सोमवार, 12 अगस्त 2013

यादों का झरोखा


स्वर्गीय वीरेन्द्रनाथ शर्मा को सब लोग लाखेरी का अमीन सयानी कहा करते थे क्योंकि उनकी दमदार आवाज और प्रस्तुति अमीन सयानी की तरह हुआ करती थी. लाखेरी ए.सी.सी. कैम्पस में क्लब का कोई स्टेज कार्यक्रम हो या स्पोर्ट्स क्लब के खेल, उन सब में शर्मा जी अनाउन्सर हुआ करते थे. वे लॉन टेनिस और ब्रिज के बहुत अच्छे खिलाड़ी भी थे.

मैं जब सन 1960 में लाखेरी आया तो वे फैक्ट्री के टाइम ऑफिस में बतौर टाइम-कीपर कार्यरत थे. बाद में अकाउंट्स क्लर्क /अकाउंट्स ऑफिसर बने.

पाकिस्तान के अन्दर रोहड़ी और वाह में ए.सी.सी. के दो सीमेंट कारखाने हुआ करते थे. देश के बंटवारे के समय वहाँ के हिन्दू कर्मचारी भारत को भेजे गए. शर्मा जी का परिवार लाखेरी आ गया. मुझे उनके बुजुर्गों/खानदान के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है.

शर्मा जी से मेरी जल्दी ही मित्रता हो गयी. हमने सन 1962 में होली के अवसर पर एक सांस्कृतिक कार्यक्रम ‘मूर्ख सम्मलेन’ (हास्य सम्मलेन) आयोजित करना शुरू किया, जिसमें मैं मुख्य सूत्रधार होता था, पर संयोजन में शर्मा जी की बड़ी भूमिका हुआ करती थी. इस कमेटी में मेरे और शर्मा जी के अलावा स्वनामधन्य सर्वश्री पण्डित शिवदत्त शर्मा, पावर हाउस सुपरिन्टेंडेंट, जो हाल ही में 93 वर्ष की आयु प्राप्त करके स्वर्ग सिधार गए है, स्व. केशवदत्त अनन्त अकाउन्टेंट, स्व.मदनलाल दीक्षित, फेरुसिंह रूहेला हेडमास्टर जैसे विद्वान व सामाजिक कार्यकर्ता शामिल थे. साथ ही बेहतरीन स्थानीय कलाकारों की टीम भी जुड़ी रहती थी, जिसमें सर्वश्री अब्दुल मलिक, के.के. महेश्वरी, चंद्रशेखर टीटू, भगवानदास दलेर, सुखदेव शर्मा आदि नौजवान शामिल होते थे.

पूरे कार्यक्रम में वीरेंद्र शर्मा जी का रोल अहम हुआ करता था. स्वभाव से वे सरल और स्पष्टवक्ता थे. सन 1977 में जब मैं आपातकाल के दौरान कर्मचारियों की यूनियन का जनरल सेक्रेटरी भी था, तभी कम्पनी के मैनेजमेंट ने उनको ऑफिसर ग्रेड में असिसटेंट अकाउंट्स ऑफिसर बना कर धौलपुर, मध्यप्रदेश स्थित बामोर कारखाने को ट्रांसफर का आफर दिया. वे अनिर्णय की स्थिति में थे. तब शायद उनकी वृद्ध माता जी मौजूद थी. तीनों बेटे व बेटियाँ नाबालिग थे. मैंने उनको प्रमोशन ना छोड़ने की सलाह दी, तथा जल्दी वापस तबादला करवाने का आश्वासन भी दिया. सँयोग से वह कारखाना कम्पनी ने सन 1982 में किसी दूसरी पार्टी को बेच दिया, और अपना स्टाफ अन्यत्र एडजस्ट कर लिया. तब शर्मा जी असिसटेंट अकाउंट्स ऑफिसर बन कर वापस लाखेरी ही आ गए.

उनकी अनुपस्थिति में कार्यक्रमों के आयोजनों पर माइक थामने का काम मुझे या फेरुसिंह रूहेला जी को करना पड़ता था. बाद में रविकांत शर्मा को भी इस टीम में जोड़ लिया गया.

वीरेंद्र शर्मा जी के पास चुटकुलों का और हास्य फुलझड़ियों का खजाना होता था. उनकी एक छोटी बहन श्रीमती मनोरमा भी इस फन में माहिर थी, जो महिला क्लब की जान हुआ करती थी. उनके पति स्व. पुरुषोत्तम दास शर्मा (इलेक्ट्रिकल इंजीनियर) वीरेंद्र जी के डबल जीजा होते थे. क्योंकि मनोरमा से बड़ी बहन के स्वर्गवास के बाद ही वह उनकी धर्मपत्नी बनी थी.

जब वीरेंद्र शर्मा बामोर से वापस आये तो वे कम्पनी ग्रेड के ऑफिसर थे और उनकी चाल व पहनावे में भी ऑफिसरी झलकती थी. उस वर्ष होलिकोत्सव पर उनको हमारी कमेटी ने उपाधि दी, "साला मैं तो साहब बन गया." यह सटीक था इसलिए लोगों ने खूब ठहाके लगाए. यों हम सब होली पर खुद पर भी हँस लेते थे. हमें भी इसी प्रकार के चुभते उपाधियों से नवाजा जाता था.

वे सुनहरे दिन थे. चांदी जैसे साफ़ सुथरे चमकीले लोग होते थे. आपस में खूब मजाक कर लेते थे. अब सिर्फ यादें ही बाकी हैं. शर्मा जी के बड़े पुत्र श्री राकेश शर्मा उर्फ पण्डित राकेशकुमार सारस्वत अब जयपुर में सपरिवार रहते हैं. दो अन्य बेटे अखिलेश शर्मा और मधुसूदन शर्मा ए.सी.सी. के हिमांचल स्थित गागल फैक्ट्री में कार्यरत हैं. श्रीमती वी.एन. शर्मा का साया अभी अपने बच्चों के ऊपर है. ये सभी बच्चे तथा राकेश शर्मा का बेटा सागर और बेटी श्रीमती सुरभि फेसबुक पर मेरे मित्रों की लिस्ट में हैं.
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2 टिप्‍पणियां:

  1. बड़े सजीव होतें हैं आपके संस्मरण और उनके पात्र। संमरण शैली में आपकी पोस्ट।

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  2. सजीव स्मृतियों के उजले अध्याय।

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