीं बन सका था. यह सही था कि एक साधारण परिवार का सपना सच हो रहा था.

पढ़ाई व इंटर्नशिप पूरी होने के बाद, सवाईमाधोपुर के सीमेंट मैनेजमेंट ने डॉ. रामदत्त शर्मा को कारखाने के अस्पताल में बतौर मेडिकल ऑफिसर की नियुक्ति भी दे दी. बड़ा घर मिल गया, अब परिवार बड़े लोगों का परिवार हो गया. डॉक्टर की शादी कर दी गयी. बहू आगरा से ही सजातीय व पढ़ी-लिखी लाई गयी.

सत्यनारायण शर्मा अपने रिटायरमेंट के करीब थे. एक दिन ड्यूटी से घर लौटते समय उनकी साइकिल को एक ट्रैक्टर वाला टक्कर मार गया और उनकी आकस्मिक मृत्यु हो गयी. इससे परिवार के सभी समीकरण बदल गए. बेटा हाकिमों की तरह व्यवहार करने लगा तो बहू मालकिन की तरह बोलने लगी. नतीजन सास-बहू में तकरार होने लगी.
इसी बीच जब अपने प्रबंधन की कमजोरियों के कारण कारखाना बंदी के कगार पर आ गया तो डॉ.रामदत्त नौकरी छोड़ कर अपनी पत्नी सहित विदेश (ओमान) चला गया. भाई विजय तब पढ़ ही रहा था. लाजवंती विजय को साथ लेकर कोटा शहर में आकर रहने लगी. पति की ग्रेच्युटी-फंड से महावीर नगर में एक जमीन का प्लाट खरीद लिया. उस पर एक छोटा सा घर बनवाने लगी. हिम्मत इस बात से भी थी कि बड़ा बेटा खाड़ी देश में रह कर खूब रूपये कमा रहा था और वक्त-बेवक्त रूपये भेज भी रहा था.

विजयप्रकाश ने जब बी.ए. कर लिया तो कोटा में ही एक कारखाने में स्थाई क्लर्क की नौकरी भी मिल गयी.

आठ साल तक ओमान में काम करने के बाद जब डॉ. रामदत्त शर्मा कोटा लौटा तो अपनी माँ से अपने भेजे रुपयों का हिसाब माँगने लगा. बुढ़िया लाजवंती को उससे ऐसी उम्मीद कतई नहीं थी उसने एक ही वाक्य में बेटे को निरुत्तर कर दिया, “तू पहले, मेरे उस छाती के दूध की कीमत अदा कर जो मैंने तुझे पिलाया था.” बहरहाल जब आदमी पर स्वार्थ हावी होता है तो सारे तर्क बेमानी हो जाते हैं. बेटा पूरी तरह बहू के कहने पर था. प्रकृति से भी स्वार्थी व उजड्ड था बोला, “दूध तो सभी माएं अपने बच्चों को पिलाती हैं. यह मकान मेरे रुपयों से बना है, इसे खाली कर दो. मैं इसमें अपनी क्लीनिक चलाऊंगा.”
झगड़ा, मनमुटाव बढ़ता गया. ऐसा नहीं था कि डॉक्टर के पास रुपयों की कमी थी या वह दूसरा मकान नहीं खरीद सकता था, पर हेकड़ी और स्वार्थ ने उसे अन्धा बना दिया था. वह माँ तथा भाई प्रति अपने सारे कर्तव्य भूल गया. स्थिति यहाँ तक बिगड़ गयी कि वह अपने छोटे भाई विजय के विवाहोत्सव में भी शामिल नहीं हुआ.

कुछ परिचीतों/मित्रों के बीच में आने के बाद समझौता हुआ कि डॉक्टर निचली मंजिल पर अपनी क्लीनिक की जगह लेगा, शेष में माँ व विजय का परिवार रहेगा. डॉक्टर अपने रिहाइश के लिए घर के ऊपर दूसरी मंजिल बनाएगा. मकान बन भी गया, डॉक्टर अपनी ऐंठ व ठाट-बात से रहता रहा, पर हँसते खेलते रहने वाली बूढ़ी माँ एकदम मानसिक तनाव में रहने लगी. डॉक्टर व उसके परिवार से बात तक नहीं करती थी. बाद बाद में तो उसका मानसिक संतुलन बहुत बिगड़ गया. वह जोर जोर से प्रलाप करती थी. डॉक्टर व उसकी बहू के लिए अपशब्द प्रयोग करने लगी थी. जब उसकी मृत्यु हुई तो उसके निर्देशानुसार डॉक्टर को अपनी माँ को मुखाग्नि नहीं देने दी गयी.

इस धटनाक्रम को बीते ज्यादा समय नहीं हुआ है. अब कहा जा रहा है कि माँ भूतनी बन कर डॉक्टर के परिवार को परेशान किया करती है. डॉक्टर के बच्चे बार बार फेल हो रहे हैं, घर में एक बार बड़ी चोरी भी हो चुकी है, क्लीनिक पर मरीज आने लगभग बन्द हो गए हैं, और डॉक्टर की श्रीमती के शरीर में ल्यूकोडर्मा उभरने लगा है. इस प्रकार मन में आशंकाएं व डर घर कर गयी हैं कि इस सब के पीछे माँ की बददुआएं ही हैं. अत: माँ की आत्मा की शान्ति के लिए तथा प्रेतात्मा के मोक्ष के लिए डॉक्टर रामदत्त शर्मा ज्योतिषियों व पंडितों की सलाह पर एक बड़ा अनुष्ठान करने जा रहे है. उनको याद है कि एक बार माँ ने अपनी छाती के दूध की कीमत चुकाने को कहा था जिसे अब चुकाना एक मजबूरी हो गयी है.
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7 टिप्‍पणियां:


  1. बहुत बढ़िया सत्य कथा सन्देश यही है माँ तो क्या भूतनी बनेगी -कर्तम सो भोगतम .बद्दुआ लगती है दुआ भी ,बद्दुआ ज्यादा लगती है अगले जन्म तक साथ जाती है .लगे न लगे हीनभावना तो बड़ी कर ही देती है राम दत्तों की .

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  2. aaj ke samaj kee vastvikta hai ye beta panditon par ,jyotishyon par kadodon rupay foonk dega kintu maa -baap ko khane ko do roti bhi nahi dega .
    बहुत भावनात्मक प्रस्तुति . बद्दुवायें ये हैं उस माँ की खोयी है जिसने दामिनी , आप भी जानें हमारे संविधान के अनुसार कैग [विनोद राय] मुख्य निर्वाचन आयुक्त [टी.एन.शेषन] नहीं हो सकते

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  3. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि कि चर्चा कल मंगल वार 19/2/13 को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी आपका हार्दिक स्वागत है

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  4. यथार्थ की सुंदर प्रस्तुति।

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