बुधवार, 6 मार्च 2013

मधु और मधुमक्खियां - १

क्या आपने कभी दुनिया की सबसे मीठी वस्तु शहद और उसको कण कण के रूप में इकट्ठा करने वाली मधुमक्खी के विषय में गंभीरता से सोचा है?

हमारे उत्तरांचल में सभी पुराने घरों में, जिस प्रकार दूध के लिए गाय-भैंस पाली जाती हैं, उसी तरह 'मौन (शहद की मक्खी) पालन' ग्रामीण जीवन का एक अपरिहार्य हिस्सा हुआ करता है. हर घर में खिड़कियों की ही तरह छोटे दराजनुमा दड़बे या खास किस्म के लकड़ी के बक्से रखे जाते है. और शहद की मक्खियाँ अपनी सहूलियत के अनुसार अथवा पालने वालों की इच्छानुसार इनमें वास करती हैं. अब मौन-पालन कृषि विज्ञान की एक विधा मानी जाती है. मौन पालकों को सरकार की तरफ से इसकी विधिवत ट्रेनिंग भी दी जाती है. इसे ग्रामोद्योग का दर्जा प्राप्त है.कई स्थानों पर तो औद्यिगिक स्तर पर उत्पादन भी होता है.

मधुमक्खियों के परिवार में एक रानी मक्खी होती है, जो आकार में आम मधुमक्खियों से कई गुना बड़ी होती हैं. ये रानी मक्खी परिवार बढ़ाने के लिए छत्ते की कोटरों में अण्डे देती रहती है मजदूर मधुमक्खियां बहुत मेहनती होती हैं, जो फूलों से मकरंद (नेक्टर) तथा परागकण इकट्ठा करके लाती हैं और छत्ते के एक हिस्से में जमा करती रहती हैं. इनका ये काम दिन के उजाले में होता है. शाम होते ही सभी मधुमक्खियां अपने घर लौट आती हैं. कहा जाता है कि इनमें जो नर मधुमक्खियां होते हैं, वे कामचोर होते हैं. हर मक्खी परिवार की अपनी एक अलग गन्ध होती है. यदि कभी किसी दूसरे परिवार वाला घुसपैठिया आ जाये तो वह मारा जाता है. दिन के समय जब मधुमक्खियां मकरंद लेने दूर दूर तक जाती हैं तो अपनी गन्ध की लकीर छोड़ती जाती है ताकि वापसी उसी रास्ते हो सके.

मधुमक्खियों का समाज बहुत अनुशासित व व्यवस्थित होता है. घर में किसी प्रकार की परेशानी हो तो वे दूसरा नया घर खोज लेती हैं. यदि कोई नई रानी मक्खी पैदा हो जाती है तो वह अपना अलग परिवार बना कर अन्यत्र चली जाती है. किसी परिवार की रानी मक्खी यदि किई कारण मर जाती है तो पूरा परिवार बिखर कर मर जाता है.

ये सच है कि मधुमक्खियां शहद अपने और अपने बच्चों के भोजन के लिए जमा करती हैं. वे भोजन के लिए पूरी तरह मकरंद तथा परागकणों पर ही निर्भर होती हैं. मकरंद से ऊर्जा तथा पराग कणों से भरपूर प्रोटीन पा जाती हैं. उनकी जीभ की बनावट बहुत जटिल बताई जाती है. सचमुच हम मनुष्य, भालू या अन्य शहद्खोर जीव इनके घरों से शहद चुरा लिया करते हैं. रात के अँधेरे में अथवा धुआं लगाकर उनको एक तरफ भगा कर शहद निकाल लिया जाता है. उनको अवश्य ही इससे बहुत दुख व तकलीफ होती होगी क्योंकि इस प्रक्रिया में उनके अण्डे, लार्वा या बच्चे अधिसंख्य में मारे जाते हैं.

मधुमक्खियां अंटार्कटिका के अलावा सभी महाद्वीपों में पाई जाती हैं. अलग अलग स्थानों में इनके आकार व व्यवहार में थोड़ा बहुत अंतर भी पाया जाता है. जंगली मधुमखियाँ मोटे पेड़ों की कोटरों या डालियों पर अपने छत्ते बनाया करती हैं. छत्तों में मोम की मात्रा बहुत होती है. कुछ बड़ी मक्खियां ज्यादा जहरीली भी होती हैं. उनके डंक बहुत पीड़ाकारक होते हैं. प्राय: देखा गया है कि ये मक्खियां सिर्फ अपने बचाव में ही हमला करती हैं इसलिए उनके साथ किसी तरह की छेड़खानी नहीं करनी चाहिए.

अब जब बड़े स्तर पर वैज्ञानिक तरीकों से मौन पालन हो रहा है तो उत्पादन भी बढ़ा है. शहद की विश्व भर में बहुत माँग रहती है. पालतू मक्खियों के बक्सों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिए रात के समय स्थानांतरण किया जाता है. रानी मक्खी ना भाग सके इसलिए बक्से पर क्वीन गेट भी लगा दिया जाता है. मधुमक्खियाँ बहुत गर्मी या बहुत सर्दी बर्दास्त नहीं कर पाती हैं बसंत ऋतु में जब फूलों का मौसम होता है तो ये गतिमान रहती हैं. जिस प्रकार के जंगल या खेतों/फूलों से ये मकरंद व पराग लेती हैं उसी प्रकार के गुण व रंग युक्त शहद तैयार होता है.

शहद एक अत्यंत गुणकारी औषधि एवं औषधि-अनुपान(संचालक) भी है. इसके बारे में पूरी चर्चा आगामी लेख में प्रस्तुत की जायेगी.
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5 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. इनकी गुन्‍जन के कारण। मौन पहाड़ी शब्‍द है। मुधमक्खियों को पहाडृ में मौना या मौन बोला जाता है।

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  2. सार्थक प्रस्तुतीकरण,आभार.

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  3. बहुत बढ़िया पाण्‍डेय जी। हमारे घर में भी कभी एक मधुमक्‍खी का एक छत्‍ता हुआ करता था।

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  4. मधुमक्खी के संसार से परचित करने के लिए धन्यवाद!

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