बुधवार, 21 अगस्त 2013

उत्तराखण्ड का रक्षाबंधन

उत्तराखण्ड में श्रावणी पूर्णिमा को जनेऊ पूर्णिमा भी कहा जाता है. इस दिन यजुर्वेदी द्विज लोगों का उपक्रम होता है उत्सर्जन, स्नान, तर्पण और उसके बाद नया यज्ञोपवीत धारण किया जाता है. ये ब्राह्मणों का सर्वोपरि त्यौहार माना जाता है. पुरोहित लोग अपने यजमानों को यज्ञोपवीत देते हैं, रक्षा सूत्र (कलेवा) हाथ में बाँधते हैं और यजमानों से दक्षिणा प्राप्त करते हैं. रक्षासूत्र बाँधते समय निम्न मन्त्र पढ़ा जाता है:

येन बद्धो बलि राजा दानवेन्द्रो महाबल:
तेन त्वां प्रतिबद्धनामि, रक्षे मा चल मा चल.

इसका हिन्दी भावार्थ है, ‘जिस रक्षा सूत्र से महान शक्तिशाली दानवों के राजा बलि को बांधा गया था उसी सूत्र से मैं तुम्हें बांधता हूँ. तू अपने संकल्प से कभी भी विचलित मत होना.’

राखी का इतिहास भविष्य पुराण में इस प्रकार मिलता है कि एक बार असुरों के आतंक से घबरा कर देवराज इन्द्र अपने गुरू बृहस्पति के पास गए. इन्द्राणी भी उनके साथ थी. उसने उनकी वार्तालाप सुनी और बाद में खुद रेशम की डोरी को अभिमंत्रित करके अपने पति की कलाई में बाँध दिया, इससे देवराज अपने युद्ध में विजयी रहे. संयोग से वह श्रावणी पूर्णिमा का दिन था.

अन्य पौराणिक ग्रंथों में भी अनेक जगह इसी प्रकार के सन्दर्भ हैं, जहाँ रक्षा सूत्र अभिमंत्रित करके पात्रों की कलाई पर बांधा जाता था. मध्ययुगीन इतिहास में राजपूत राजा-महाराजाओं तथा रानियों के बारे इसी तरह के आख्यान हैं, जिनमें सहायता/रक्षा का भरोसा लेकर बहन बनकर राखियां बांधी/भेजी जाती थी. कुछ उदाहरण मुसलमान बादशाहों के पास भी भेजने के भी उल्लेखित हैं.

वर्तमान में इसे शुद्ध रूप से भाई-बहन के प्यार के रिश्ते के रूप में स्थापित कर दिया गया है. इसमें हमारी हिन्दी फिल्मों का विशेष योगदान है. इसी सन्दर्भ में पूरी फ़िल्में भी बनी हैं जो कि मनभावन गीत-संगीत से भाई-बहन के प्यार को जीवंत करती है.

संचार माध्यमों तथा स्कूलों में पठन-पाठन सामग्री में भी रक्षाबंधन भाई-बहन के रिश्ते पर मनाया जाने वाला उत्सव हो गया है. इसका प्रभाव उत्तराखण्ड के दूर दराज के इलाकों में भी देखने को मिलने लगा है. पिछली सरकारों से जनभावना का दोहन करने के लिए रक्षाबंधन के दिन सरकारी बसों मे महिलाओं की यात्रा नि:शुल्क कर दी थी.

इस बार अतिवृष्टि से जो त्रासदी उत्तराखण्डवासियों ने झेली है, उसके घाव लम्बे समय तक नहीं भर पायेंगे. हालाँकि दस्तूरन सब कुछ हो रहा है, पर अभी सैकड़ों घरों में दु:ख और मायूसी की छाया पसरी हुई है.

इस अवसर पर मैं भी उन सभी लोगों को हृदय से धन्यवाद और शुभकामनाएँ देना चाहता हूँ, जिन्होंने उत्तराखण्ड के पुनर्निर्माण के लिए आर्थिक योगदान किया है.
***

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज वृहस्पतिवार (22-06-2013) के "संक्षिप्त चर्चा - श्राप काव्य चोरों को" (चर्चा मंचः अंक-1345)
    पर भी होगी!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  2. रक्षा की पुकार सदा ही रही है, उसी आश्वासन का उत्सवीय प्रतिरूप है रक्षाबंधन।

    उत्तर देंहटाएं