शनिवार, 3 सितंबर 2022

जाले: घोड़ा उड़ सकता है

पिछली शताब्दी के दूसरे दशक में जब मुम्बई-दिल्ली रेल लाइन की सर्वे हो रही थी तो एक अंग्रेज इंजीनियर ने कोटा व सवाई माधोपुर के बीच नीले पत्थरों की खेप पाई. वह कुछ नमूने अपने साथ इंग्लैण्ड ले गया. एनेलिसिस के बाद पाया कि पत्थर हाई ग्रेड लाइम स्टोन है जो सीमेंट बनाने के लिए अति उपयुक्त है. इस प्रकार मुम्बई के कुछ उद्योगपति व बूंदी के हाड़ा  नरेश के साथ मिलकर ‘BBB’ ब्रांड से सीमेंट बनाने की एक छोटी सी इकाई की स्थापना लाखेरी में की गयी. उस समय की वह नवीनतम टैक्नोलाजी आज की तुलना में काफी पुरानी थी.  

सन १९३७ में कई सीमेंट कंपनियों ने एकीकरण करके नई कम्पनी ACC  बनाई, लाखेरी यूनिट भी उसमें समाहित हो गयी. लखेरी मुख्य रेलवे लाइन के पास था. रा-मैटीरियल चूना पत्थर प्रचुर मात्रा में था, मजदूर सस्ते और उपलब्द्ध थे, पानी के लिए मेज नदी थी. कारखाना खूब मुनाफ़ा देता रहा.

मालिकों (शेयर होल्डर्स) उद्योग चलाने के लिए प्रोफेशनल नियुक्त कर रखे थे. आजादी के बाद पारसी उद्योग-पतियों का इसमें बर्चस्व रहा, टाटा भी बड़े शेयर होल्डर थे

शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2021

श्रीमती लता काकू - कथा साहित्य में आज जिनकी चर्चा है.

मेरे हाथों में श्रीमती लता काकू द्वारा लिखित एक ३३ कहानियों के संकलन की एक सुन्दर पुस्तक है, पुस्तक अंगरेजी भाषा में है, नाम है A ROUGE PLANET & other stories. ये अद्भुत पुस्तक www.tgist.com  (जयपुर ) द्वारा अभी २०२१ में प्रकाशित हुयी है.

एसीसी के रिटायर्ड प्लांट हेड श्री पी.के.काकू की अर्धांगिनी'एक  'विदुषी महिला हैं' ये बात मैंने अपने एक लेख में  दस वर्ष पूर्व तब लिखी थे जब चिल्ड्रन्स बुक ट्रस्ट  उनकी एक कृति को सम्मान  देते हुए प्रकाशित किया था. उनकी बहुमुखी प्रतिभा की छाप इस नई कहानी संग्रह में साफ़ झलकती है. 

पुस्तक के प्राक्कथन में जो   दिया गया है उसके अनुसार श्रीमती काकू ने  दिल्ली युनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन के साथ ही स्कूल आफ जर्नलिज्म से डिग्री हासिल की और स्वतंत्र लेखन रही. यूथ टाइम्स, टाइम्स आफ इंडिया, ईव्ज वीकली, द हिन्दू, द हिन्दुस्तान टाइम्स करावांन आदि अंगरेजी  पत्र -पत्रिकाओं उनके आर्टिकल रहे हैं. इस पुस्तक में छपी  कहानी 'there are more things in Heaven उनकी पहली शार्ट स्टोरी थी. IGNOU से  creative  writings का कोर्स  बाद ाल इंडिया रेडियो के  स्क्रिप्ट राइटिंग व रेडियो टॉक्स भी उनके खाते में है,

इन सके साथ ही उनको हमने एक सदगृहणी  के रूप में देखा है सिम्पल सरल हंसमुख इस लेखिका को अंगरेजी भाषा में कमाण्ड है, सूक्ष्म मानवीय संवेदनाओं को बखूबी अपनी  उकेरा है.हर कहानी अलग अलग परिदृश्य हुए है. पठनीय है.-किताब का अंतर्राष्ट्रीय कोड है 978-81-953958 -7- 4 .

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बुधवार, 8 सितंबर 2021

सामयिकी

 आप मुझसे सहमत हों या ना हों पर मैं आज के हालात पर देश में चल रहे किसान आन्दोलन का पूरी तरह समर्थन करता हूँ.केंद्र सरकार ने जिस तरह इस बड़ी समस्या के प्रति बेरुखी अपनाई  है वह अत्यंत दुखदाई और निंदनीय है.

सुप्रीम कोर्ट ने इस सम्बन्ध में जो कमेटी बनाई थी  उसकी रिपोर्ट मार्च महीने में ही आ चुकी थी, उसे सार्वजनिक करके देश को वास्तविकता की जानकारी दी जाए..

इस विषय में तमाम विदेशी मीडिया ने खूब भद्द उड़ाई है, ये  राजनैतिक  कैंसर ना बन जाए इसलिए इसे अब और लंबा थकाऊ  ना करके सम्मानजनक निराकरण आवश्यक है.

गुरुवार, 2 सितंबर 2021

किसी को भला लगे या बुरा

 मोदी जी के सत्ता में आने के बाद कुछ ऐतिहासिक कार्य अवश्य हुए है जैसे सार्वजनिक सफाई अभियान, जम्मू कश्मीर से धारा ३७० हटाकर लद्दाख को अलग राज्य का दर्जा , बरसों से विवादित राम मंदिर का अहम् मुद्दा, देश की अंतर्राष्टीय छबि  काफी हद तक में सुधार आदि। 

प्रचंड बहुमत के रहते सरकार ने अनेक मनमाने आदेश/क़ानून बनाये, बरसों की मेहनत से बने श्रम कानूनों में उद्योगपतियों के हित निरस्त  किया, किसान आंदोलन का मुद्दा अभी भी मुंह बाए खड़ा है ये अनदेखी भविष्य में क्या गुल कहलाएगी कहा नहीं जा सकता है, रेलवे तथा अन्य कमाई उद्योगों का निजीकरण साफ़ तौर पर दिखाता है की इसके पीछे कुछ गण्यमान्य मित्रों को नवाजा जा रहा है.

मीडिया पर लगाम / लालच की बंदिश साफ़ महसूस की जा रही है,न्यायपालिका कहने को स्वतंत्र है लेकिन हमने अनुभव किया है कि सब गिरफ्त में चल रहे हैं  धार्मिक असहिष्णुता हर तरफ घोल दी गयी है, प्रचार माध्यमों पर करोड़ों अरबों न्यौछावर किये जा रहे हैं, ऐसा लगाने लगा है की सरकार का लक्ष सिर्फ चुनाव जीत रह गया है. नामनिहाल बुद्धिजीवी, विपक्षी नेता सब जैसे अंडरग्राउंड हो चले है क्योंकि सोचते हैं कि  इनसे कौन पंगा ले,जो पंगा लेने की स्थिति  में हैं भी सरकारी छापोपों व यातनाओं के दर के मारे चुप हैं.

अब आप कहते हो की आप मनमानी भी करो और कोई आवाज भी ना उठाये, पेट्रोलियम पदार्थ और रसोई गैस की बेतहाशा बृद्धि क्या मोदी जी को नहीं दिख रही  होगी? कहने इस लूट का पैसा सरकारी कल्याणकारी योजनाओं में खर्च हो रहा है, पर  कितने लोगों को ये सुलभ है? सच ये भी है कि देश वर्ड बैंक के कर्ज में डूबा हुआ है, ऐसा समय भी आ सकता है की आप व्याज की पूरी क़िस्त भी ना दे पाएं।

आज सोसल मीडिया पर केवल हिन्दू_मुस्लिम के विद्वेष भरे सन्देश प्रसारित किये जा रहे हैं, कट्टरता किसी भी व्यक्ति या राजनैतिक दल द्वारा अपनाई जा रही हो. घोर निंदनीय है. 

ये भी सत्य है कि सीधे तौर पर मोदी जी का को विकल्प नहीं दीख रहा है, पर मित्रो आपको आवाज तो उठानी पड़ेगी।

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रविवार, 29 अगस्त 2021

वे सुनहरे दिन

 साठ साल पहले की बात है, मैं लाखेरी में नवांगुतक था , मुझे एसीसी कालोनी में L - १६ क्वाटर  आवंटित था, अविवाहित दिनों में मैंने अपने ही जैसे कुंवारे लोगों से जल्दी ही दोस्ती कर ली थी. इनमें स्व विष्णु बिहारी दीक्षित भी थे जो कि तब उदयपुर से MSW करके एसीसी में जॉब की तलाश में थे, उनके साथ ही एक लड़का शर्मा (नाम मुझे याद नहीं रहा) जिनके पिता उन दिनों लाखेरी स्थित  सेंट्रल एक्साइज के डिपुटी सुपरिंटेंडेंट हुआ करते थे भी उदयपुर स्कूल आफ सोसियल वर्क से ही  MSW कर के आये थे, इनके अलावा सेंट्रल एक्साइज के दो सब इंस्पेक्टर्स  सरदार गुरनामसिंह और प्रकाशचंद्र श्रीवास्तव तथा जीवन बीमा के फील्ड आफीसर वोहरा भी चौकड़ी के सदस्य बन गए थे. मेरा क्वाटर बैठक का अड्डा हो गया था और दोस्ताना गतविधियां चला करती थी. कभी कभी विशेष पकवान / खाना बनाने के लिए एक मि. खन्ना को भी बुलाया जाता था वे नौशेरवाँ टाकीज के सिनेमा के एजेण्ट होते थे , ता हम लोग फ्री में सिनेमा देखने का बी मजा लेते थे हालांकि फर्स्ट क्लास का टिकट मात्र सवा रुपया ही हुआ करता था.

ये सब केवल एक ही साल चला उसके बाद सब अच्छ गच्छ गच्छामि हो गया. मैं भी शादी शुदा लोगों की लिस्ट में जुड़ गया था.

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शनिवार, 25 जुलाई 2020

न्याय / अन्याय




पुरानी कहावत है कि आप न्याय करते हैं तो वह अन्याय सा नहीं दीखना चाहिए. कहने को तो हम दुनिया के सबसे बड़े प्रजातंत्र में जी रहे हैं लेकिन हो क्या रहा है कि जिसके हाथ में लाठी आ जाती है वही भैंस को हांके जा रहा है.

अँधेरे कोनों से आवाज उठाती रहती है कि सी बी आई और  न्यायपालिका को पूर्ण स्वायत्तता मिलनी चाहिए, ताकि निष्पक्ष कार्यवाही/ न्याय हो सके. एक बार सुप्रीम कोर्ट को ही सी बी आई के बारे में कहना पडा था कि ‘ये किसका तोता है ?’ प्रबुद्ध लोग जजों के जमीर की बात करते हैं, जज लोग भी तो हमारे ही समाज की पैदावार हैं जिनकी नियुक्ति, प्रमोशन और भविष्य की संभावनाएं जिस तंत्र के अधीन होती हैं उसको नाराज करना घाटे का सौदा हो सकता है. भूतकाल में भी हमने देखा है कि ऐडजस्टमेंट के लाभ बहुत से माननीयों ने खुले आम स्वीकार किये हैं.

इतिहास जरूर निंदा करेगा पर वह जब लिखा जाएगा तब तक सारा परिदृश्य बदल चुका होगा. कहा जा रहा है कि प्यार और राजनीति में सब जायज होता है, चाहे आप bellow the belt मार कर रहे हों. पर ये नहीं भूलना चाहिए कि इन घटनाओं के निष्कर्ष लम्बे समय तक पीछा करते रहेंगे.
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गुरुवार, 16 जुलाई 2020

कोरोना का साइड इफेक्ट




आजादी के पश्चात देश में औद्योगिक प्रसार के जोर पकड़ने पर मजदूरों के शोषण व उनके प्रति अन्याय को रोकने के लिए विधायिका ने चिंता जताई तथा मालिकों की निरंकुशता पर लगाम लगाने के लिए औद्योगिक विवाद अधिनियम के अलावा अनेक अध्यादेशों, वेतन आयोगों व द्विपक्षीय समझौतों के तहत सुरक्षा देने के पक्के इंतजाम किये गए. इसमें अंतर्राष्ट्रीय मानकों का बी ध्यान रखा गया; इसे मेहनतकश लोगों के सच्चे हितैषियों के अनवरत संघर्षों की उपलब्धि भी कहा जा सकता है. मुख्यत: काम के घंटों, न्यूनतम वेतन, मानवीय सुविधाओं तथा सामाजिक सुरक्षा के बारे में एक लक्ष्मण रेखा खींच दी गयी और इसकी निगरानी के लिए श्रम विभाग का पूरा तंत्र स्थापित किया गया जिसमें इंस्पेक्टर से लेकर न्यायालयों तक का एक जाल बना दिया गया.

अब जब दक्षिणपंथी / पूंजीपतियों के पोषक सरकारें सत्ता में आई हैं तो हम देख रहे हैं कि बड़ी बड़ी सरकारी उद्योगों/ कंपनियों का निजीकरण का दौर जारी है . नए ठेकेदारों को खुलाहस्त देने के लिए श्रम कानूनों को सस्पेंड करने की साजिश हुई है; बहाना कोरोना से उत्पन्न परिस्थिति बताई जा रही है. ये दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय है जो अंधेरगर्दी को जन्म देनेवाला है.

अफ़सोस इस बात का है कि देश में श्रमिक आन्दोलन विभाजित तथा निष्क्रिय अवस्था में है, सत्ता से जुड़े हुए मजदूर नेता अपनी राजनैतिक प्रतिबद्धता के कारण या तो चुप हैं या दबी जुबान से बेमन से बोल रहे हैं. अघोषित आपदकाल में विपक्षी नेता भी बिलों में घुसे पड़े हैं.

कुल मीजान ये है कि जो होने जा रहा है उसके दूरगामी दुष्परिणाम होंगे.
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शनिवार, 11 जुलाई 2020

यादों का झरोखा - डाक्टर बी.एम्. घुले


यादों का झरोखा : (३१)

डाक्टर बी.एम.घुले

HE IS MORE THAN A DOCTOR”  डा. घुले के बारे में ये शब्द थे एसीसी के पूर्व मैनेजिंग डाईरेक्टर स्व. एम्.एम्.राजोरिया जी के.

एसीसी में मेरे ३९ वर्षों के कार्यकाल में मुझे लगभग ३५ डाक्टरों के सानिध्य में कार्य करने का सौभाग्य मिला, जिनमें सबसे लम्बे समय तक हेड आफ डिपार्टमेंट के रूप में डा. भूषण घुले रहे थे. सन १९९९ में लाखेरी में मेरे रिटायरमेंट के समय वे ही मैनेजर हेल्थ सर्विसेज थे.

मैंने उनको बहुत करीब से देखा है, वे सभी रोगियों को बहुत गंभीरता से लिया करते थे और पूरी मेहनत से ईलाज के प्रति समर्पित रहते थे. उन्होंने हमेशा नई दवाओं तथा मेडीकल इक्विपमेंट्स के बारे में खुद को अपडेट करके रखा था. व्यवहारकुशल डा. घुले बीमारों ही नहीं अपने विभाग में  काम करने वाले स्टाफ को भी परिवार की तरह ही ट्रीट किया करते थे.

कर्मचारी यूनियन के प्रेसीडेंट के रूप में मेरी वहाँ पर दोहरी जिम्मेदारी हुआ करती थी, मुझे याद नहीं है कि कभी किसी विषय पर उनसे बहस/ विवाद या शिकायत रही हो. मैनेजर हेल्थ सर्विसेज बनने के बाद इंचार्ज डाक्टर पर फैक्ट्री मेनेजमेंट द्वारा बहुत से दबाव होते देखे थे, विशेषकर कारखाने के नवीनीकरण के समय जब सब तरफ से खर्चों की कटौती व स्टाफ को कम करने के प्लान चल रहे रहे थे. तब बहुत शालीनता से उन्होंने अपना रोल निभाया था.

भिलाई में उनका पैत्रिक घर है, वे जामुल से ट्रांसफर होकर सन १९९० के आसपास लाखेरी आये थे, मुझे जहा तक याद है वे सन २०१२ में रिटायर हुए थे. अब लाखेरी के ही होकर रह गए हैं. यहीं ट्रांसपोर्ट नगर में उन्होंने अपनी निजी क्लीनिक खोलकर रिटायरमेंट लाईफ को व्यस्तता में बदला हुआ है. लाखेरी निवासियों के लिए ये अतिरिक्त सुविधा किसी वरदान से कम नहीं है.

पिछली बार मैं सन २०१७ जनवरी में लाखेरी विजिट के समय उनसे उनकी क्लीनिक पर जाकर मिला था . लाखेरी के लोगों का उनके प्रति सम्मान व विश्वास देख कर बहुत खुशी हुई. दुर्भाग्य से उनको एक पारिवारिक शोक झेलना पडा है कि उनका इकलौता पुत्र स्व. सिद्धार्थ मुम्बई में डेंगू का शिकार हो गया था. वह आई आई टी. करके मुम्बई में कार्यरत था . डाक्टर साहब ने रूंधे गले से बताया कि उनके मुम्बई पहुचने से पहले ही वह स्वर्ग सिधार चुका था, ईलाज का मौक़ा ही नहीं मिला. मृत्यु एक शाश्वत सत्य है पर अकाल म्रत्यु की वेदना अतीव होती है. हम सब डाक्टर साहब के दुःख में शामिल हैं. पता नहीं परमेश्वर इस तरह अच्छे लोगों की परीक्षा लेकर क्यों दुखी करता है.

डाक्टर साहब की बिटिया सौभाग्यवती सुरभि सुपेकर भी  हमारे ग्रुप लाखों के लाखेरियन्स की मेंबर है, फेसबुक पर सक्रियता देखकर खुशी होती है.

डा. घुले व उनकी श्रीमती साधना घुले लाखेरी कालोनी के सामाजिक एवं धार्मिक आयोजनों में अविस्मरणीय रोल अदा करते रहे थे, आज भी करते रहते होंगे. मुझे व्यक्तिगत रूप से डा. घुले ने मेरे रिटायरमेंट के बाद भी अनेक बार अनुग्रहीत किया है, मैं फोन करके ही उनसे यथोचित सलाह व जानकारी पूछ कर लाभान्वित होता रहा हूँ. दिल से आभारी हूँ.
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गुरुवार, 28 मई 2020

वे यादगार पल




मैंने महात्मा गाँधी जी को केवल चलचित्र या फोटोज में देखा है, यद्यपि मैं सन १९४८ में ८ साल की उम्र पा चुका था. उत्तराखंड के सुदूर हिमालयी क्षेत्र में पन्द्रहपाली गावं के डिस्ट्रिक बोर्ड के स्कूल में मेरे पिताश्री सहायक अध्यापक थे. मैं उनके साथ ही स्कूल जाया करता था.

गांधी जी के कृत्रत्व व व्यक्तित्व के बारे में तब मुझे शायद कुछ ही ज्ञात भी नहीं होगा, मुझे तो इतना भर याद है कि सभी बच्चे व अध्यापक इकट्ठे होकर उनकी मृत्यु के समाचार पर शोक प्रकट कर रहे थे. स्कूल की छत पर तिरगे झंडे को तिरछा करके झुकाया गया था, अलग से झंडे के लिए कोई पोल/मास्ट नहीं था और शायद तब अध्यापकों को भी ये मालूम न था कि झंडे को खड़े करके ही आधा नीचे करना होता है.
                (२)

जवाहरलाल नेहरू जी को मैंने सन १९५८ में पहली और आख़िरी बार बहुत नजदीक से देखा था, तब सिक्युरिटी का आज का जैसा तामझाम नहीं हुआ करता था, दिल्ली विश्वविद्यालय के आर्ट्स फैकल्टी के सभागार में कुछ आयोजन था जिसमें वे मुख्य अतिथि थे. उजास चेहरा व आभामंडित मुख मंडल अविस्मरणीय है.

२७ मई १९६४ का वह मन्हूश दिन भी मुझे खूब याद है जब नेहरू जी का स्वर्गवास हुआ था. मैं लाखेरी सीमेंट वर्कर्स की सहकारी समिति का तब जनरल सेक्रेटरी हुआ करता था. उसी सिलसिले में पिछली रात की ट्रेन पकड़ कर में जयपुर आया था. सुबह १० बजे बाद M.I.Road  पर (   सुप्रसिद्ध काफी हाउस काम्प्लेक्स में) राजिस्ट्रार के कार्यालय ने निकल कर ज्यों ही सूरजपोल  बाजार में दाखिल हुआ तो जीप से अनाउन्समेंट हो रहा था कि ‘नेहरू जी नहीं रहे’ . दूकानों के शटर गिरने लगे और  अन्धेरा सा छाने लगा था. लोगों की आँखों में आंसूं छलछला रहे थे. मैं अपने मित्र श्री सुभाष जैन, मैनेजर ई.एस.आई. के निवास ‘हल्दियों के रास्ते’ पर पहुचा तो सचमुच घर के लोग विलाप कर रहे थे. उस दिन  उनके घर में खाना भी नहीं बना.
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शुक्रवार, 1 मई 2020

जन्मदिन


जन्मदिन / मजदूर दिवस 
समय का पहिया इतनी तीब्रता से घूम रहा है कि पता ही नहीं चला कि ३६५ दिन यों ही निकल गए हैं. आज फिर से एक मई आ गया है, पर इस बार का ये एक मई राष्ट्रीय लॉकडाउन के बीच पडा है. वैश्विक स्वास्थ्य संबंधी आपदाओं और घनघोर धार्मिक असहिष्णुताओं के चलते मन में कोई उत्साह नहीं है तथा मजदूर दिवस पर तमाम मेहनतकश तबके को हो रही विपदाओं के समाचारों से बेचैन भी हूँ.

मैं स्वयं ८१ वर्ष की उम्र पूरे होने पर शरीर व मन से स्वस्थ और संपन्न हूँ. ये मेरे परिजनों मित्रों – स्वजनों की शुभकामनाओं तथा सद्भावनाओं का प्रताप है कि जीवन के इस अंतिम पड़ाव पर मैं व्यक्तिगत रूप से हर प्रकार संपन्न हूँ. जीवन की इस लम्बी यात्रा के अंतिम चरण में मैं गर्व से कह सकता हूँ कि मुझे ‘दाता’ ने सब तरफ से नवाजा है.

मुझे मालूम है की हर वर्ष की तरह ही मेरे असंख्य मित्रगण औपचारिक रूप से शुभकामनाएं देंगे और मैं दिल से सभी का धन्यवाद करूंगा.

मैं प्रार्थना करता हूँ की की ‘मेरे अपने’ सभी लोग अपने परिवारों सहित स्वस्थ, सुरक्षित औए सुखी रहें. विश्व भर में kovid-19 का जो विषाणु है जल्दी ही उसको नष्ट करने के प्रयास पूरी तरह सफल हों. एक नई सुबह का आगाज हो और फिर से प्रबल खुशहाली का प्रकाश हो.
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बुधवार, 6 नवंबर 2019

ना काहू से दोस्ती ....




पुलिस और वकील एक ही परिवार के दो सदस्य से होते हैं, दोनों के लक्ष समाज को क़ानून सम्मत नियंत्रित करने के होते हैं, पर दिल्ली में जो हुआ या हो रहा है उसकी जितनी निंदा की जाए कम होगी. मैं अपने नजदीकी लोगों के उन परिवारों को जानता हूँ जिसमें एक भाई पुलिस में तथा दूसरा एडवोकेट के बतौर कार्यरत हैं. पुलिस में प्राय: छोटे पदों पर कम पढ़े लिखे लोग नियुक्त रहते हैं जबकि सभी  वकील कानूनदां ग्रेज्युएट होते हैं .

सच तो ये है कि आज भी पुलिस की मानसिकता व कार्यप्रणाली ब्रिटिस कालीन चल रही है, इसके सुधार की कई बार बड़ी बड़ी बातें सरकारें करती रही है लेकिन  धरातल पर आज भी पुलिसवाला अपने को हाकिम समझता है और उसी लहजे में बात व्यवहार किया करता है.

वकीलों की बात करें तो कुछ गुणवन्तों को छोड़कर अधिकतर ने इस आदरणीय पद की गरिमा का अवमूल्यन कर रखा है. सच को झूठ तथा झूठ को सच साबित करना ही बड़ी कला रह गयी है. क़ानून की सही व्याख्या करने के बजाय क़ानून में पोल ढूढना वकालत कहलाने लगी है.

मेरे जैसे साधारण नागरिक को ये जानकार बहुत दुःख हुआ कि हाईकोर्ट परिसर में वकीलों की गुस्साई भीड़ ने सरकारी गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया. मैं वकीलों के संगठनों  के मुखियाओं से कहना चाहूंगा कि ये नादानियां बिलकुल बंद करवाई जानी चाहिए.

पुलिस में हो या वकालत में दोनों को संयम के पाठ पढाये जाने चाहिए, जिन लोगों ने माहौल बिगड़ने में जोर लगाया है उनको जरूर दण्डित किया जाना चाहिए.

हो क्या रहा है कि पुलिस महकमे (सी.बी.आई./ गुप्तचर विभाग से लेकर पुलिस चौकी तक ) का राजनीतिकरण हो गया है. नतीजन हर फैसले में अन्याय की बू आने लगी है.
वकीलों में भी जो लोग सत्ता के करीबी हैं वे खुद को न्यायाधिकरण से ऊपर समझने लगे हैं.

प्रबुद्ध लोग कुछ कहने में डरने लगे हैं क्योकि सत्ता से असहमति का अर्थ राष्ट्र्द्रोह कहा जाने लगा है. कर्णधारों को इस पूरी समस्या पर गंभीरता से विचार करना होगा.
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शनिवार, 19 अक्टूबर 2019

सिंदरी से - ५ धन- धान्यवाद - धनबाद


एक समय था जब खदानों के बारे में पढाई सिर्फ धनबाद में ही हुआ करती थी, एसीसी की खदानों में कार्यरत इंजीनियर्स सभी धनबाद रिटर्न हुआ करते थे.

धनबाद शहर झारखण्ड का रांची के बाद सबसे बड़ा शहर है. इस शहर की बनावट भी आम भारतीय कस्बों की तरह ही विक्सित हुई है. सन १९५६ से पहले ये इलाका बंगाल  प्रांत के मनभूम का हिस्सा था, इसे बाद में जिला की पहचान दी गयी औए ये बिहार का हिस्सा बन गया.

इतिहास में दर्ज है कि इसे सन १९१८ में ‘धान बाईद’ से संशोधित करके धनबाद नाम दिया गया था. कोयलांचल के इस उपजाऊ धरती पर एक विशिष्ट धान (चावल) ‘बाईद’ पैदा होता था/ है.

यहाँ के सभी प्राइवेट कोल माईन्स का राष्ट्रीयकरण स्व.प्रधान मंत्री इंदिरा गाधी के समय में हुआ था. कोल इंडिया का मुख्यालय धनबाद में ही है. इतिहास में दर्ज है कि सन १७६४ में अंग्रेजों ने बक्सर के युद्ध में मुग़ल शासक को पराजित करके एक संधि कर ली जिसे (‘इलाहाबाद संधि’ के नाम से जाना जाता है) इस इलाके को अपने अधीन कर लिया था.

अंग्रेजों के कब्जे के बाद आदिवासी लोग बेदखल किये जाने लगे तथा उनकी महिलाओं पर अत्याचार होने लगे थे तो एक क्रांतिकारी नौजवान ‘बिरसा मुंडा’ ने हथियार उठाकर अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे. अपने इस महानायक को आदिवासी लोगों ने भगवान् का दर्जा दिया हुआ है. बाद में प्रशासन ने अनेक स्कूल-कालेज, पार्क व संस्थानों को बिरसा मुंडा नाम से जोड़कर अमर किया हुआ है. बिरसा मुंडा इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलाजी तथा रांची स्थित बिरसा एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी इसके बड़े उदाहरण हैं.

हावड़ा के मुख्य रेल मार्ग से जुड़ा हुआ धनबाद, सिंदरी से महज २८ किलोमीटर दूर है. समृद्ध बाजार व मॉल देखकर लगता नहीं है कि ये खनिज अ वन संपदा वाला इलाका कभी ‘बीमारू राज्य’ का हिस्सा रहा होगा.
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शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2019

सिन्दरी से - ४



पुरानी यादों को ताजा करने के लिए संस्मरण लिखे जाते हैं, कड़वी, मीठी या अंतर्मन को गुदगुदानेवाली यादें अक्सर स्वांत:सुखाय होती हैं तथा अन्य पात्रों को चुभ भी सकती हैं . मेरे एक मित्र एडवोकेट रविशंकर पाण्डेय जी ने लिखा है कि “इसीलिये अब संस्मरणों के बजाय उपन्यास लिखे जाते हैं.”

यहाँ सिन्दरी नगर में मैंने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और कुछ विवरण अपने ब्लॉग / फेसबुक पर लिख डाले तो सिंदरी से सम्बंधित रहे अनेक मित्रों के सन्देश मुझे मिल रहे हैं. ये बहुत स्वाभाविक है कि हम जिन जगहों पर रहते हों या जिन लोगों के सानिध्य में रहे हों उनसे लगाव हो ही जाता है.

कोयम्बटूर से श्री रामकृष्णन सुंदराअय्यर लिखते हैं कि वे सिंदरी प्लांट में १९६७ से ७३ तक चीफ बर्नर के बतौर  कार्यरत रहे थे, तब एम्.एल.नरूला जी (retired as M.D.) यहाँ पर असिस्टेंट इंजीनियर हुआ करते थे. रामकृष्णन जी ने अपने समय की प्रोडकसन संबंधी उपलब्धियों का भी जिक्र किया है.

श्री आशीष शुक्ला लिखते हैं कि उनके बचपन के कुछ साल यहां पर बीते थे, यहाँ का विवरण पढ़कर उनको बहुत अच्छा लगा है. उनके पिताश्री यहाँ पर कैमिस्ट रहे थे.

श्रीमती अल्पना जोशी सुपुत्री स्व. मदन प्रकाश भारद्वाज (स्व. वेद प्रकाश भारद्वाज जी के अनुज) की बचपन की अनेक स्मृतिया ताजी हो आई हैं.मदन प्रकाश जी लाखेरी से प्रमोट होकर यहाँ लम्बे समय तक चीफ बर्नर/ मास्टर बर्नर रहे थे.

श्रीमती ममता जोबंपुत्रा गोंसाल्वेज को भी सिन्दरी में बिताये अपने बचपन के दिन याद आये हैं, उनके पिता स्व. जोबंपुत्रा जी लाखेरी से प्रमोट होकर यहाँ अकाउन्ट्स आफीसर बने थे और यही उनका देहावसान हुआ था.

सिन्दरी है ही बड़ी सुन्दर जगह, मैं पिछले दस दिनों में यहाँ की भव्यता / दुर्गा पूजा समारोहों/ दर्शनीय स्थलों को देख रहा हूँ आवासीय कालोनी में लगता है कि मैं लाखेरी/ शाहाबाद में ही विचरण कर रहा हूँ.

इस नई जगह में मेरे रिश्तेदारों के अलावा मुझे कोई  जानने वाला-पहचानने वाला नहीं होना चाहिए, पर दुर्गापूजा के पांडाल में यहाँ के कर्मचारी यूनियन के पदाधिकारी मुझे  घूरते नजर आये, उनको लग रहा था की उन्होंने मुझे कहीं देखा जरूर है. इनसे मुम्बई में सीमेंट वर्कर्स फैडरेसन की मीटिंग्स में अवश्य मुलाक़ात हुई रही होगी. सच है कि आपका बीता हुआ कल आपका आजीवन पीछा करता रहता है. बहरहाल मैं खुशनसीब हूँ कि उम्र के इस पडाव पर मैं ट्रेड यूनियन एक्टिविटीज के प्रति उदासीन हो गया हूँ तथा देश की दलीय राजनीति में भी सन्यासी बन गया हूँ. हाँ लिखना मेरा शुगल जारी है.
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बुधवार, 9 अक्टूबर 2019

सिन्दरी (झारखण्ड) से -३



धनबाद जिले का ये क्षेत्र प्राकृतिक संपदाओं से समृद्ध है इसलिए चूना-पत्थर,कोयला, लौह अयस्क व अन्य खनिजों के उत्पादों के लिए अनेक बड़े उद्योगों की स्थापना देश की आजादी के बाद यहाँ हुई है, तदनुसार ही प्रशिक्षित तकनीकी विशेषज्ञों की आवश्यकता हुई तो बिरसा मुंडा प्राद्योगिक संस्थान व अन्य इंजीनियरिंग कालेजों की स्थापना हुई. यह बात विशेष है कि इन्ही उद्योगों की वजह से सिन्दरी एक मैट्रोपोलीटीयन सिटी बन गयी. जिसमें कला, साहित्य और संगीत का भी स्वाभाविक विकास हुआ है; पर यहाँ आज भी आदिवासी ‘मुंदरी’ भाषा के मनमोहक गीत व भजन सुने जा सकते हैं.

FCIL खाद का कारखाना – यों तो एक ब्रिटिस कैमिकल कम्पनी ने १९४४ में ही यहाँ अमोनियम सल्फेट + जिप्सम से उर्वरक बनाना शुरू कर दिया था पर उर्वरक को रफतार तब मिली जब देश आजाद हुआ १९५१ में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. जवाहरलाल नेहरू ने खाद कारखाने का उदघाटन करते हुए कहा था कि “ आधुनिक भारत के मंदिर का उदघाटन कर रहा हूँ.” बाद में १९५९ व १९६१ में देश के अन्य उर्वरक उद्योगों का विलय करके इसे एक निगम बना दिया गया जिसे FCIL  नाम दिया गया. अमोनियम सल्फेट , यूरिया व अमोनियम नाइट्रेट यहाँ के मुख्य उत्पाद थे. २० हजार से अधिक लोगों को रोजगार उपलब्द्ध था पर धीरे धीरे उत्पाद की लागत बढ़ने, नवीनीकरण न होने से तथा मिस मैनेजमेंट के चलते (सरकारी उद्यमों की बीमारी रही है) ये कारखाना लगातार घाटे में चलने लगा था और घिसटते हुए सन २००२ में बंद हो गया ; थी उसी तरह जैसे लाखेरी के पड़ोस में सवाईमाधोपुर का डालमिया सीमेंट उद्योग बंद हुआ था. इस पर भी बहुत राजनीति हुई पर उद्योग से जुड़े लोगों ने बड़ी त्रासदी झेली है.

इन कारखाने को पुनर्जीवित करने सं २००७ से ही सार्थक प्रयास हुए पर अब छोटे स्तर पर जीवित करने को २०१९ जनवरी में बेसिक कार्य शुरू हुआ है. इस नए प्रोजेक्ट में इनपुट के लिए हल्दिया से गैस पाईप लाइन डालकर गैस का इस्तेमाल किया जाना है.

इस बीच पुराने कारखाने के बदहाल खंडहरों व मशीनों को तथा आवासीय कालोनी से अवैध कब्जों को हटाने की प्रक्रिया चल रही है. लोग १६ साल बाद फिर से खुशियों के इन्तजार में है.
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सिन्दरी (झारखण्ड ) से



एसीसी सीमेंट प्लांट सिन्दरी की स्थापना सन १९५४ की है, १९९५ के बाद इसे केवल ग्राइंडिंग प्लांट में तब्दील कर दिया गया, अपने दुसरे प्लांट से मंगवाए गए क्लिंकर में आयरन स्लैग व जिप्सम मिलाकर पैक किया जाता है. टाटा स्टील कंपनी से स्लैग की अच्छी उप्लब्धता है. इसकी प्रतिदिन उत्पादन क्षमता ९००० टन बताई गयी है.

प्लांट हेड के कार्यालय में एक बोर्ड पर अब तक के सभी २७ प्लांट हेड्स के नाम हैं. इनमें से दस से अधिक महानुभावों को मैं भी व्यक्तिगत रूप में जानता हूँ क्योंकि ये लोग लाखेरी प्लांट में भी महत्वपूर्ण पदों पर थे.

स्व. पी.वी.धर्माधिकारी १९६० में मेरे इण्टरव्यू लेनेवालों के पैनल में थे, तब वे चीफ कैमिस्ट के पद पर थे दस साल बाद वे शाहाबाद कारखाने में भी मिले, मृदुभाषी, हँसमुख, और हितैषी धर्माधिकारी जी का नाम प्लांट हेड की लिस्ट में देखकर उनका सानिध्य याद आ गया.

मि. एम्.डी.साने सन साठ में प्लांट इंजीनियर थे उनकी धर्मपत्नी श्रीमती साने एसीसी स्कूल में टीचर हुआ करती थी. सर्व श्री एस. आर अय्यर , बी.के. गंगवार ,बी.डब्व्लू. कुवेलकर सभी अपने समय में लाखेरी के चीफ इंजीनियर रहे थे. स्व. पी.बी. दीक्षित १९८५-८६ में प्लांट हेड रहे , पर वे उससे पहले यहां काफी से तक चीफ कैमिस्ट भी रहे थे.  यों बोर्ड पर उन अपनों को देखकर आनादानुभूति हुई है. वर्तमान में श्री सुरेश चन्द्र दुबे यहाँ डाइरेक्टर प्लांट हैं.

स्पोर्ट्स क्लब में घूमते हुए मैंने एक सज्जन से ‘सिन्दरी’ शब्द की व्यत्युत्पत्ति के बारे में जानना चाहा तो उन्होंने बड़ी मजेदार बात बताई कि “यहाँ की मिट्टी लाल (सिंदूरी) है, सिंदूरी का अपभ्रंश सिंदरी है, इसमें कितना तथ्य है मैं कह नहीं सकता हूँ. इन्ही दिनों यहाँ के एक हिन्दी अखबार में समाचार छापा है कि एक बड़े नेता जी ने सिन्दरी को ‘सुन्दरी’ कहा तो श्रोताओं ने खूब आनंद लिया. इसी तरह प्रदेश के झारखंड नाम पर भी लोगों की व्याख्या सुन कर अच्छा लगा की झार या झाड़ का अर्थ पेड़ होता है और ये पूरा राज्य लगभग झाड़ाच्छादित है.

सिंदरी के एसीसी कालोनी में भी इतने घने पेड़ हैं कि ‘वर्षावन’ का अहसास होने लगता है.
क्रमश:
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शुक्रवार, 9 नवंबर 2018

सबकी माँगू खैर


मेरे २००० से अधिक फेसबुक मित्रों में आदरणीय आर.के.सूरी जी अनन्य हैं, वे एसीसी के बड़े अधिकारी रहे हैं इसलिए मेरा एक ‘फॉर्मल बोंड’ उनके साथ है. वे अकसर अपनी वॉल पर ज्ञानवर्द्धक/ समसामयिक लेख प्रकाशित करते रहते हैं जिसे उत्सुकतापूर्वक पढ़ा जाता है; पर कभी ऐसा भी होता है कि ‘अच्छी किताब व अच्छे इंसान को पहचानने के लिए काफी समय तक पढ़ना पड़ता है.

सूरी साहब ने कुछ साल पहले इसी तरह फेसबुक पर उद्योगपति विजय माल्या की सुबुद्धिमता की बड़ी तारीफ़ की थी. एक दृष्टान्त देकर उन्होंने लिखा कि एक बार अमेरिका से यूरोप की यात्रा के समय माल्या ने अपनी कीमती कार महज  ५०० डॉलर में बैक को गिरवी रखी थी. वापसी पर बैक के अधिकारी ने जब उससे पूछा तो कहा कि कार की सुरक्षित पार्किंग के साथ ५०० डॉलर का व्याज इतना मामूली देना पडा अन्यथा बाहर कार की पार्किंग शुल्क बड़ी रकम के रूप में चुकानी पड़ती. माल्या की व्यावसायिक कुटिलता की राष्ट्र्धातक कहानियां बाद में निरंतर उजागर हुई हैं.

इसी तर्ज पर बलात्कार के आरोपी नामनिहाल सन्त आसूमल उर्फ़ आशाराम की एक वीडिओ क्लिपिंग में मैंने देखा कि स्व.अटल जी, अडवानी जी, नरेंद्र मोदी जी, राजनाथसिंह जी व दिग्विजयसिंह जी जैसे माननीय जन नत मस्तक होकर उनका आशीर्वाद ले रहे थे. आसूमल के पापों का घडा देर से भरा और अंधभक्तों की समझ में उसका असली रूप  बहुत बाद में आया है.

आजकल राजनीति के परिपेक्ष में कीमती धातुओं की मूर्तियाँ बनाने का काम जोरों पर चल रहा है, मायावती जी ने अपने जीतेजी अपनी और स्व. कांसीराम की मूर्तियाँ खडी कर दी , जो इन दिनों लावारिश सी नजर आने लगी हैं.

नेहरू जी व गांधी परिवार ने लम्बे समय तक राज किया इसलिए उनके असंख्य स्मारक देश में हैं लेकिन इसमें उनका अपना कोई दोष नहीं है क्योंकि उनके स्वर्गवास के बाद फालोवर्स ने ये काम किया है. लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद नये रहनुमाओं को ये चुभ रहे हैं. मोदी जी ने गुजरात में ‘सरदार सरोवर’ के स्थल पर सरदार वल्लभ भाई पटेल की एक बड़ी मूर्ती की स्थापना हाल में की है जो दुनियाँ में सबसे ऊंची बताई गयी है. ‘सरदार सरोवर’ जवाहरलाल नेहरू ने पटेल साहब की स्मृति में बनवाया था. पर ये मूर्ती की स्थापना में कुछ इस तरह की भावना व्यक्त की जाती रही कि नेहरू के व्यक्तित्व तथा कृतित्व को कमतर आंका जाए. एक समय कांग्रेसी गृहमंत्री सरदार पटेल ने गांधी हत्याकांड के बाद आर.एस.एस.पर प्रतिबन्ध लगाया था, पटेल साहब जब १९४९ में स्वर्गवासी हुए तो आर.एस.एस. ने उनकी अंतिम यात्रा का बहिष्कार किया था, इसलिए ये कहा जा रहा है कि राजनैतिक हित साधना के लिय विशुद्ध रूप से ये प्रेम जागा है. इन बरसों में हमने देखा है कि नरेंद्र मोदी जी नेहरू को गरियाने का कोई मौक़ा नहीं चूकते हैं.  बहरहाल अब ये विराट मूर्ती देश के लिए एक ऐतिहासिक सौगात है, इसके खर्चे-पर्चे व उद्देश्यों पर ना जाकर नकारात्मक ना सोचा जाए तो ही अच्छा है.

मुम्बई में शिव सेना स्व.बाल ठाकरे जी की तथा केंद्र सरकार हिन्द महासागर में शिवा जी की बड़ी मूर्ती लगाने का आह्वान कर चुके हैं.

कल के अखबारों में एक खबर छपी है की मेरठ के एक भक्त नरेंद्र मोदी जी की एक बड़ी मूर्ती लगाने की तैयारी कर रहा है. ये सिलसिला अवश्य अंतहीन है लेकिन विकासशील देश की सद्य प्राथमिकताएं  और भी बहुत हैं.

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बुधवार, 24 अक्टूबर 2018

ये हो क्या रहा है?



एक सज्जन दवा की दूकान से कीड़े मारने की दवा खरीद कर लाये, घर आकर जब उस डिब्बे की खोला तो पाया कि उसमें असंख्य कीड़े कुलबुला रहे थे.

इस दृष्टान्त को आज हम साक्षात देख रहे हैं कि भारत सरकार की निगरानी तंत्र वाली सर्वोच्च संस्था सी.बी.आई. के उच्चाधिकारी आपस में खुलेआम भारी भरकम रिश्वत लेने के आरोप लगा रहे हैं; इनमें से कुछ पर सत्ताधारियों की नजदीकियां जग जाहिर हैं.

इसमें दो राय नहीं हैं कि देश का पूरा पुलिस तंत्र इस सापेक्ष में हमेशा बदनाम रहा है और सत्ता पर काबिज राजनेता इनका भरपूर उपयोग अपने हितों में करते रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट ने एक से अधिक बार सी.बी.आई. को सरकारी तोता तक कहा है.

यह भी सही है कि पूर्ववर्ती सरकार के दौरान जिस पत्थर को पलटो उसके नीचे भ्रष्टाचार के कीड़े नजर आने लगे थे, पिछले २०१४ के आम चुनावों में ये मुख्य मुद्दा बना था और लोगों ने भारी बहुमत से नई सरकार को जिम्मेदारी सौंपी थी. हमारे प्रधानमंत्री जी ने देश व विदेश में कई मौकों पर कहा कि अब उनके राज में कोई घोटाला नहीं हो रहा है उन्होंने एक बड़ा जुमला भी फैंका था कि ‘ना खाऊँ, ना खाने दूगा’ पर हकीकत में ये महज चुनावी गालियाँ बनकर रह गयी. बड़े बड़े बैंक घोटाले उजागर हुए हैं, जिन पर ज्यादातर गुजराती तड़का लगा हुआ है.

नजदीकी लोगों को बेशुमार फायदा पहुंचाने के लिए प्रधानमंत्री जी का नाम राफेल जैसे विवादास्पद विमान सौदे में लिया जा रहा है, सरकार द्वारा इसकी असलियत नहीं बताये जाने से आम लोगों के मन में गंभीर संशय पैदा होना स्वाभाविक है.

जोर-शोर से कोई बात बोल देने से झूठ सच नहीं हो सकता है तथा एक झूठ को छुपाने के लिए सौ झूठ बोलने पड़ते है, ये पुरानी कहावत है.

आज प्रिंट मीडिया व इलैक्ट्रोनिक मीडिया अकसर सत्य से परे विरुदावली गा रहे हैं ऐसे में कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि ये हो क्या रहा है?

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मंगलवार, 28 अगस्त 2018

आरक्षण - जिंदाबाद / मुर्दाबाद.



हिन्दू समाज में पौराणिक काल में जो वर्ण व्यवस्था तय की गयी थी वह २० वीं सदी तक आते आते विकृत होकर कोढ़ बन गयी थी. इसीलिये समाज को बांटने वाली इस परम्परा के विरुद्ध समाज सुधारकों, अग्रगण्य लोगों व कानूनविदों ने आवाज उठाई. देश आजाद हुआ और अपना संविधान बना तो उसमें सभी बर्गों के लोगों की समानता के लिए अनेक कानूनों की व्याख्या दी गयी. दलित व पिछड़ी जातियों के लोगों को ऊपर लाने के लिए कई तरह से सुविधाओं में आरक्षण दस बर्षों के लिए घोषित किये गए, जिनके अनुसार इन वर्गों के समस्त लोगों को पढाई में कम अंकों में उतीर्ण करने, स्कूल फीस में भारी छूट, अनेक वजीफे, तथा सरकारी नौकरियों में आरक्षण के अलावा सभी संवैधानिक व लोकतांत्रिक संस्थाओं के पदों में अनुपातिक आरक्षण दिया गया और इसके बहुत अच्छे सकारात्मक परिणाम आये भी. इन पिछड़े वर्गों प्रबुद्ध पढ़े लिखे लोग बराबरी या बराबरी से भी ऊपर निकलते रहे. पिछली सरकारों ने इस आरक्षण व्यवस्था को कई बाए फिर फिर बढाया भी. कुछ राज्य सरकारों ने दलित व अनुसूचित जन जातियों के अपने कर्मचारियों को प्रमोशन में भी प्राथमिकता का नियम बनाया. फलत: इस वर्ग में एक ‘क्रीमी लेयर’ अलग से बन गयी. ये भी सच है कि एक बहुत बड़ा तबका अज्ञानता की वजह से आज भी वहीं है जहां आजादी के समय था. जाग्रति जरूर आई लेकिन दुर्भाग्य ये रहा कि इन दलित जातियों व आदिवासियों के अपने अन्दर से ठेकेदार उभरकर सामने आये, नतीजन आरक्षण का भरपूर लाभ कुछ ही लोगों तक सीमित रहा है

इधर नामनिहाल गरीब सवर्णों में व अन्य धर्मावलम्बी गरीबी रेखा के नीचे जीने वाले लोगों में स्वाभाविक रूप से असंतोष घर करता रहा है. दलितों के मुकाबले तमाम सुविधाओं में निरंतर उपेक्षा किये जाने के कारण हार्ट बर्निंग  व  आपसी टकराव होते रहे हैं. इसी के परिणाम स्वरुप  राजस्थान में ‘गुर्जर आन्दोलन’ , हरियाणा में ‘जाट आन्दोलन’, गुजरात में ‘पटेल आन्दोलन’ जैसे घमासान हुए हैं और आज भी उनकी आग ठंडी नहीं हुई है.

आरक्षण के बरदान स्वरुप दलित व पिछड़ी जातियों की जो पीढियां सम्रद्धि व पद पाकर ऊपर आ चुके हैं वे अब इसे जन्मजात हक़ समझकर छोड़ना नहीं चाहते हैं, सभी राज नैतिक दलों में इनकी लाबियाँ प्रबल हैं इसलिए चाहते हुए भी कोई दल रिस्क नहीं लेना चाहता है कि ये वोट बैक उनसे टूटे.

आज जब देश के राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, अनेक राज्यपाल, अनेक मंत्रीगण व नौकरशाह आराक्षित वर्गों के ही  विराजमान हैं तो ये उम्मीद करना कि ये आरक्षण में कोई  परवर्तन लाने की दिशा में सोचेंगे या कार्य करेंगे एक दिवास्वप्न से ज्यादा कुछ नहीं होगा.

ये भी सच है की इस तरह की आरक्षण व्यवस्था दुनिया के किसी देश में नहीं है तथा आरक्षण के फलस्वरूप योग्य व्यक्तियों के पिछड़ने से एक बड़ी सामाजिक कुंठा पैदा हो रही है जो नए वर्ग संघर्ष का रूप ले सकता है. ऐसे में देश के सर्बोच्च न्यायालय ने इस जातिगत आरक्षण पर अपने फैसले में कुछ आवश्यक सुधार किये थे ; जैसे कि जाति सूचक आक्षेप पर बिना जांच पड़ताल के गैर जमानती  गिरफ्तारी ना की जाए, क्योंकि पिछला इतिहास बताता है ऐसे ७० से ८० प्रतिशत मामले झूठे निकले हैं.(हाल में नोयडा में एक दलित एस.डी.एम्. द्वारा बुजुर्ग कर्नल को अपमानित करने के लिए इसी प्रावधान का इस्तेमाल किया जिसकी कलई बाद में खुल गयी है.) प्रमोशनों में योग्यता/ बरिष्ठता को आधार माना जाए नाकि जातिगत योग्यता. इस पर हो-हल्ला व सडकों पर आन्दोलन होने लगे तो वर्तमान सरकार ने एक अध्यादेश जारी करके सर्बोच्च न्यायालय के फैसले को निरस्त करने की जो गलती की है उसका दुष्परिणाम लम्बे समय तक देश को भुगतना पडेगा.

अब सवर्णों में जबरदस्त उबाल है, जो लोग कल तक मोदी जी के अंधभक्त थे उनमें से कई ने अपने जहरीले उदगार व्यक्त किये हैं. एक पंडित जी ने फेसबुक पर यहाँ तक लिखा है कि “बीजेपी के लिए वोट का बटन दबाने में मुझे अब ऐसा लगेगा की मैं अपने बच्चों का टेंटू दबा रहा हूँ.” नाराज लोग ‘नोटा’ की सलाह भी दे रहे हैं, पर ये समस्या का कोई हल नहीं है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले को निरस्त करने का कलंक मोदी सरकार पर रहेगा, निश्चय ही इसका नुकसान उनकी पार्टी को उठाना पडेगा.

सबसे अच्छा ये होता कि आरक्षण पूरी तरह आर्थिक विपिन्नता तथा व्यक्तियों की विकलांगता को आधार मान कर तय किया जाता. ये लक्षण भी अच्छा है कि प्रबुद्ध लोग इस विषय को गंभीरता से ले रहे हैं और बहस जारी है.

आज मेरे इस लेख के समापन से पूर्व एक खबर ये भी एक टी.वी. चेनल द्वारा प्रसारित की है कि गुजरात हाईकोर्ट ने सभी जातिगत आरक्षण समाप्त करने पर एक महत्पूर्ण निर्णय दिया है. इसकी पड़ताल अभी बाकी है.

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शुक्रवार, 24 अगस्त 2018

आदरणीय अटल जी के नाम :



आप भी उस देश चले गए हैं जहां से ना कोई चिट्ठी ना कोंई सन्देश आते हैं. आपने अपनी एक रचना में लिखा है कि “मैं फिर से आऊँगा....” पर मैंने तो आपके मोक्ष की कामना की है ताकि आप जन्म-मरण के बंधनों से मुक्त होकर परमात्मा में विलीन हो जाओ. वैसे अब ये धरती आप जैसे धर्मसहिष्णु व सर्वजन हिताय भावना के चाहने वालों के लायक रही भी नहीं है.

मैं अनुभव कर रहा हूँ की आपके अवसान के बाद लोग आपकी मौत को अपने पक्ष में भुनाने की पुरजोर कोशिश में लगे हुए हैं. तमाशों व हँसी ठठ्ठों के बीच आपकी राख को उन जगहों पर नदी-नालों में विसर्जित किया जा रहा है जहां डालने का कोई महत्व नहीं है. हमारे उत्तरांचल में अवशेष उन्ही जगहों पर विसर्जित किये जाते हैं जहां का जल गंगा नदी तक पहुचता है. अन्यथा सीधे गंगा में अर्पित किये जाते हैं.

कोटा के एक वकील स्वनामधन्य श्री दिनेश द्विवेदी जी (मेरे फेसबुक मित्र) ने चम्बल के श्मशान घाट में अस्थिविसर्जन पर सही अंगुली उठाई है. उन्होंने आपकी मृत्युपरांत फेसबुक पर एक लतीफा मुल्ला नसरुद्दीन ( a wise man) के बारे में डाला था , मुझे उसका गूढ़ अर्थ बार बार हाँट करता आ रहा है. उस लतीफे को मैं पुन: अपने शब्दों में लिख रहा हूँ लेकिन मैं निवेदन भी करना चाहता हूँ कि इसे सीधे सीधे अपने सम्बन्ध में बिलकुल ना लें. लतीफा इस प्रकार है:

एक थे फन्नेखां लम्बरदार, वे तब की सियासत के बड़े लम्बरदार थे, उनके गाँव के लोगों ने मिलकर उनको लंबरदारी से हटवा दिया था क्योंकि उसकी फकत लफ्फाजी से व उनकी औलादों/ कारिंदों के अत्याचारों से सब दुखी थे. एक दिन लम्बरदार जी खुदा को प्यारे हो गए तो दफनाने के लिए खानदानी कबरिस्तान में ले जाये गए. धार्मिक नियम के अनुसार उनको जमींदोज करने से पहले उनके बारे में कुछ अच्छे शब्द बोले जाने थे पर लोग थे कि सबके मुंह में दही जम गया. मौलवी साहब ने वक्त की नजाकत देखते हुए पड़ोसी गाँव से मुल्ला नसुरुद्दीन  को बुला भेजा, मुल्ला नसुरुद्दीन सारा माजरा समझ गए और कार्यक्रम को आगे बढाते हुए बोले “ लम्बरदार साहब अपनी औलादों के मुकाबले ‘बहुत अच्छे’ थे”. ऐसा कहते ही कब्र पर मिट्टी डालनी शुरू हो गयी. पता नहीं लम्बरदार जी को जन्नत नसीब हुयी या नहीं पर उनकी औलादें जश्न मनाने में व्यस्त ही गयी क्योंकि रोकाने-टोकने वाला कोई  ना रहा था.

ज़माना सब देख रहा है, समझ रहा है पर आपके जाने का गम / भय उन लोगों को ज्यादा सता रहा है जो मानते थे कि ‘एक सही आदमी गलत पार्टी में’ था. (आपके लोकसभा में दिए गए एक भाषण से साभार).

आपने ये भी लिखा है कि ‘मर्जी से जिऊँ और मन से मरूं’ लेकिन आपकी मृत्यु पर एक वारिस का कहना है कि “अटल जी ने जाने का गलत टाईम चुना, उनको अगले साल उत्तरायण तक भीष्म पितामह की तरह सर शय्या पर रहना चाहिए था तब उनकी अंतिम यात्रा और कलश यात्राएं ज्यादा भव्य होती.” उसने अफसोस जाहिर किया कि अपने देश की अधिसंख्य जनता की याददाश्त महज पंद्रह दिन होने से उनके चपाटों को सम्पैथी वोट लोकसभा के चुनावों में शयद ही मिल पायेगा.

अंत में, जो ये कहते हुए सुने गए थे “मैं आपको ‘बड़ा’ इसलिए दीख रहा हूँ कि अपने बुजुर्गों के कन्धों पर सवार हूँ,” वे आपके अवसान के बाद जमीन पर आ गए हैं. खुदा खैर करे.
मैं हूँ आपका एक प्रशंसक.


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रविवार, 12 अगस्त 2018

हेल्थ टिप - (७)



दवाईयाँ – हमारी ये दुनिया अनेक विविधताओं से बनी है, देश, काल व परिस्थितियों के अनुसार अलग अलग जगहों पर मानव संस्कृतियों का विकास हुआ तदनुसार ही चिकित्सा पद्धतियों का जन्म भी होता रहा है. १९ वीं २० वीं सदी तक आते आते विज्ञान के प्रादुर्भाव का असर भी सभी पद्धतियों पर पडा है.

हमारे देश भारत में आयुर्वेद प्राकृतिक चिकित्सा के रूप में विकसित हुआ जिसमें हर्बल यानि वानस्पतिक जडी-बूटियों व धातुओं की भस्मों को दवा के रूप में इस्तेमाल किया जाता है; इसी प्रकार यूनानी चिकित्सा पद्धति  की अपनी पुरानी पहचान है, चीन – जापान की इसी तरह की अपनी दवाएं होती हैं. कुछ सदी पहले जर्मनी में होम्योपैथिक पद्धति ने जन्म लिया जिस पर दुनिया के अनेक लोग विश्वास किया करते हैं. पर दुनिया भर में आज सबसे विश्वसनीय एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति मानी जाती है क्योंकि इसका विकास शुद्ध वैज्ञानिक शोधों पर आधारित है इसमें कैमिकल औषधियों द्वारा प्रतिरोधात्मक शक्तियों को इलाज के लिए प्रेरित किया जाता है तथा सर्जरी द्वारा इसमें क्रान्ति लाई गयी. एक्स रे व लेजर टेकनीक से अब असीमित संभावनाएं इस पद्धति में विकसित हो गयी हैं. ये शोध निरंतर जारी हैं.

यद्यपि मरे हुए को ज़िंदा करना यानि अमरता की परिकल्पना अभी वैज्ञानिक उपलब्धि से बहुत दूर है पर अब लोगों की समझ में आ गया है की टोनों- टोटकों या झाड फूक का ज़माना अब नहीं रहा है. हाँ अभी भी बहुत से अंधरे कोने बचे हैं जहां अभी तक प्रकाश की किरणें नहीं पहुच पाई हैं.

वैसे प्रकृति ने हमारे शरीरों में रोग प्रतिरोधात्मक शक्तियां स्वयं प्रदान की हुयी हैं, एक विचारक ने लिखा है कि ९५% बीमारियाँ हवा पानी औए इम्युनिटी से ठीक हो जाती हैं, शेष ५% को इलाज की जरूरत होती है उनमें भी केवल ३% ठीक हो पाते हैं बाकी असाध्य ही रहते हैं या यमराज की भेट चढ़ जाया करते हैं.

कैमिकल औषधियां तुरत-दान असर तो करती हैं पर इनके साईड इफेक्टस बहुत रहते हैं, इसलिए इनके उपयोग के लिए अनेक क़ानून बनाए गए हैं विशेषकर जो शेड्यूल्ड ड्रग्स हैं उनका उपयोग बहुत सावधानी से करना चाहिए, योग्य चिकित्साधिकारी की सलाह पर ही लेनी चाहिए. एक जरूरी बात सभी पाठकों को कहना चाहूंगा कि अपने शरीर को कम से कम मेडीकेट किया जाए तो ही अच्छा है. मजबूरी में ही दवा खानी चाहिए.

एक समय था जब मेडीकल प्रोफेसन को सेवा का प्रोफेसन कहा जाता था, आज इसका बाजारीकरण हो गया है, पैसा बड़ा फैक्टर हो गया है चाहे मरीज की जान चली जाए. एक सर्वे के अनुसार ये भी बताया गया है कि लोग बीमारियों से कम, दवाओं के गलत प्रयोग से ज्यादा मर रहे हैं. इस सन्दर्भ में एक बुजुर्ग का बयान मजेदार है : पत्रकार ने उनसे उनके स्वस्थ लम्बे जीवन का राज पूछा “क्या आप डाक्टर के पास जाते हैं?” उन्होंने कहा “हाँ भाई, डाक्टर की तो हमेशा जरूरत रहती है इसलिए उसके पास जाना ही पड़ता है.” पत्रकार “फिर क्या करते हैं?” उत्तर “ फिर फार्मासिस्ट के पास जाता हूँ, उसको भी तो ज़िंदा रखना है.” पत्रकार फिर “बहुत सारी टैबलेट व कैप्स्यूल देता है जिनको लेकर घर आ जाता हूँ.” पत्रकार “आप सारी दवाएं खा लेते हो?” उत्तर “ नहीं भाई, मैं उन सभी गोली कैप्स्यूल्स को डस्टबिन में डाल देता हूँ क्योंकि मुझे भी तो ज़िंदा रहना है.”

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