शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

मैं किसनगढ़ी

मेरी जड़ें कहाँ हैं मैं नहीं जानती, पर अब मैं गर्व करती हूँ कि मेरा उपनाम ‘किसनगढ़ी’ हो गया है क्योंकि मैं किसनगढ़ राजवंश के एक पूर्व राजपुरोहित खानदान की वंशबेल बन गई हूँ. यह भी सच है कि मैं आज तक किसनगढ़ नहीं जा पाई हूँ.

जैसा कि मेरे वकील पति बताते हैं, उनके दादा जी पण्डित जयवल्लभ जोशी शास्त्री को बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना पण्डित मदन मोहन मालवीय की संस्तुति पर किसनगढ़ के राजा मदनसिंह ने पिछली शताब्दी के पूर्वार्ध में अपने राजपुरोहित के रूप में बुलाकर नियुक्ति दी थी. दादा जी मूल रूप से उत्तराखंड के अल्मोड़ावासी थे. वे संस्कृत तथा ज्योतिष के विद्वान थे.

किसनगढ़ वर्तमान राजस्थान में अजमेर से लगभग २५ किलोमीटर उत्तर में स्थित है. इस रियासत को जोधपुर के राजकुमार किसनसिंह के द्वारा सं १६०९ में बसाया गया था. किसनगढ़ वर्तमान में अपने स्फटिक खदानों (मार्बल माईन्स) के लिए जाना जाता है. जैसा कि मुझे बताया गया है, यह बहुत खूबसूरत जगह है. अभेद्य किले के चारों ओर गहरी नहर खुदी हुई थी. अब वहाँ पर बहुत से पिकनिक स्थल विकसित किये गए हैं. गोन्द तालाब और फूलमहल होटल दर्शनीय हैं. राजाओं के जमाने में राजसी भव्यता व वैभव सुख अवश्य रहे होंगे.

दादा ससुर जी शायद राजस्थान की अतिशय गर्मी को नहीं सह पाए और जल्दी ही स्वर्गवासी हो गए. राजा जी ने उनके परिवार को पूरा संरक्षण दिया, जागीर में दो गाँव भी दिये. तब उनके दोनों बेटे बहुत छोटे थे. सयाने होने पर मेरे ससुर भगवती प्रसाद जोशी घर जंवाई बन कर अपने ससुराल इलाहाबाद आ गए, और यहीं के होकर रह गए.

मैं एक पंडा परिवार की बेटी, शुरू से चित्रकला में रूचि रखती थी. इसी विषय में परास्नातक डिग्री लेकर बंगाल आर्ट कॉलेज में आर्ट की लेक्चरर हो गयी. मैंने राजा रविवर्मा की चित्रकारिता, मधुबनी आर्ट व किसनगढ़ के आर्ट ‘बनी-ठनी’ के चेहरों की सुन्दर छवियों पर बहुत बारीकी से अध्ययन किया मुखाकृति की एक एक लकीर व भावभंगिमा को पढ़ा तथा समझा है. कलाकारों की पुरानी कृतियों की प्रतिकृतियां भी बनाई और नए आयाम जोड़ कर उन मोहक स्वरूपों में स्वयं को डुबोए रखा.

प्राचीन भित्तिचित्र व मूर्तिकलाओं का राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय इतिहास बहुत विस्तृत है, हमारे देश में मुग़ल काल में मिनिएचर पेंटिंग, पोट्रेट पेंटिंग में अनेक सुन्दर चमकीले रंगों का प्रयोग किया जाता था. इस पर पर्सियन परम्परा की छाप भी स्पष्ट दीखती है. उसी काल में विभिन्न राजघरानों द्वारा चित्रकारी व चित्रकारों को प्रश्रय दिये जाने से महत्वपूर्ण कार्य हुए. भारतीय कला इतिहास में इनको प्रमुखत: कांगड़ा पेंटिंग्स, मैसूर पेंटिंग्स, तंजौर पेंटिंग्स, राजपूत पेंटिंग्स व मधुबनी पेंटिंग्स नाम से जाना जाता है. अंग्रेजी दासता के काल में यूरोपीय स्टाइल में वाटर कलर वाली पेंटिंग्स खूब बनती रही.

उड़ीसा की लोकचित्रकारी में कृष्ण चरित्र को खूबसूरत रंगों से सजाया गया है. इसे ‘पत्र-चित्र’ नाम दिया गया. किसनगढ़ के राजा ने अट्ठारहवीं सदी में निहालचंदर नाम के एक कलाकार को अपने राजकीय नवरत्न का दर्जा देकर हिन्दू देवी-देवताओं तथा रामायण-महाभारत के दृश्य चित्रों को बनवाया जिनमें मुखाकृति व रंगसज्जा अनूठी है. इसे ‘बनी-ठनी’ कला के नाम से जाना जाता है. मैंने इसको देखा, पढ़ा, तथा स्वयं को आत्मसात करने की पूरी कोशिश की है.

यह एक संयोग था कि दीपांकर जोशी से मेरा वैदिक रीति से सुनियोजित विवाह हुआ. वे एक वकील हैं. विवाह के बाद जब उन्होंने मुझे अपने परिवार का पूर्व इतिहास बताया तो मैं यह जानकार बहुत आनंदित व भावविह्वल हो गयी कि मेरे पति के खानदान के तार किसनगढ़ की पूर्व रियासत से जुड़े हुए हैं, जो कि ‘बनी-ठनी’ कला का जन्मस्थान भी है.

मैं अब खुद को सुप्रिया जोशी ‘किसनगढ़ी’ कहलाना पसन्द करती हूँ, और बनी-ठनी पर आगे शोध करके अपने जीवन का ध्येय बनाना चाहती हूँ.
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3 टिप्‍पणियां:

  1. वाह, सुरुचिपूर्ण परिचय। स्थान का प्रभाव एक स्पष्ट छाप छोड़ता है व्यक्तित्व पर।

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  2. बहुत खूब क्या बात है , सम्पूर्ण परिचय तो क्या हम ऐसी आशा रखे आप से की आप जल्दी किसनगढ़किसंगड़ जा रही है

    मेरी नई रचना

    खुशबू

    प्रेमविरह

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  3. बहुत खूब क्या बात है , सम्पूर्ण परिचय बहुत सुन्दर पक्तिया

    तो क्या हम ऐसी आशा रखे आप से की आप जल्दी किसनगढ़ जा रही है

    मेरी नई रचना

    खुशबू

    प्रेमविरह

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