सोमवार, 6 अगस्त 2012

बैठे ठाले - २

एक जमाना था लोग कोई भी नया काम आरम्भ करते या नया मार्ग अपनाते तो पहले खूब मनन करते, बड़े-बूढों की अनुभवी-पकी राय लेते, शकुन-अपशकुन विचारते, और ग्रहदोष देखते. बुरा हो इस बुरे जमाने का कि ऐसी करवट ली सारे आचार-विचार तथा मर्यादाएँ कुचल कर रख दी. जो कोई गुजरे कल को रोता है, उसी को बुर्जुआ का फतवा दे दिया जाता है.

मुझसे अगर आप ईमान-धरम (जो मेरा बीत चुका है) की कसमें दिला कर पूछें तो मैं रोने लगूंगा और वह भी दहाडें मार कर कि अब हम दिशाहीन व लक्ष्यविहीन बढ़े जा रहे हैं, फिर भी यह समझ रहे हैं कि ज़माना हमारी ताकत से ही दौड़ रहा है. (बैलगाड़ी के नीचे चलने वाले कुत्ते की तरह.) जीवन की तमाम विधाएं छितरा रही हैं और हम लूले-लंगड़ों की तरह सब को समेटने का असफल प्रयास कर रहे हैं.

जो लोग धर्म विहीन हैं, उन्होंने अपने नए मार्ग् बना लिए हैं और अपना मनचाहा दर्शन लोगों के कानों मे पेल रहे हैं. जो लोग कर्तव्य विहीन हैं या यूँ कह दूं की कर्महीन हैं उन लोगों ने राजनैतिक मंचों से समाज सेवा शुरू कर दी है. जो लोग काव्य विहीन हैं या यूँ कहना चाहिए की काव्य शास्त्र की पहली पायदान भी ठीक से नहीं देखी है, वे ऐसा लिख रहे हैं, जिसके हजार आदमी, हजार अर्थ निकाल रहे हैं. इस विषय पर जब एक काव्यकार से चर्चा हुई तो वे बड़े आत्मविश्वास से बोले, “ये क्या कम है कि हमने काव्य रचना को अर्थ मुक्त कर दिया है, अब जो मर्जी अर्थ निकालते रहो कोई विद्यार्थी फेल नहीं हो सकता है, बस संवेदना होनी चाहिए.”

चित्रकारी को ही लीजिए, यथार्थ के नाम पर सारे सौंदर्य की ऐसी की तैसी कर दी, फिर भी वाहवाही हो रही है कि पिकासो के झड्नाती ने ऐसी मौलिक रचनायें की हैं कि पूरे एक महीने आर्ट गैलरी जाकर देख रहे हैं तो भी पूरा सौंदर्य भरपेट नहीं पचा पा रहे हैं.

अधिक दूर क्यों जाएँ, यहीं देख लीजिए कि एक नामी पत्रिका ने ‘व्यंग्यकारों की खोज’ के नाम से एक विज्ञापन छापा तो सारे गदहे-घोड़े, तीतर-बटेर तक व्यंग्यकार बन गए, और ऐसा लिख मारा कि संपादक मण्डल लंबे अरसे तक इस दुविधा मे पड़ा रहा कि किसे व्यंग्य माना जाये और किसे ढोल-मृदंग?

बहरहाल विषय से दूर नहीं भागना चाहूँगा, और पुराने सिद्धांत ‘भेड़चाल’ को ही प्रतिपादित करता हूँ कि यार लोगों को जिधर दरवाजा खुला दिखा, वहीं घुसने की कोशिश करते हैं चाहे डिब्बा पहले से ठूँस भरा हो.

फैशन की बात करें तो लीजिए कचरे से कचरा आदमी की गलमुच्छें लहराती हैं. एक मुच्छड़ सज्जन एक बार बड़े रौब से फरमा रहे थे कि “मूंछ ना हो तो मर्द की मर्दानगी नहीं झलकती है. मूंछ हो तो महिलायें अपने आप अदब करने लगती हैं.” बहुत से पुरुष ‘मैं मर्द’ की भावना को ज़िंदा रखने के लिए अपनी खूबसूरती पर दाग लगाए रहते हैं. इसी तरह बहुत सी खूबसूरत महिलायें भी अपने चहरे पर छ: छ: इंच की फ्रेम वाले चश्मे चिपकाए रहती हैं. मैंने एक दिन एक देवी जी से सादर पूछ ही लिया, “आपकी खूबसूरत आँखों पर इतने बड़े रंगीन चश्मे का क्या राज है?” पहले तो वह कुछ सपकपाई फिर बोली, “भाईसाहब, फैशन है.” बस ‘भाईसाहब’ कहते ही मैं गुमसुम हो गया क्योंकि ये रिश्ता है ही ऐसा कि आगे छेड़छाड़ की गुंजाइश ही नहीं रहती है. यह भी है कि फैशन की इस भेड़चाल में लिंगों का अस्तित्व पहचान के अभाव में खतरे में पड़ा हुआ है.

साहित्य की बात करें तो गद्य और पद्य एकाकार हो गए है. छंद, अलंकार या मात्राओं का अनुशासन जैसे खतम हो चला है क्योंकि अब हाइकू का फैशन है. कुछ भी लिखो और उसका कुछ भी अर्थ निकालते रहो. पहले तो साहित्य पर ‘सु’,‘कु,’या ‘अ’ आदि विशेषणों को लगाने की आवश्यकता ही नहीं होती थी. उसे पढ़ कर उसकी खुशबू से दिमाग के पट खुल जाते थे और अब कुसाहित्य की भड़ासयुक्त सडांध आती है.

भेड़चाल की ठेला ठेली में कोई कोना अछूता रह गया हो, ढूंढें नहीं मिल रहा है. क्रिकेट के मैदान में कुछ लोग धोनी के दीवाने हैं तो दूसरे सहवाग के, खेल समझ मे आता हो या नहीं, स्कोर पूछ लेते हैं क्योंकि यह भी फैशन मे शुमार है.

मेरा नामपट्ट देखकर यूनिवर्सिटी के दस-बारह विद्यार्थी अदब के साथ आकर कहने लगे कि “डॉक्टर साहब हम लोग स्नातकोत्तर कक्षा के छात्र हैं, शोध के लिए आपका मार्ग दर्शन चाहते हैं.” मैंने मुस्कुराते हुए कहा “भाई, मैं तो होम्योपैथी का डॉक्टर हूँ, फिर भी आप लोग आ ही गए हैं तो मैं आपको शोध के नए विषय जरूर सुझा देता हूँ.” मैंने जो मौलिक विषय उनको बताये वे इस प्रकार हैं: 'हिन्दी दैनिक समाचार पत्रों के संपादकों की मजबूरी’, ‘भारतीय अखबारों के नामों की सार्थकता’, हिन्दी साहित्य को फिल्मों की देन’, हिन्दी साहित्यकारों की आपसी रंजिश’, ‘चीनी की मिठास और हमारे वर्तमान कृषिमंत्री’, ‘भारत मे दंगों का भविष्य’, और ‘आतंकवादियों के लिए चोर दरवाजे’. छात्र इन प्रगतिशील विषयों को लेकर शोध करने में व्यस्त हो गए होंगे और इसमें कोई शक नहीं कि ये सभी डॉक्टरेट की उपाधि से नवाजे जायेंगे. डॉक्टर होना भी तो एक बड़ा फैशन हो गया है.

यों मैं पिछले चुनावों से राजनेताओं के पेम्फ्लिट भी तैयार करने लगा हूँ. मुझे माननीय मन्त्री जी ने आश्वासन दिया है कि मेरी रचनाओं के प्रकाशन में सरकारी सहायता देकर कृतार्थ करेंगे. मुझे लेकिन डर भी है कि मेरे अन्दर की बात का सुराग लगते ही सारे छुटभय्ये कलमकार लाइन में ना लग जाएँ. यह भेड़चाल मुझे नुकसान पहुंचा सकती है.

***

2 टिप्‍पणियां:

  1. संक्षेप में कहा जाये तो दाँय मची है..

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी इस उत्कृष्ट प्रस्तुति की चर्चा कल मंगलवार ७/८/१२ को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी आपका स्वागत है |

    उत्तर देंहटाएं