शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

शेरदा लान्गरी

अल्मोड़ा और हल्द्वानी के बीच भवाली से पहले मोटर मार्ग पर गहरी घाटी में ‘गरम पानी’ ऐसी जगह है, जहाँ पहाड़ से आने वाले या पहाड़ को जाने वाले यात्रियों को भोजन कराने के लिए सभी कुमाऊं मोटर मालिकों की तथा रोडवेज की बसें रुका करती थी. यहाँ बहुत सारे ढाबे हुआ करते थे, जिनमें स्वादिष्ट भोजन- दाल-चावल, सब्जी-पूड़ी, मीट-रोटी, आलू-पकोड़े, रायता-चटनी साथ में भुनी हुई लाल मिर्च, सब कुछ यात्रियों की इच्छानुसार परोसे जाते थे. आज भी परोसे जाते होंगे, पर अब तो पूरे मार्ग में जगह जगह अच्छे अच्छे ढाबे खुल गए हैं. बस ड्राइवरों की जहाँ सेटिंग रहती है, वहीं पर बस रोकी जाती है. लेकिन वो पुराना स्वाद अब खाने में नहीं आता है.

शेरू उर्फ शेरसिंह का बचपन इन्ही ढाबों में काम करते हुए गुजरा. बर्तन साफ़ करने से लेकर थाली परोसने तक का सब काम वह फुर्ती से किया करता था. वह अनाथ था. किसी गाँव वाले ने उसे यहाँ की राह दिखाई थी. उसे तो अब अपने मूल गाँव की कोई याद भी नहीं रही. यहाँ उस भुखमरे बच्चे की मौज थी. बचा हुआ वेज, नानवेज, सभी तरह का खाना उसे भरपेट जो मिल जाया करता था.

माँ-बाप उसकी यादों में भी नहीं रहे. उसे डांटने-डपटने वाला भी कोई नहीं था फलत: वह बचपन से ही स्वच्छंद हो गया. मनमौजी लोग अकसर हट्टे कट्टे रहते हैं. जवान होने पर वह अपने दोस्त पानसिंह के साथ रानीखेत जाकर कुमायूँ रेजीडेंट में भर्ती हो गया. रंगरूटी करने के बाद उसे लंगर की ड्यूटी में भेज दिया गया. क्योंकि उसने अपने कमांडेंट को अपना पिछला इतिहास बता रखा था. यही से उसे ‘शेरदा लान्गरी’ पुकारा जाने लगा.

सँयोग की बात थी कि एक बार जब वह फ़ौज से छुट्टी में गरमपानी की राह पर था तो उसकी मुलाक़ात एक पुलिस दरोगा गोविन्दसिंह बिष्ट से हो गयी गोविन्दसिंह उसके व्यक्तित्व से इतने प्रभावित हुए कि उसे अपना घर-जंवाई बनाने का पस्ताव दे दिया. गोविन्दसिंह की तराई में तीन एकड़ जमीन थी और केवल एक ही बेटी थी कमली. जो छुटपन से ही जिद्दी और अक्खड़ स्वाभाव की थी. दरोगा जी ने सोचा कि शेरसिंह जरूर कमली पर नकेल डाल कर रख पायेगा.

इस प्रकार शेरसिंह की शादी कमली से कर दी गयी. शेरसिंह अब गृहस्थ हो गया और हर साल छुट्टी आता जाता रहा. किसी ने कहा है, "हरदी जरदी ना तजे, खटरस तजे ना आम." उसके स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं आया.

पन्द्रह साल की नौकरी करके, पेन्शन पाकर, जब वह रिटायर हुआ तब उसके दो बेटे हो चुके थे.

उसका दोस्त पानसिंह भी उसके साथ ही लान्गरी रहा वह उसके सारे राज जानता था. और छुट्टी आने पर कमली से सारी चुगली कर जाता था. उसने कमली को बता दिया कि 'शेरसिंह उसके प्रति वफादार नहीं है, वह वैश्यालयों के चक्कर लगाया करता है’. भारतीय नारी सब कुछ बर्दाश्त कर सकती है, पर दुश्चरित्र पति की छाया अपने घर परिवार पर कभी नहीं चाहेगी. कमली उग्र स्वभाव की थी ही, पानसिंह की चिंगारी ने उसे खूंखार बना दिया. उसके मन में आग तो सुलग ही रही थी, इस बार जब वह घर आया तो कमली ने उससे पानसिंह की कही हुई बातों पर सफाई माँग ली. शेरसिंह शराब के नशे में था. बातों ने हंगामे और मारपीट का रूप ले लिया. कमली और उसके किशोर बेटों ने उसकी धुनाई कर डाली. घर जायदाद सब कमली के नाम पर था इसलिए उसने शेरसिंह से घर से निकल जाने का फरमान जारी कर दिया. शेर शेरनी से जीत नहीं पाया इसलिए गुस्से में कसमें लेकर कह आया, “अब इस दरवाजे पर मैं कभी नहीं आऊँगा.”

शेरदा लान्गरी इस प्रकार परिवार से अलग हो गया. तल्ली हल्द्वानी में किराए से कमरा लेकर रहने लगा. उसने एक खच्चर वाली रेहड़ी खरीद ली और कृषि उपज मंडी के आढ़तियों का काम करने लगा. उसने अपनी अलग स्वच्छंद दुनिया बसा ली. खूब शराब पीता था, यार दोस्तों को भी पिलाता था. यों २५ वर्ष एकाकी रह कर काट लिए. बिछुडे परिवार से कोई सम्बन्ध नहीं रखा और न परिवार वालों ने उसकी कुशल बात पूछी.

शेरदा अब बूढ़ा हो गया है. उसके शरीर को बहुत सी बीमारियों ने आ घेरा है. रेहड़ी चलाना उसने वर्षों पहले छोड़ दिया था. उसे बार बार अपना किराए का कमरा भी बदलते रहना पड़ता है. लोगों ने किराए भी बहुत बढ़ा दिये हैं. पेन्शन का बड़ा हिस्सा मकान भाड़े में जाने लगा है. अब वह आर्मी कैंटीन से सस्ते दर पर मिलने वाली अपने हिस्से की शराब मंडी के आसपास चोरी से फुटकर में बेचा करता है. उसके नियमित ग्राहकों में एक ज्ञानवल्लभ पन्त भी हैं, जो शराब का सेवन तो करते हैं, साथ ही बाबा जी के प्रवचन सुनने भी जाते हैं. पन्त ने शेरदा को भी सत्संग में जाने की प्रेरणा दी और अब शेरदा सत्संगी हो चला है. श्रोताओं की अगली पंक्ति में बैठ कर ध्यान पूर्वक प्रवचन सुना करता है.

एक दिन बाबा जी कह रहे थे, “मनुष्य कितने ही पाप कर ले यदि उन पर उसे पश्चाताप हो और सच्चे मन से परमेश्वर से लगन लगा ले तो सांसारिक दु:खों से मुक्त हो सकता है.” प्रवचनों का ऐसा असर हुआ कि शेरदा रात भर आत्ममन्थन करने लगा. उसको अहसास होने लगा कि ‘उसने अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को कभी नहीं समझा, सारी गलती उसी की थी’. वह पश्चाताप की आग में कई दिनों तक जलता रहा. एक दिन वह हिम्मत करके कमली और बेटों के घर माफी मांगने के विचार से पहुँच गया, लेकिन वहाँ किसी ने उसका स्वागत नहीं किया. बूढ़ी कमली ने कर्कश वाणी में कह दिया, “हम तुझे नहीं जानते हैं. तुम्हारे लिए यहाँ कोई जगह नहीं है.” उसके जवान बेटे, बहुएँ, पोता-पोती सब तमाशा देख रहे थे. किसी के मुँह से एक शब्द भी नहीं निकला क्योंकि वे सब उसकी कहानियां सुन सुन कर पूर्वाग्रहों से पीड़ित थे.

शेरदा लौट पड़ा. उसे अपने पैरों का वजन इतना ज्यादा लग रहा था कि उससे उठाये नहीं जा रहा थे.
***

5 टिप्‍पणियां:

  1. ज़िन्दगी से जुडी बड़ी जीवंत दास्तान आप हमेशा लाते हैं रिपोर्ताज शैली में। किस्सा बयानी भी गजब का होता है। ॐ शान्ति। शेरदा लांगरी इसी समाज का ज़िंदा दिल इंसान है जिसके कलेजे में जीने की चाह भी है निरभिमान भी वह सिद्ध होता है आखिर में एक सन्देश भी आपकी हर कथा छोड़ जाती है :वक्त किसी का इंतज़ार नहीं करता। ॐ शान्ति।

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  2. न जाने किस राह बढ़ेगा जीवन सपना,
    उनसे पाते हैं दुख, जिनको समझा अपना।

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