शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

अक्षम

माया, ममता, करुणा, राग, द्वेष, लिप्सा, सन्तोष आदि स्वाभाविक गुण-अवगुण परमात्मा ने असीमित ढंग से मनुष्यों में बाँट रखे हैं. स्त्रियों को पुरुषों की अपेक्षा अधिक संवेदनशील भी बनाया है.

डॉ. चंद्रा लाल शिक्षा विभाग में डिप्युटी डाइरेक्टर थी और उनके पति अम्बा लाल एक कॉलेज में प्राध्यापक थे. दोनों अब अपने पदों से रिटायर हो चुके हैं. नैनीताल जिले के भीमताल में एक सुन्दर सा घर बना कर रह रहे हैं. लाल दम्पति का एक ही बेटा है मुकुल, जो स्टेट बैंक की नजदीकी शाखा में पी.ओ. है. मुकुल देखने में सुन्दर और आकर्षक है, स्वभाव से हँसमुख और मृदुभाषी है. भाग्य की विडम्बना ये रही कि बचपन में मुकुल एक बड़ी दुर्घटना का शिकार हो गया था, जिसमें उसने अपने अण्डकोश खो दिये थे. डॉक्टरों ने उनको तभी बता दिया था कि मुकुल औलाद पैदा करने में सक्षम नहीं रहेगा. ये बात डा.चंद्रा लाल को रात दिन सालती रही, पर ईश्वर की मर्जी के बारे में क्या कहा जा सकता है. मुकुल की जान बच गयी थी ये क्या कम था? इसी विचार से सन्तोष कर लिया करती है.

मुकुल तीस वर्ष का होने को आया तो माँ-बाप ने गहन विचार विमर्श के बाद तय किया कि बेटे की शादी कर देनी चाहिए, पर मुकुल इसके लिए तैयार नहीं हो रहा था. क्योंकि उसको अपनी कमजोरी मालूम थी. कुछ नजदीकी रिश्तेदारों को छोड़कर मिलने-जुलने वाले, परिचितों, पड़ोसियों को ये सब कहाँ मालूम था? इसलिये, विशेषकर महिलायें, आये दिन डॉ. चंद्रा से राह चलते कहा करती थी, “अब बहू कब ला रही हो?”, “हमारे हाथ ऊपर नीचे कब करवा रही हो?”, या “क्या ढोलक तब बजवाओगी जब बेटे की जवानी निकल जायेगी?” बोलने वालों का क्या है, पर उनके शब्द दिल के अन्दर गहरे तक भेद कर जाया करते थे.

अनेक लोग बेऔलाद भी तो होते ही हैं और ये भी है कि आजकल अच्छे अच्छे फर्टिलिटी सेंटर्स भी हैं.' ये ताने बाने बुनते हुए लाल दम्पति ने बहुत जोर देकर बेटे को शादी के लिए राजी कर लिया और काशीपुर शहर में दूर की रिश्तेदारी में एक कोमल सी, भोली सी, भावना नाम की लड़की ढूंढ ली. भावना के पिता किशनलाल जब घर, वर, व सुसंस्कृत माता-पिता से मिले तो उन्होंने शादी के लिए तुरन्त ‘हाँ’ कर दी.

धूम-धाम व विधि-विधान से विवाहोत्सव हो गया. बधाइयों और उपहारों के ढेर लग गए, लेकिन मुकुल अस्वस्थता का बहाना बनाकर भावना को हनीमून के लिए कहीं नहीं ले गया. कुछ ऐसी बातें होती हैं, जो घर की चाहर दीवारी में घूमती रहती हैं और अन्दर ही अन्दर जहर घोलती रहती हैं. जब से मुकुल ने भावना को अपने शरीर की असलियत बताई तब से वह बुझी बुझी रहने लगी थी. उसे लगा कि ससुराल वालों ने जानबूझ कर उसके साथ धोखा किया है. उसकी सास सब कुछ जानते हुए भी मुख्य विषय पर चुप थी. अभी इतनी जल्दी उसे किसी फर्टीलिटी सेंटर में ले जाने के प्रस्ताव को रखने में संकोच कर रही थी.

इस बार जब भावना अपने मायके गयी तो वहीं से अपनी दीदी के साथ अहमदाबाद चली गयी. लगभग चार महीनों के बाद मुकुल उसे वहां से बुला कर वापस भीमताल लाया. भावना का रूप लावण्य और निखर आया है.

अनुभवी औरतों की पारखी नजरें बहुत जल्दी ताड़ लेती हैं कि नवेली के पैर भारी हैं. धीरे धीरे ये खुशखबरी चर्चा का विषय बन चुकी है. लाल दम्पति मिलने वालों से बधाई भी लेने लग गए हैं, पर मुकुल अपने दिल का हाल बताने में भी खुद को सक्षम महसूस नहीं कर रहा है.
***

5 टिप्‍पणियां:

  1. धोखे बाज को धोखा... सही सबक..समाज का आइना..

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक कल शनिवार (14-09-2013) को "यशोदा मैया है मेरी हिँदी" (चर्चा मंचः अंक-1368)... पर भी होगा!
    हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं