सोमवार, 4 मार्च 2013

प्रतिरोधक

नैनीताल के जाने माने अस्थिरोग विशेषज्ञ डॉ. डी. जोशी की बेटी उमा ने माइक्रोबायोलॉजी में पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री तो हासिल कर ली, पर उसके बाद उसके मन-मस्तिष्क में एक अजीब ख़याल घर कर गया. वह घर बाहर सब तरफ रोगाणुओं, विषाणुओं, और कीटाणुओं के प्रति ज्यादा ही संवेदनशील हो गयी. कार में, बस में, ट्रेन में, या कहीं बाथरूम-टॉयलेट के दरवाजों/हैंडिलों में उसे संक्रमण के खतरनाक वाहकों का अंदेशा रहने लगा. कुछ हद तक तो ये बात सही हो सकती है क्योंकि मानव शरीर के अन्दर–बाहर वातावरण के अनुसार असंख्य ऐसे तत्व व विषाणु /वायरस होते हैं जो संसर्गी को रोगी बना सकते हैं. किन्तु ये भी सत्य है कि प्रकृति ने उसका भी स्वाभाविक इन्तजाम कर रखा है कि संसर्ग में आते ही शरीर के अन्दर प्रतिरोधात्मक शक्तियां पैदा होने लगती हैं.सारा इम्यून सिस्टम जागृत रहता है.

उमा ने पढ़ा था कि अगर प्रतिरोधात्मक शक्तियां कमजोर हों तो मामूली किस्म के वायरस भी मारक बन सकते हैं. अमेरिकी इतिहास के महत्वपूर्ण सोपान में उसने कहीं पढ़ा था कि जब यूरोपीय लोगों ने अमेरिका की धरती पर पदार्पण किया था तो वे यूरोपीय वायरस व रोगाणु भी दहेज की तरह अपने साथ वहां ले गए. वहाँ के मूल निवासियों में उन वायरसों/ रोगाणुओं से लड़ने की कोई भी प्रतिरोधी शक्ति नहीं थी. अमेरिका के मूल निवासियों ने इन विदेशी अतिक्रमणकारी लोगों का डट कर मुकाबला किया, पर युद्ध में हार गए और बहुत से लोग मारे गए. उन युद्धों में जितने लोग मारे गए उनसे ज्यादा वायरस/रोगाणुओं से भी मर गए थे. उमा ने पढ़ने  को तो ये भी पढ़ा था कि धूल, मिट्टी और कीचड़-गोबर में खेलने वाले गरीबों के नंग-धडंग बच्चों में स्वाभाविक तौर पर प्रतिरोधात्मक शक्तियां अन्य हिफाजती, नरम बच्चों की अपेक्षा कहीं ज्यादा होती हैं, जिनको धूल मिट्टी या संक्रमण के खतरों के इतर बचाकर रखने की कोशिशें की जाती हैं.

उमा के मन-मस्तिष्क में तो ये बात गहरे बैठी हुयी थी कि सब तरफ खतरनाक बीमारियों के जनक फैले हुए रहते हैं. इस प्रकार अतिसंवेदनशील उमा का जीना पग पग पर भयग्रस्त रहता था. ऐसे में उसका विवाह भैरव भट्ट नाम के एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर से हो गया, जो कि तराई में पन्त नगर के पास गाँव का रहने वाला है. भैरव भट्ट एक किसान का बेटा है. भैरव भट्ट सिडकुल के एक बड़े औद्योगिक इकाई में काम करता है, जो कि उसके घर से ज्यादा दूर नहीं है.

उत्तराखंड के कम्स्यार इलाके के सैकड़ों परिवार घर-गाँव छोड़कर पिछली सदी के पांचवे दशक में तराई/भाबर में आ गए थे. उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमन्त्री पण्डित गोविन्द बल्लभ पन्त ने तराई-भाबर के इस इलाके को आबाद करने के लिए पहाड़ के लोगों को यहाँ आकर बसने का न्यौता दिया था. सबको सात सात एकड़ जमीन और साथ में एक जोड़ी बैल देने का प्रावधान भी किया था. पहले तो जंगल की झाडियां और पेड़ काटकर जमीन को खेती के योग्य बनाया, ये काम इतना आसान नहीं था क्योंकि इस जंगल में अनेक खतरे मौजूद थे. आदमखोर शेर, अन्य खूंखार जंगली जानवर, जहरीले सांप-बिच्छू सभी जान के दुश्मन मौजूद थे. इससे भी ज्यादा खतरा मच्छरों से था सैकड़ों लोग मलेरिया से मर गए. कई लोग तो साल दो साल यहाँ कई आपदा झेल कर वापस अपने गाँव लौट गए, या यहीं भगवान को प्यारे हो गए. जो लोग यहाँ हाड-तोड़ मेहनत व जिंदगी के साक्षात खतरों को सह गए वे आज खुशहाल हैं, उनकी औलादें बाप-दादा की तपस्या का फल पा रहे हैं.

बाजड़ गाँव के देवदत्त भट्ट भी बहुत से अन्य ग्रामवासियों के साथ यहाँ आये थे. ज़िंदा रहने के लिए वे सारी कसरतें करते रहे, जो यहाँ मजबूरी थी. समस्या साफ़ पीने के पानी की भी थी, कच्चा झोपड़ा और उसमें सीलन का प्रकोप रहता था. जमीन जरूर बेहद उपजाऊ थी पर फसल बोने से लेकर काटने-समेटने तक अनेक आपदाएं थी.

आज ये आपदाएं सब नैपथ्य में चली गयी हैं. नयी पीढ़ी को याद भी नहीं है कि उनकी पिछली पीढ़ियों ने कितने कष्ट उठाये थे.

स्व. देवदत्त के पुत्र बद्रीदत्त भट्ट बड़े समृद्ध काश्तकार हैं. पक्का घर है, बैलों की जगह ट्रैक्टर आ गया है, दो दुधारू भैंसें और चार गायें गोशाला में बंधी हुई हैं, घर के बगल में गोबर गैस प्लांट स्थापित है. वे अपने देसी ठाठ से ही रहते हैं. खुद बद्रीदत्त ने स्कूल कालेज का मुँह तो कभी नहीं देखा, पर अपने बेटे भैरव को उन्होंने भरपूर शिक्षा देने की ठानी थी सो नजदीक में पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय से उसने एम. टेक. की डिग्री हासिल कर ली. जिसके फलस्वरूप उसे नौकरी भी मिल गयी.

जब आदमी समृद्धि पा जाता है तो उसके रिश्ते भी बड़े बड़े घरों से आने लगते हैं. भैरव और उमा की शादी बड़े धूमधाम से हो गयी. अनेक रिश्तेदार बद्रीदत्त भट्ट के भाग्य को सराहते हैं लेकिन यहाँ तक पहुँचने के उनके अध्यवसाय व जी तोड़ मेहनत की किसी को याद नहीं है.

डॉ. जोशी ने अपनी बेटी को एक महंगी कार व फर्नीचर सहित बहुत सा स्त्री-धन भी दिया, जिसे संभालने के लिए बद्रीदत्त भट्ट को अपने घर में नए सिरे से कवायद करनी पडी.

बाहर वालों को तो सब सामान्य दिख रहा होगा, पर जब से उमा बहू बन कर इस घर में आई, घर के अन्दर अशांति सी हो गई. एक अघोषित टकराव की स्थिति सी बनी हुई थी क्योंकि उसको घर के अन्दर-बाहर, आसपास सर्वत्र गन्दगी, गोबर व बैक्टीरिया नजर आते हैं. गौशाला तथा गोबर गैस प्लांट नजदीक ही होने से गोबर की सड़ी बदबू से उसका दम घुटता है. गाहे बेगाहे उत्तर में चंद किलोमीटर दूर लालकुआँ के पेपर मिल की बदबू उसे और भी उल्टी करने तक की हैरानी पैदा करती है.

उमा को तकलीफ है कि बाथरूम हाईजेनिक नहीं है, घर में एक ही साबुन से सब लोग नहा लेते हैं, मकान के फर्श पर फिनायल या लाईसोल अथवा किसी कीटनाशक द्रव्य से कभी साफ़ नहीं किया जाता है. उसका माइक्रोबायोलाजिस्ट होना उसके लिए दुखदाई साबित हो रहा है. उसे हर जगह कोकाई, बैसिलाई, या पैरासाइट्स की उपस्थिति का अहसास होता है. उसको तकलीफ है कि उसका छोटा देवर नीरज और ननद राधा जब चाहे उसके तौलियों का इस्तेमाल करने से नहीं चूकते हैं.

भैरव अपने अभिन्न माता-पिता को कह नहीं पा रहा है कि उमा उस पर घर से दूर रुद्रपुर में बने नए मल्टीस्टोरी फ्लैट्स में जाने का दबाव बनाए हुए है. बहाना उसके तौलियों के सार्वजनिक उपयोग पर आ टिका है. भैरव ने बड़े संकोच के साथ अपने पिता को बताया कि उमा अपने तौलियों के दूसरों के द्वारा उपयोग पर मनमुटाव कर रही है, इसी कारण तीन दिनों से पति-पत्नी तक में बोलचाल बन्द है.

बद्रीदत्त भट्ट यद्यपि बहुत अनुभवी व्यक्ति हैं, पर इस कलह की असली जड़ को नहीं समझ पा रहे हैं. वे परिवार के बिखराव के बारे में चिंतित अवश्य हैं इसलिए अगले ही दिन पिलखुआ जाकर चार दर्जन बढ़िया किस्म के महंगे तौलिए खरीद कर घर ले आये. पैकिंग खोलते हुए बहू रानी से बोले, “बेटी, मैं और भी तौलिए लाकर रख दूंगा पर तुम लोग इतनी छोटी चीज के लिए घर छोड़ कर जाने की बात मत करना.”

ये वार्ता अब थोड़ी पुरानी पड़ गयी है, इस बीच उमा रुद्रपुर शहर में एक क्लीनिकल पैथोलाजी लैब का संचालन खुद करने लग गयी है. घर की सारी सैनिटेशन  सम्बन्धी जिम्मेदारी भी उसी ने संभाल ली है. गृहस्थी ठीक चल रही है. वह बहुत सामान्य हो चली है, गोबर की बू-बास अब उसके भी जेहन में बस गयी है.
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3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सार्थक प्रस्तुतीकरण.

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  2. पूर्वाग्रह और बदलाव, आने में और जाने में पर्याप्त समय लेते हैं, रोचक घटनाचक्र।

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  3. बहुत बढ़िया पाण्‍डे जी, मेरे बगल में बागेश्‍वर के काण्‍डपाल जी बैठे हुए हैं, उन्‍होंने कहानी के पात्र भट्ट जी का नाम देखा और कह उठे-ये तो बहुत फेमस आदमी हैं हमारे यहां।

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