बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

बूढ़ा सेमल और बसंत

बागन में आम, जंगलन में नीम बौरायो है,
खेतन में धान्य, बेल-लतान में बसंत बगुरायो है,
भौरन-कीट-पतंगन को पराग-गंध अकुलायो है,
अरे, बूढ़े सेमल, हाय, तू काहे फगुनायो है?

कोयल पंछी कुहुक पड़े हैं, ज्यों नवसंदेसो आयो है,
निम्ब-जमीर नवांकुर लेकर नवचेतन हर्षायो है,
धरती सारी है इठलाती, यौवन खूब सजायो है,
अरे, बूढ़े सेमल ! हाय, तू काहे फगुनायो है?

बातन में मस्ती, खेलन में होरी को रंग बरसायो है,
कोई कहे राधा, कोई कहे कन्हैया आयो है,
रति-रंग तरंग चहुँ ओर चौपायों तक में छायो है,
अरे, बूढ़े सेमल, हाय, तू काहे फगुनायो है?

नहि कलरव- संगीत सगुन, ऐसो कैसो भायो है,
मन ही मन तू हर्षाय रह्यो, कौन मीत बनायो है?
पत्र-विहीनं, पलितं-मुंडम, जर्जर वेष बनायो है,
अरे, बूढ़े सेमल, हाय, तू काहे फगुनायो है?
                            ***

4 टिप्‍पणियां:

  1. अहा, पढ़कर आनन्द आ गया, संस्कृत का पुट उसे आनन्दम् कर गया..

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  2. बृज मंडल की सारी मिठास चुरा ली है इस रचना ने .शुक्रिया आपकी टिपण्णी का .

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  3. मस्त, आनन्द दायी रचना.

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