शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013

निरुद्देश्य

सुरेन्द्रनाथ झा गुडगाँव में ३०० गज के एक प्लाट में बंगला बनाकर रह रहे हैं. वे देश के एक नामी कपड़ा उद्योग के स्पेशल डाइरेक्टर के पद से करीब दस साल पहले रिटायर हो चुके थे. उनकी उम्र अब लगभग ७८ वर्ष की है. उन्होंने जवानी में शादी नहीं की. अधेड़ उम्र में आस्ट्रेलिया गए थे, वहाँ पर एक अंग्रेज महिला मिस ग्रेफीना से दोस्ती हुई और साथ ले आये. वह पहले से तलाकशुदा थी. उसकी वफादारी तो ऐसी थी कि वह नाम की पत्नी बनी रही. करीब १४ साल साथ रह कर वह झा साहब से सारे रिश्ते तोड़ कर वापस आस्ट्रेलिया चली गयी. झा साहब अब सोचते हैं कि पता नहीं किस मनहूस घड़ी में ग्रेफीना उनसे मिली, तब वे अपनी औकात भूलकर खुद भी अंग्रेज बनने की हिमाकत करने लगे थे.

झा साहब को जब तक दम था, ९ महीने विदेशों में बिता आते थे, पर अब मधुमेह व अस्थमा के प्रकोप से ग्रसित हो गए हैं. फैमिली डॉक्टर रोज ही आता है. अपनी ड्यूटी पूरी कर जाता है. घर में ड्राईवर समेत पाँच नौकर हैं, जो उनकी देखभाल करते हैं, पर नौकरों का रिश्ता तो शुद्ध व्यवसायिक होता है. कुछ समय पहले तक ड्राईवर से कभी कभी कहा करते थे, “चलो आज नई दिल्ली घुमाकर लाओ,” पर अब दिल्ली घूमने लायक नहीं रही है, भीड़-भाड, वाहनों का जाम व प्रदूषण की सोच कर उस तरफ जाने का मन नहीं होता है.

पिछले महीने अलीगढ़ जरूर गए थे, जो कि उनका जन्म स्थान है. झा साहब का बचपन वहीं बीता था इसलिए उन गली मुहल्लों के प्रति वे अभी भी संवेदनशील हैं. वहाँ अब उनका कोई परिचित नहीं बचा है, चाचा, ताऊ के परिवार वाले थे, वे भी एक एक करके अन्यत्र बस गए हैं. सब अपने अपने सांसारिक धंधों-उलझनों में व्यस्त होंगे. झा साहब ने पिछले ५० वर्षों में उनकी कभी कोई खोज खबर भी नहीं रखी है. अलीगढ़ शहर का भी बाहरी फैलाव बहुत हो गया है. पुरानी पहचान वाली जगहें सब नैपथ्य में चली गयी हैं. उनके पुराने घर के पास जो शिव मंदिर था, वह वैसा का वैसा है. छुटपन में कई बार सुरेन्द्र माँ-बाप के साथ यहाँ आये थे, पर सयाने होने के बाद उन्होंने देवालयों मे जाकर दर्शन करना छोड़ दिया. वे सचमुच धार्मिक नहीं रहे हैं. कारण उन्होंने कभी भगवान की जरूरत महसूस नहीं की.

सुरेन्द्रनाथ झा के पिता जानकीनाथ झा तालों के कारोबार से जुड़े हुए थे. यह उनका खानदानी काम था, पर जानकीनाथ झा सपरिवार कानपुर आकर बस गए थे. अलीगढ़ से ताले ला कर यहाँ बेचा करते थे.

सुरेन्द्रनाथ झा की माता जी भी खाली बैठना पसन्द नहीं करती थी. फिरोजाबाद से चूडियों की खेप लाकर मोहल्ले मोहल्ले जाकर चूड़ियाँ बेच आती थी. झा साहब को यह सब कल की सी बात लगती है. सुरेन्द्रनाथ ने कानपुर से मैट्रिक पास करके वहीं से मैकेनिकल इन्जीनियरिंग में डिप्लोमा ले लिया. कुछ महीनों तक एल्गिन मिल में अप्रेंटिसशिप करने के बाद सिंघानिया कम्पनी के नए कपड़ा मिल में नौकरी पा गए. ये वे दिन थे, जब न्युयोर्क और लन्दन दोनों जगहों पर एक साथ पेट्रोलियम पदार्थों पर आधारित कृत्रिम धागे का आविष्कार हुआ था और उनसे NY+LON (नाइलोन) नाम दिया गया था. यह कपड़ा उद्योग का एक क्रांतिकारी समय था. शुद्ध कृत्रिम रेशे से या इसकी मिलावट से टेरेलिन, टेरीकॉट व पॉलिएस्टर जैसे नए प्रयोग हुए, जिसने कपड़ा उद्योग का सारा नक्शा ही बदल दिया.

सिंघानिया कम्पनी इस नई तकनीक का विवरण व माइक्रोप्रोसेसर बहुत महंगे दामों में खरीद कर लाई, जिस पर काम करने का जिम्मा जापान में कुछ ट्रेनिंग  दिलाने के बाद सुरेन्द्रनाथ झा को दिया गया.

देश के अन्य प्रतिस्पर्धी कपड़ा उद्योगों की भी नजर इस नई टेक्नोलॉजी पर थी. अहमदाबाद के एक नव उद्योगपति ने सिंघानिया के गर्भगृह में सेंध लगा कर एक स्पेयर माइक्रोप्रोसेसर सहित सुरेन्द्रनाथ झा को चीफ इंजीनियर के पद लालच देकर गुपचुप अपने यहाँ बुला लिया. हड़कम्प मचा, सुरेन्द्रनाथ झा पर मुकदमा दर्ज हुआ, पर नए मालिक दम्ब्वानी ने परदे के पीछे से पूरी मदद की. लेनदेन/समझौता हुआ और कुछ वर्षों के बाद मुकदमा रफा दफा भी हो गया. दम्ब्वानी मैनेजमेंट ने सुरेन्द्रनाथ झा को विशेष दर्जा दिया. विदेश यात्राओं की हर साल सौगातें दी और आर्थिक रूप से मालामाल भी कर दिया क्योंकि सुरेन्द्रनाथ झा की कृत्य से कम्पनी को लाखों का नहीं, कई करोड़ों का लाभ हो रहा था.
सुरेन्द्रनाथ झा कम्पनी में उच्च पदों पर नियुक्त रहे. उन्होंने पाश्चात्य शैली की ऐश भरी जिंदगी जी, पर अब दौलत तो ढेरों है, लेकिन शरीर की मजबूरियों के रहते खुद को लाचार महसूस करते हैं.

आज उन्होंने अपने वकील को बंगले पर बुलाया है और चाहते हैं कि अपनी वसीयत लिखवा डालें. वे पिछले कई दिनों से इसी उलझन में हैं कि इतनी सारी चल सम्पति का वारिस किसको बनाया जाये? वे उलझन में हैं, निरुद्देश्य हैं, हिसाब भी लगा रहे हैं कि जीवन में क्या पाया और क्या खोया!
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3 टिप्‍पणियां:

  1. कभी न कभी तो हिसाब लगाने बैठना है कि क्या खोया, क्या पाया हमने..हम तो मध्यान्तर में भी एक बार सोच चुके हैं।

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  2. उम्र के अंतिम पड़ाव पर ही ज़िंदगी का बहीखाता खुलता है ...

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